लोकसभा अध्यक्ष के ओएसडी राजीव दत्ता पर नहीं चलेगा केस, 24 साल बाद हाई कोर्ट से मिली राहत
News In Short
- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के ओएसडी राजीव दत्ता को 24 साल बाद हाई कोर्ट से राहत।
- राजस्थान हाई कोर्ट ने राजीव दत्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही की रद्द।
- दत्ता पर अतिक्रमण हटाने के नाम पर घर में घुसकर तोड़फोड़ करने का था आरोप।
- कोर्ट ने कहा, ड्यूटी के दौरान एक्शन पर केस चलाने से पहले सरकार की अनुमति जरूरी।
- जेडीए के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी राजीव दत्त के खिलाफ ट्रायल कोर्ट ने लिया था प्रसंज्ञान।
News In Detail
Jaipur: राजस्थान हाई कोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के कार्यबल और उनके कानूनी संरक्षण को लेकर बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) के तत्कालीन प्रवर्तन अधिकारी राजीव दत्ता के खिलाफ 24 साल पुराना क्रिमिनल केस रद्द कर दिया है। जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अधिकारी अपनी सरकारी ड्यूटी के दौरान कोई कार्रवाई करता है, तो उस पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य है। राजीव दत्ता अभी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के ओएसडी हैं
क्या था 24 साल पुराना यह विवाद?
इस मामले की जड़ें साल 2002 में जुड़ी हैं। जयपुर में बजाज नगर के विजय शर्मा ने आरोप लगाया था कि 6 मार्च 2002 की सुबह तड़के 5 से 6 बजे के बीच करीब 50-60 लोग गाड़ियों के साथ उनके परिसर में घुसे। आरोप था कि इन लोगों ने बाउंड्री वॉल और गेट तोड़ दिया, सामान को नुकसान पहुंचाया। वहां मौजूद लोगों के साथ मारपीट भी की।
शिकायतकर्ता का दावा था कि यह पूरी तोड़फोड़ अधिकारियों के इशारे पर की गई थी। इस शिकायत पर पुलिस ने दंगा फैलाने (धारा 147), अनधिकृत प्रवेश (451), मारपीट (323) और संपत्ति को नुकसान (427) जैसी गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया था।
निचली अदालतों का रुख और लंबी कानूनी लड़ाई
दिलचस्प बात यह है कि पुलिस ने अपनी जांच के बाद इस मामले में फाइनल रिपोर्ट पेश की थी। यानी पुलिस को राजीव दत्ता के खिलाफ अपराध के सबूत नहीं मिले थे। लेकिन मामला तब उलझ गया, जब मजिस्ट्रेट कोर्ट ने शिकायतकर्ता की प्रोटेस्ट पिटीशन को स्वीकार करते हुए 2009 में राजीव दत्ता के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दे दिया। 2018 में एडीजे कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसी कानूनी खींचतान को दत्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
कोर्ट में दलील, ड्यूटी करना अपराध नहीं
राजीव दत्ता के वकील विभूति भूषण शर्मा ने हाईकोर्ट में मजबूती से पक्ष रखते हुए कहा कि यह कोई निजी हमला नहीं था, बल्कि जेडीए की ओर से अतिक्रमण हटाने की एक आधिकारिक कार्रवाई थी। यह कार्रवाई सक्षम अधिकारियों के निर्देश और कानूनी दायरे में रहकर की गई थी। रिकॉर्ड्स ने भी इस बात की पुष्टि की कि दत्ता उस समय ऑन-ड्यूटी थे।
धारा 197 अधिकारियों का 'सुरक्षा कवच
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सीआरपीसी की धारा 197 को ढाल बनाया। अदालत ने कहा कि इस धारा का मुख्य उद्देश्य सरकारी अधिकारियों को उनके काम के दौरान लगने वाले अनावश्यक और दुर्भावनापूर्ण आरोपों से बचाना है। यदि कोई कार्य सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के दौरान किया गया है, तो कोर्ट तब तक उस पर संज्ञान नहीं ले सकता जब तक सरकार इसकी अनुमति न दे दे।
चूंकि इस मामले में सरकार से कोई अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों को 'कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण' मानते हुए रद्द कर दिया।
कौन है राजीव दत्ता
लोकसभा अध्यक्ष के ओएसडी राजीव दत्ता मूल रूप से राजस्थान पुलिस सेवा के अधिकारी हैं। वे प्रमोट होकर आरपीएस बने थे। वर्ष 2002 के दौरान घटना के समय दत्ता जेडीए के अतिक्रमण दस्ते में प्रवर्तन अधिकारी तैनात थे। वे कोटा से सांसद ओम बिरला के नजदीकी रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद बिरला ने दत्ता को अपना ओएसडी बना लिया। वे बिरला के पिछले स्पीकर कार्यकाल में भी ओएसडी थे।
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