राजस्थानी भाषा के समर्थन में SC में याचिकाकर्ताओं ने पेश किए थे मजबूत तर्क, तब हुई जीत

Jageshwar prasad | May 14, 2026, 09:17 IST
Photograph: (the sootr)
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थानी भाषा को लेकर एक ऐतिहासिक निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं के मजबूत तर्कों के बाद अदालत ने सरकार को प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक राजस्थानी को शामिल करने को कहा है। यह कदम भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए उठाया गया है।

News In Short

  • सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को स्कूलों और कॉलेजों में राजस्थानी भाषा पढ़ाने का निर्देश दिया है।
  • याचिकाकर्ताओं ने कहा कि राजस्थान में 4.63 करोड़ लोगों की मातृभाषा राजस्थानी है।
  • कोर्ट में स्पष्ट किया गया कि यह मांग संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए नहीं।
  • तर्क दिया गया कि मातृभाषा में शिक्षा से बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होता है।
  • यूनेस्को की रिपोर्ट का हवाला देते हुए भाषा के विलुप्त होने का खतरा भी जताया गया।

News In Detail

राजस्थान के करोड़ों लोगों के लिए एक सुखद खबर है। अब प्रदेश के स्कूलों और कॉलेजों में राजस्थानी भाषा की गूंज सुनाई देगी। सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने के निर्देश दिए हैं।



यह फैसला पदम मेहता और अन्य याचिकाकर्ताओं की लंबी कानूनी लड़ाई का परिणाम है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत में साबित किया कि बच्चों के लिए उनकी मातृभाषा में शिक्षा कितनी जरूरी है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 350ए का विशेष उल्लेख किया।



आठवीं अनुसूची नहीं, शिक्षा है मुख्य उद्देश्य

अदालत में याचिकाकर्ताओं ने अपनी मंशा पहले ही साफ कर दी थी। उन्होंने कहा कि वे राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग नहीं कर रहे। उनका असली उद्देश्य बच्चों को उनकी अपनी भाषा में पढ़ने का हक दिलाना है।



उनका तर्क था कि नई शिक्षा नीति 2020 भी मातृभाषा पर जोर देती है। याचिका में बताया गया कि रीट (REET) परीक्षा में कई अन्य भाषाएं शामिल हैं। लेकिन प्रदेश की अपनी भाषा राजस्थानी को इससे बाहर रखना गलत है।



4.63 करोड़ लोगों की जुबान है राजस्थानी

याचिका में साल 2011 की जनगणना के आंकड़े पेश किए गए। इसके अनुसार राजस्थान में 4.63 करोड़ लोग राजस्थानी और उसकी उप बोलियां बोलते हैं। इसमें मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती और ढूंढाड़ी जैसी बोलियां प्रमुख रूप से शामिल हैं।



इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद इस भाषा को स्कूलों में स्थान नहीं मिला। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि हिंदी आधिकारिक भाषा जरूर है, लेकिन राजस्थानी लोगों की आत्मा है। इसकी समृद्ध साहित्यिक परंपरा को बचाना अब समय की मांग है।



यूनेस्को की चेतावनी और सांस्कृतिक संरक्षण

सुनवाई के दौरान यूनेस्को की रिपोर्ट का भी जिक्र किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, जिन भाषाओं को सरकारी संरक्षण नहीं मिलता, वे धीरे-धीरे विलुप्त हो जाती हैं। स्कूलों में न पढ़ाया जाना किसी भी भाषा के अंत की शुरुआत है।



याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि भाषाई विविधता को बचाना हमारी जिम्मेदारी है। राजस्थानी को शिक्षा से जोड़ना केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि विरासत को बचाना है। इससे बच्चों का जुड़ाव अपनी संस्कृति से और भी गहरा होगा।



मानसिक विकास और बेहतर परिणाम

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हवाला देते हुए बताया गया कि मातृभाषा में सीखने की क्षमता बढ़ती है। इससे स्कूलों में बच्चों के छोड़ने की दर (ड्रॉपआउट) भी कम होती है। बच्चा अपनी बात को बेहतर ढंग से समझ और समझा पाता है।



सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी तर्कों को बेहद गंभीरता से लिया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे शिक्षक भर्ती और पाठ्यक्रम में राजस्थानी को जगह दें। इस फैसले से राजस्थान के भाषाई आंदोलन को एक नई ऊर्जा मिली है।



अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थानी भाषा को लेकर क्या निर्देश दिए हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया है कि वह प्रदेश की प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में राजस्थानी भाषा को शामिल करे। कोर्ट ने यह भी कहा है कि इसे शिक्षक भर्ती की प्रक्रियाओं में भी उचित स्थान दिया जाना चाहिए ताकि मातृभाषा में शिक्षा सुनिश्चित हो सके।



याचिकाकर्ताओं ने राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग क्यों नहीं की?

याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करना केवल संसद द्वारा संविधान संशोधन से ही संभव है। उनका प्राथमिक उद्देश्य बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराना था, जो संविधान के अनुच्छेद 350ए और नई शिक्षा नीति 2020 के तहत राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।



मातृभाषा में शिक्षा देने के क्या फायदे बताए गए हैं?

याचिका में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और यूनेस्को की रिपोर्टों का हवाला देते हुए बताया गया कि मातृभाषा में पढ़ाई करने से बच्चों की समझने की शक्ति बढ़ती है। इससे पढ़ाई बोझ नहीं लगती, जिससे स्कूलों में ड्रॉपआउट कम होता है और बच्चों का समग्र मानसिक व सामाजिक विकास बेहतर होता है।



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