कंबोडिया और कजाक में बाघ लौटाएगा भारत, सरिस्का मॉडल बनेगा ग्लोबल सक्सेस स्टोरी
समझें क्या है पूरा मामला
- सरिस्का टाइगर रिजर्व सितंबर में बनेगा वन्यजीव विशेषज्ञों का महाकुंभ।
- इंटरनेशनल बिग कैट एलाइंस के तहत 32 देशों के वैज्ञानिक जुटेंगे।
- कैनाइन डिस्टेंपर वायरस से बाघों की मौत होगा चर्चा का विषय।
- सरिस्का में होने वाले सेमिनार में बनेगी मौतों की रोकथाम की रणनीति।
- 2005 में शून्य हुए बाघ, 2008 में पहला पुनर्वास, आज दुनिया के लिए मिसाल।
सुनील जैन @ अलवर
राजस्थान का सरिस्का टाइगर रिजर्व इस वर्ष सितंबर में वन्यजीव विशेषज्ञों के बड़े महाकुंभ का गवाह बनने जा रहा है। इंटरनेशनल बिग कैट एलाइंस (आईबीसीए) यहां दो महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सेमिनार करेगा। इसमें दुनिया के 32 देशों के वन्यजीव वैज्ञानिक, संरक्षण विशेषज्ञ और उच्च अधिकारी जुटेंगे।
हाल ही में मध्यप्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) से बाघों की मौत ने चिंता बढ़ा दी है। इसलिए सरिस्का सेमिनार का मुख्य एजेंडा वन्यजीवों में फैलने वाली संक्रामक बीमारियां और उनकी रोकथाम रहेगा।
आईबीसीए के महानिदेशक डॉ. एसपी यादव ने बताया कि भविष्य में ऐसे वायरस जनित खतरों से निपटने की रणनीति तैयार हो रही है। इसी कड़ी में यह सेमिनार होगी। दूसरे सेमिनार में अंतरराष्ट्रीय रिसोर्स मोबिलाइजेशन पर चर्चा होगी। इसका फोकस टाइगर रिजर्व की क्षमता बढ़ाने पर रहेगा।
मिसाल बना सरिस्का मॉडल
डॉ. यादव ने कहा कि बाघों के सफल पुनर्वास में भारत पूरी दुनिया के लिए मॉडल बना है। भारत इसी अनुभव पर कंबोडिया और कजाकिस्तान जैसे देशों में बाघों के पुनर्वास में सहयोग करेगा।
कंबोडिया में गृहयुद्ध के कारण वर्ष 2007-08 तक बाघ पूरी तरह विलुप्त हो गए थे। वहां का मौसम भारत जैसा होने से भारतीय बाघों के पुनर्वास की संभावनाएं बेहतर हैं। कजाकिस्तान भी रूस के असफल प्रयासों के बाद अब भारतीय विशेषज्ञता के सहारे आगे बढ़ रहा है।
विफलता के संकट से पैदा हुआ सफलता का मार्ग
वर्ष 2005 में सरिस्का से बाघों का पूरी तरह खत्म हो जाना बड़ा झटका था। इसके बाद उठाए गए कदमों ने इस संकट को अवसर में बदल दिया।
वर्ष 2008 में सरिस्का में बाघों का पहला वैज्ञानिक पुनर्वास हुआ। यह प्रयोग कामयाब रहा। पन्ना और सतकोसिया में प्रयोग सफल रहा। इसकी सफलता पूरी दुनिया के लिए मॉडल है।
कुछ राज्यों में अच्छी संभावना
देश के कुछ टाइगर रिजर्व क्षमता से अधिक बाघों का दबाव झेल रहे हैं। ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर भारत के कई रिजर्व में बाघों की संख्या कम है।
एनटीसीए और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के अनुसार इन कम संख्या वाले क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीके से पुनर्वास की अपार संभावनाएं हैं। इस वैश्विक सम्मेलन से संरक्षण तकनीकों को वैश्विक पहचान मिलेगी।
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