राजस्थान में सूखे की मार: पानी-चारे का संकट अपार; 14 जिलों की 80 तहसीलें बेहाल, सर्दियों में टैंकरों की तैयारी

Ashish Bhardwaj | Oct 26, 2026, 14:24 IST
राजस्थान के 14 जिलों को किया सूखाग्रस्त घोषित
राजस्थान में कम बारिश के बाद सरकार ने 14 जिलों की 80 तहसीलों को 6 महीने के लिए सूखाग्रस्त घोषित किया है। इनमें 69 तहसीलें गंभीर रूप से प्रभावित हैं। बांधों में पिछले साल से काफी कम पानी बचा है। सरकार ने सर्दियों में पेयजल संकट से निपटने के लिए कलेक्टरों को 75 लाख रुपए तक के आपात कार्य मंजूर करने का अधिकार भी दिया है।

राजस्थान में बारिश की कमी का असर अब साफ दिखने लगा है। कई इलाकों में खरीफ की फसल प्रभावित हुई है। बांधों में पानी पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। गांवों में पशुओं के लिए चारे और पीने के पानी की परेशानी भी बढ़ने लगी है। इसी स्थिति को देखते हुए भजनलाल सरकार ने प्रदेश के 14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। अब सर्दियों में ही पानी के टैंकर चलाने और नए ट्यूबवेल लगाने की तैयारी शुरू हो गई है।



आपदा प्रबंधन, सहायता एवं नागरिक सुरक्षा विभाग ने 24 और 25 अक्टूबर को दो नोटिफिकेशन जारी किए हैं। पहले नोटिफिकेशन में 13 जिलों की 53 तहसीलें शामिल थीं। दूसरी में 27 तहसीलें और जोड़ी गईं। बीकानेर को भी सूची में शामिल किया गया। इस तरह सूखा प्रभावित जिलों की संख्या बढ़कर 14 हो गई। इन 80 तहसीलों में 69 को गंभीर और 11 को मध्यम सूखा प्रभावित माना गया है। दोनों नोटिफिकेशन जारी होने की तारीख से 6 महीने तक लागू रहेंगे। सूखे का आकलन केंद्र सरकार (Central government) की ड्रॉट (सूखा) मैनेजमेंट मैनुअल, 2016 के आधार पर किया गया है। इसमें बारिश, फसलों की स्थिति और जमीन के ऊपर और ग्राउंड वॉटर की स्थिति को देखा गया।



जोधपुर सबसे ज्यादा प्रभावित, बाड़मेर-जालोर भी बेहाल

सूखे का सबसे ज्यादा असर पश्चिमी राजस्थान में सामने आया है। जोधपुर की 12 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। इसके बाद बाड़मेर और जालोर की 10-10 तहसीलें हैं। बालोतरा की 9 और पाली की 8 तहसीलें भी सूची में शामिल हैं।




जोधपुर की 12 में से 11 तहसीलें गंभीर सूखे की चपेट में हैं। पीपाड़ शहर को मध्यम श्रेणी में रखा गया है। बाड़मेर, जालोर, बालोतरा और पाली की सभी सूचीबद्ध तहसीलें गंभीर सूखा प्रभावित हैं। जैसलमेर और फलोदी में छह-छह तहसीलें गंभीर श्रेणी में हैं।



राजस्थान में मॉनसून में कितनी कम बारिश हुई?

राज्य के जल संसाधन विभाग की 30 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान में एक जून से 30 सितंबर के बीच औसतन 424.71 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन इस बार केवल 350.83 मिलीमीटर बारिश हुई। यानी सामान्य से 73.88 मिलीमीटर या करीब 17.4 फीसदी कम।



प्रदेश के 41 जिलों में से 14 में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई। 24 जिलों में बारिश सामान्य रही और तीन जिलों में सामान्य से ज्यादा हुई। हालांकि सूखे का फैसला केवल बारिश के आंकड़ों से नहीं हुआ। फसलों को हुए नुकसान और पानी की उपलब्धता को भी ध्यान में रखा गया। पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों में हालात ज्यादा खराब हैं। पाली, जैसलमेर, जालोर, जोधपुर और सिरोही जैसे जिलों में बारिश की कमी का सीधा असर खेती और पानी के स्रोतों पर पड़ा है।



बांधों में पिछले साल से करीब 32% कम पानी

राजस्थान के बांधों में बारिश कम होने से पानी तेजी से घटा है। 16 अक्टूबर के आंकड़ों के मुताबिक, प्रदेश के जलाशयों में करीब 8014 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) पानी बचा था। यह उनकी कुल क्षमता का 61.5 फीसदी है। पिछले साल इसी अवधि के दौरान करीब 11794 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) पानी था। तब बांध 90.5 प्रतिशत तक भरे हुए थे। यानी एक साल में पानी का भंडार करीब 3780 MCM कम हो गया। यह पिछले साल के मुकाबले करीब 32 फीसदी की गिरावट है।



चिंता की बात यह है कि अभी सर्दियां शुरू नहीं हुईं हैं । गर्मियों में पानी की मांग और बढ़ेगी। ऐसे में क्षमता से कम भरे बांधों से आने वाले महीनों में पेयजल सप्लाई बनाए रखना मुश्किल हो सकता। खासकर उन गांवों में परेशानी बढ़ सकती है, जहां पानी के दूसरे स्रोत पहले से कमजोर हैं।



