जोधपुर के मेडिकल कॉलेज में रैगिंग का सनसनीखेज मामला, बेखौफ सीनियर्स की प्रताड़ना से सहमीं छात्राएं
नरेश रमेश @ जोधपुर
शिक्षा के मंदिर और डॉक्टरी जैसे पवित्र पेशे की दहलीज़ पर कदम रखने वाली प्रथम वर्ष की छात्राओं के साथ जो घटित हुआ, उसने जोधपुर के प्रतिष्ठित डॉ. संपूर्णानंद मेडिकल कॉलेज (SNMC) को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
गर्ल्स हॉस्टल में सीनियर छात्राओं द्वारा नई एडमिशन लेने वाली छात्राओं का मानसिक उत्पीड़न, डराना-धमकाना और उनका शोषण करने का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। यूजीसी की एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायत (संख्या RJ_0279) ने मेडिकल कॉलेज प्रशासन और व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है।
दबदबे और वर्चस्व की आड़ में कैसा मनोरंजन?
आखिर क्यों एक प्रतिष्ठित संस्थान में नवागत छात्राओं को मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ रही हैं? मिली जानकारी के अनुसार, सीनियर्स द्वारा अपना खोखला दबदबा और वर्चस्व स्थापित करने के उद्देश्य से प्रथम वर्ष की छात्राओं को लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था। मनोरंजन के नाम पर देर रात 11:00 बजे से 12:00 बजे के बीच कमरों से बाहर निकालकर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और उन पर तुगलकी नियम थोपना कौन सा अनुशासन है?
बॉस कहो, नजरें झुकाओ: क्या यही है कैंपस का माहौल?
पीड़ित छात्रा की शिकायत के अनुसार, हॉस्टल में कदम रखते ही उन्हें सीनियर की ओर से लगभग 90 मोबाइल नंबरों की एक लंबी सूची थमा दी गई। फरमान जारी हुआ कि प्रत्येक नंबर पर अपना पूरा परिचय भेजा जाए, बातचीत केवल हिंदी में हो और सीनियर्स को "बॉस" (Boss) कहकर ही संबोधित किया जाए- चाहे मैसेज हो या आमने-सामने की मुलाकात।
इतना ही नहीं, सीनियर्स के पूरे गुट के सदस्यों के गृह जिलों के नाम याद करने की कड़क हिदायत दी गई और सीनियर्स से नजरें मिलाने तक पर पाबंदी लगा दी गई। इस खौफनाक माहौल के कारण हॉस्टल की छात्राएं गहरे मानसिक तनाव और डर के साय में जीने को मजबूर हैं।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश, फिर भी क्यों सुस्त है कॉलेज प्रशासन?
राष्ट्रीय एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन (UGC) ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कॉलेज प्रशासन को कड़े निर्देश जारी किए हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के आदेशों का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यदि मामला संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है, तो सूचना मिलने के 24 घंटे के भीतर स्थानीय पुलिस में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करवाई जाए।
हेल्पलाइन ने साफ कर दिया है कि केवल 'एंटी-रैगिंग कमेटी' की जांच ही मान्य होगी और पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाए।
प्राचार्या एवं नियंत्रक का फोन न उठाना: संवेदनहीनता या पर्दाफाश का डर?
इस पूरे प्रकरण में कॉलेज प्रशासन का रवैया सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। जब इस सनसनीखेज रैगिंग (Ragging) और उस पर की गई कार्रवाई की जानकारी लेने के लिए कॉलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. बी.एस. जोधा से संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो उन्होंने फोन उठाना तक उचित नहीं समझा।
- आखिर प्राचार्य डॉ. जोधा फोन उठाने से क्यों बच रहे हैं?
- क्या मेडिकल कॉलेज प्रशासन रैगिंग जैसी गंभीर घटना पर लीपापोती करने की कोशिश कर रहा है?
- पीड़ित छात्राओं की सुरक्षा और 24 घंटे के भीतर FIR दर्ज कराने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया जा रहा?
पीड़ित छात्रा ने सबूत के तौर पर 90 नंबरों की सूची सौंपने की बात कही है। अब देखना यह होगा कि कॉलेज प्रशासन और पुलिस प्रशासन इस गुंडागर्दी पर क्या सख्त कदम उठाते हैं या फिर किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार करते हैं?