राजस्थान में अवैध खनन और प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार को CBI जांच की चेतावनी
राजस्थान में नदियों के आसपास अवैध खनन और बढ़ते प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राज्य सरकार को कड़ी चेतावनी दी है। कोर्ट ने जोजरी, लूनी और बांडी नदी क्षेत्र में अवैध खनन को मंजूरी देने पर सवाल उठाए हैं। साथ ही जयपुर के सांगानेर में बिना NOC चल रहे उद्योगों पर भी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार ने जल्द सख्त कदम नहीं उठाए तो मामले की जांच CBI को सौंपी जा सकती है।
20 लाख लोगों की जिंदगी पर पड़ रहा असर
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने जोजरी, लूनी और बांडी नदी क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण और पर्यावरण को हो रहे नुकसान का मामला खुद संज्ञान में लिया है। इन नदियों में प्रदूषण की वजह से आसपास रहने वाले करीब 20 लाख लोगों की जिंदगी प्रभावित हो रही है। कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े मामले में सरकार को तुरंत ठोस कदम उठाने चाहिए।
सांगानेर में 80% उद्योग बिना NOC के चल रहे
सुनवाई के दौरान जयपुर के सांगानेर औद्योगिक क्षेत्र का मामला भी उठा। राज्य सरकार ने खुद कोर्ट में बताया है कि सांगानेर में करीब 80 प्रतिशत उद्योग बिना NOC के चल रहे हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने इन उद्योगों को लेकर कोई ठोस योजना पेश नहीं की तो अदालत को कार्रवाई करनी पड़ेगी। बेंच ने यह भी संकेत दिया कि सांगानेर के मामले में CBI जांच की जरूरत पड़ सकती है।
अवैध खनन को कानूनी मंजूरी क्यों दी गई?
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने राजस्थान सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से कई सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि जब अवैध खनन की शिकायतें मिल रही थीं, तब अधिकारियों ने खनन के उन पट्टों को कानूनी मंजूरी क्यों दे दी? जस्टिस मेहता ने सवाल उठाया कि क्या सरकार सिर्फ एक आदेश जारी करके अवैध खनन को कानूनी बना रही है?
उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने अपना रवैया नहीं बदला और सही कदम नहीं उठाए तो कोर्ट को CBI जांच का आदेश देना पड़ सकता है। ऐसा हुआ तो सरकार के कई अधिकारी मुश्किल में पड़ सकते हैं।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि नदियों के बहाव वाले इलाकों में लगातार खनन के पट्टे दिए जा रहे हैं। ऐसे में नदियों में पानी का प्राकृतिक बहाव कैसे बना रहेगा?
1782 मीटर चौड़ा पुल, लेकिन नदी का बहाव सिर्फ 8 मीटर?
सुप्रीम कोर्ट ने जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के कामकाज पर भी गंभीर सवाल उठाए। मामला नदी में बाढ़ के दौरान पानी कहां तक फैल सकता है, इसकी सीमा तय करने से जुड़ा था। अधिकारियों ने यह सीमा तय करने के लिए उस समय के बहाव को आधार बना लिया, जब नदी में पानी बहुत कम रहता है।
कोर्ट ने बालोतरा में लूनी नदी पर बने पुल का उदाहरण दिया। यह पुल करीब 1782 मीटर चौड़ा है। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में नदी के बहाव की चौड़ाई सिर्फ 8 मीटर दिखाई गई है। इस पर जस्टिस मेहता ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि यह समझ से परे है कि इतना चौड़ा पुल होने के बावजूद नदी का बहाव सिर्फ 8 मीटर कैसे बताया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी गलत जानकारी देकर अदालत को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। जिस अधिकारी ने नदी की सीमा को लेकर गलत जानकारी वाला पत्र जारी किया है, उसे तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए।
प्रदूषण रोकने का खर्च सरकार को भी उठाना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नदियों को साफ करने और प्रदूषित पानी को रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ उद्योगों या नगर निकायों की नहीं है। कोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार ने भी अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए। इसलिए प्रदूषण की जिम्मेदारी से सरकार बच नहीं सकती।
कोर्ट ने कहा कि जो प्रदूषण फैलाने के लिए जिम्मेदार है, उसे सफाई का खर्च भी उठाना होगा। यह नियम राज्य सरकार पर भी लागू होगा। अदालत ने साफ किया कि कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) और जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) प्लांट लगाने का पूरा खर्च केवल उद्योगों और नगर निकायों पर नहीं डाला जा सकता। CETP में उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ किया जाता है। वहीं, ZLD तकनीक में पानी को साफ करके दोबारा इस्तेमाल करने की व्यवस्था होती है, ताकि गंदा पानी बाहर न छोड़ा जाए।
ZLD प्लांट के लिए सरकार को देना होगा पैसा
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को अगली सुनवाई तक एक ठोस प्रस्ताव पेश करने को कहा है। इसमें सरकार को बताना होगा कि ZLD प्लांट लगाने के लिए कितनी आर्थिक मदद या अनुदान दिया जा सकता है। साथ ही नदियों को फिर से साफ करने और उनका प्राकृतिक बहाव बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
सुनवाई के दौरान उद्योगों की आर्थिक स्थिति का मुद्दा भी उठा। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुछ हजार लोगों के रोजगार या उद्योग चलाने की आर्थिक मजबूरियों की तुलना उन 20 लाख लोगों की जिंदगी से नहीं की जा सकती, जो प्रदूषण की वजह से बेहद खराब हालात में रहने को मजबूर हैं। कोर्ट ने साफ किया कि लोगों की जिंदगी और पर्यावरण की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया है कि वह नदियों को फिर से साफ करने और उनके प्राकृतिक बहाव को बनाए रखने की योजना पेश करे। इसके साथ ही सरकार को यह भी बताना होगा कि नियमों का पालन करने वाले उद्योग किस तरह अपना काम जारी रख सकेंगे। मामले की अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी। तब सरकार को प्रदूषण रोकने, नदियों की हालत सुधारने और ZLD प्लांट लगाने के लिए आर्थिक मदद की योजना कोर्ट के सामने रखनी होगी।