हाईकोर्ट ने 11 साल बाद सूचना सहायकों को दी राहत, नौकरी से हटाने का आदेश रद्द; बकाया वेतन भी मिलेगा

Mukesh Sharma | Oct 13, 2026, 18:51 IST
सूचना सहायकों की नियुक्ति हुई रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट ने सूचना सहायकों को नौकरी से हटाने का करीब 11 साल पुराना आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि बिना जांच रिपोर्ट दिए और अपनी बात रखने का पूरा मौका दिए कर्मचारियों को नौकरी से निकालना गलत था। अदालत ने 100 दिन के भीतर उनकी पुरानी नौकरी की अवधि जोड़कर वेतन का बकाया और दूसरे सभी फायदे देने के निर्देश दिए हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने सूचना सहायक के पद पर नौकरी पाने वाले कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने करीब 11 साल पहले उन्हें नौकरी से हटाने का सरकारी आदेश रद्द कर दिया है। इन कर्मचारियों ने मेघालय की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर एप्लीकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा (PGDCA) किया था। सरकार ने इस डिप्लोमा को मान्य नहीं मानते हुए उनकी नियुक्तियां रद्द कर दी थीं। अब हाईकोर्ट ने कहा है कि कर्मचारियों की नियुक्ति सभी दस्तावेज जांचने के बाद हुई थी। ऐसे में बिना जांच रिपोर्ट दिए उन्हें नौकरी से हटाना गलत था। कोर्ट ने कर्मचारियों को नौकरी शुरू करने की तारीख से लगातार सेवा में मानने और वेतन का बकाया सहित सभी फायदे देने का आदेश दिया है।



हाईकोर्ट ने 27 मई 2015 का आदेश किया रद्द

जस्टिस गणेशराम मीणा ने राजाराम मीणा और पांच अन्य कर्मचारियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार का 27 मई 2015 का आदेश रद्द कर दिया। इसी आदेश के जरिए इन कर्मचारियों की नियुक्तियां खत्म की गई थीं। हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों को नौकरी पर रखने से पहले उनके सभी शैक्षणिक दस्तावेज जांचे गए थे। इसके बाद ही उनका चयन हुआ था। ऐसे में सरकार को उनकी नियुक्तियां रद्द करने से पहले पूरे मामले की सही तरीके से जांच करनी चाहिए थी।



2013 की भर्ती में हुआ था चयन

मामले में कर्मचारियों की ओर से एडवोकेट विभूतिभूषण शर्मा ने अदालत में पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ताओं ने मेघालय की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी से दूर रहकर पढ़ाई करने की सुविधा के तहत PGDCA का डिप्लोमा किया था। इसी डिप्लोमा के आधार पर उन्होंने वर्ष 2013 में निकली सूचना सहायक भर्ती में आवेदन किया था। कर्मचारियों का कहना था कि उस समय यूनिवर्सिटी को डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल (DEC) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से मान्यता मिली हुई थी। भर्ती के दौरान उनके दस्तावेजों की जांच भी हुई थी। इसके बाद उन्हें नौकरी पर रखा गया।



सरकार ने डिप्लोमा पर क्यों उठाए थे सवाल?

राज्य सरकार ने अदालत में बताया कि नियुक्तियों के बाद यूजीसी ने पंचायतीराज विभाग को पत्र भेजा था। इसमें कहा गया था कि राज्य के कानून के तहत बनी यूनिवर्सिटी दूसरे राज्यों में अपने केंद्र खोलकर मनमाने तरीके से डिग्री या डिप्लोमा नहीं दे सकती। इसके बाद पंचायतीराज विभाग ने मामले की अंदरूनी जांच कराई। इसमें मेघालय की महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी सहित कुछ अन्य यूनिवर्सिटी से दूर रहकर पढ़ाई के जरिए हासिल किए गए डिप्लोमा और डिग्रियों पर सवाल उठाए गए। सरकार का कहना था कि ऐसे डिप्लोमा सरकारी नौकरी के लिए मान्य नहीं माने जा सकते। इसी आधार पर कर्मचारियों की नियुक्तियों की दोबारा जांच की गई।



2014 में नोटिस दिया, फिर मामला कोर्ट पहुंचा

सरकार ने 26 नवंबर 2014 को संबंधित कर्मचारियों को नोटिस जारी किया। इसमें उनसे अपनी योग्यता से जुड़े दूसरे दस्तावेज पेश करने को कहा गया। कर्मचारियों ने इस नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद 12 जनवरी 2015 को अदालत ने अंतरिम आदेश जारी किया। इसमें कर्मचारियों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई करने पर रोक लगाई गई थी।



इसके बावजूद सरकार ने 27 मई 2015 को उनकी नियुक्तियां रद्द करने का आदेश जारी कर दिया। इसी आदेश को लेकर मामला हाईकोर्ट में चला।



दूसरे शहर में फॉर्म भरने से डिप्लोमा गलत नहीं होता

सुनवाई के दौरान कर्मचारियों ने कहा कि कोटा या दूसरे शहरों में बने केंद्रों पर केवल फॉर्म जमा किए गए थे या फीस भरी गई थी। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने किसी बिना मान्यता वाले केंद्र से पढ़ाई की थी। उनका कहना था कि पढ़ाई की सामग्री यूनिवर्सिटी ने दी थी और परीक्षाएं भी यूनिवर्सिटी ने ही कराई थीं। हाईकोर्ट ने इस दलील को अहम माना। अदालत ने कहा कि सिर्फ किसी दूसरे शहर में फॉर्म जमा करने, फीस भरने या काउंसलिंग कराने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि कर्मचारी ने बिना अनुमति वाले केंद्र से कोर्स किया था।




जांच रिपोर्ट तक नहीं दी, हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

अदालत ने पाया कि सरकार ने जिस अंदरूनी जांच रिपोर्ट के आधार पर कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द की थीं, उसकी कॉपी उन्हें दी ही नहीं गई। इससे कर्मचारियों को अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों का ठीक से जवाब देने का मौका नहीं मिला। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ इतना बड़ा फैसला लेने से पहले उसे अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए। बिना रिपोर्ट दिए और जरूरी प्रक्रिया पूरी किए नियुक्तियां रद्द करना गलत और मनमाना फैसला था।




कोर्ट बोला- इतने साल बाद नौकरी छीनना जिंदगी बर्बाद करने जैसा

हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की उम्र और उनके भविष्य को लेकर भी अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ये कर्मचारी कई साल तक नौकरी कर चुके थे। इसके बाद अचानक उन्हें बाहर कर देना उनके जीवन को बर्बाद करने जैसा है। कोर्ट ने कहा कि अब इन कर्मचारियों की उम्र भी इतनी हो चुकी है कि वे दूसरी सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन नहीं कर सकते। ऐसे में सरकार का फैसला उनके भविष्य पर गंभीर असर डाल सकता था।




100 दिन में देने होंगे नौकरी से जुड़े सभी फायदे

हाईकोर्ट ने राजाराम मीणा सहित छह कर्मचारियों की याचिका मंजूर कर ली। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि 100 दिन के भीतर इन कर्मचारियों को उनकी पहली नियुक्ति की तारीख से लगातार नौकरी में माना जाए। इसके साथ ही उन्हें दूसरे चयनित कर्मचारियों के बराबर नौकरी से जुड़े सभी फायदे दिए जाएं। इनमें वेतन तय करने से जुड़े लाभ, पुरानी सेवा अवधि का फायदा और बकाया वेतन शामिल है। इस फैसले से संबंधित कर्मचारियों को राहत मिली है। अदालत ने साफ किया कि दस्तावेज जांचकर नियुक्ति देने के बाद सरकार कर्मचारियों को जरूरी प्रक्रिया अपनाए बिना नौकरी से नहीं हटा सकती।

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