राजस्थान में जमीन के नीचे भी पानी का संकट

सिर्फ बांध ही नहीं, राजस्थान में जमीन के नीचे मौजूद पानी यानी ग्राउंड वाटर की स्थिति भी चिंताजनक है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के आकलन के मुताबिक, प्रदेश की 302 भूजल आकलन इकाइयों में से 213 में जरूरत से ज्यादा पानी निकाले जाने की पुष्टि हुई थी। यानी करीब 70.5 प्रतिशत इलाकों में भूजल पर बहुत ज्यादा दबाव की बात सामने आई थी। इसके अलावा 23 यूनिट क्रिटिकल श्रेणी में हैं। इसका सीधा मतलब है कि कई जगह जमीन से जितना पानी निकाला जा रहा है, उसकी भरपाई पर्याप्त नहीं हो पा रही।



बारिश कम होने से भूजल का संकट और बढ़ सकता है। बांधों और तालाबों में पानी घटने पर लोग ट्यूबवेल और कुओं पर ज्यादा निर्भर होते हैं। इससे पहले से दबाव झेल रहे भूजल स्रोतों की परेशानी और बढ़ सकती है।



पानी और चारे के लिए राजस्थान सरकार क्या कर रही?

सूखाग्रस्त इलाकों में सबसे बड़ी जरूरत पानी और चारे की है। पश्चिमी राजस्थान में बड़ी आबादी आज भी खेती के साथ पशुपालन पर निर्भर हैं। फसल खराब होने और चारे की कमी से उनकी आमदनी पर दोहरी मार पड़ सकती है। बाड़मेर में जिला कलेक्टर चिन्मयी गोपाल ने पहले चरण में 10 चारा डिपो खोलने की मंजूरी दी है। ये डिपो शिव,रामसर और गडरारोड तहसीलों की ग्राम सेवा सहकारी समितियों के जरिए चलेंगे। इन केंद्रों से पात्र पशुपालकों को रियायती दर पर चारा दिया जाएगा। व्यवस्था नो-प्रॉफिट, नो-लॉस के आधार पर चलेगी। प्रशासन ने पशु शिविरों और जरूरत वाले गांवों में टैंकरों से पानी पहुंचाने की तैयारी भी की है।



मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पहले ही बाड़मेर और जैसलमेर में आपात पेयजल व्यवस्था और टैंकर सप्लाई 31 दिसंबर तक जारी रखने की घोषणा कर चुके हैं। इन दोनों जिलों के कलेक्टर को जरूरी राहत कार्यों के लिए एक करोड़ रुपए तक की मंजूरी देने का अधिकार भी दिया गया है।



सर्दियों में ही पानी के संकट से निपटने का प्लान

आमतौर पर राजस्थान में पानी की कमी गर्मियों में ज्यादा महसूस होती है, लेकिन इस बार हालात अलग हैं। बारिश कम होने के कारण सरकार ने अक्टूबर से दिसंबर के लिए भी पेयजल का अलग इमरजेंसी प्लान तैयार किया है। इसके तहत जिला कलेक्टर अपने जिले में पीने के पानी से जुड़े आपात कार्यों पर 75 लाख रुपए तक खर्च की मंजूरी दे सकेंगे। यह व्यवस्था अक्टूबर से दिसंबर 2026 के लिए की गई है। हालांकि, जरूरत पड़ने पर इसे बढ़ाया भी जा सकता है।



जलदाय विभाग उन इलाकों की पहचान कर रहा है, जहां आने वाले महीनों में पानी की सप्लाई प्रभावित हो सकती। इसके लिए गांवों के कुओं, ट्यूबवेल, बांधों और दूसरे जल स्रोतों की स्थिति देखी जा रही है।



जहां जरूरत होगी, वहां नए ट्यूबवेल खोदे जाएंगे। खराब मोटर और पंप बदले जाएंगे। टूटी पाइपलाइन की मरम्मत होगी। जिन गांवों में नियमित सप्लाई संभव नहीं होगी, वहां अतिरिक्त टैंकर लगाए जाएंगे।



प्रदेश के कितने जिलों में पानी की ज्यादा चिंता?

PHED डिपार्टमेंट के मुताबिक, राजस्थान के 41 जिलों में से 14 में बहुत कम बारिश हुई है। वहीं, 12 जिलों में औसत से कम बारिश दर्ज की गई। बाकी 15 जिलों में बारिश सामान्य रही। हालांकि, कम बारिश वाले इन 14 जिलों और सरकार की ओर से सूखाग्रस्त घोषित 14 जिलों की सूची अलग है। क्योंकि सूखा घोषित करते समय बारिश के साथ फसलों की हालत और पानी की उपलब्धता भी देखी जाती है।



विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कोटा, झालावाड़, डीग और बांसवाड़ा में फिलहाल पीने के पानी की स्थिति बेहतर है। वहीं, उत्तर और उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के कई इलाकों में पानी की कमी से परेशानी बढ़ सकती है।



सरकार ने गर्मियों के लिए भी अभी से तैयारी शुरू कर दी है। मकसद है कि अप्रैल-मई में पानी की मांग बढ़ने से पहले कमजोर इलाकों में वैकल्पिक इंतजाम किए जा सकें।



सूखे से गांवों में रोजगार पर भी असर पड़ने की आशंका

सूखे का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेगा। फसल खराब होने से किसानों की कमाई घट सकती। पशुओं के लिए चारा खरीदना भी महंगा पड़ सकता। जिन परिवारों की रोजी-रोटी खेती और पशुपालन पर टिकी है, उनके सामने रोजगार की परेशानी बढ़ सकती है।



ऐसे में प्रभावित गांवों में रोजगार के अवसर बनाए रखना भी सरकार के लिए चुनौती होगी। जरूरत पड़ने पर ग्रामीण रोजगार योजनाओं के जरिए काम उपलब्ध कराने और पात्र परिवारों को राहत पहुंचाने की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, सरकार ने इसे लेकर अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की है।



पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी सूखा घोषित करने में देरी को लेकर सरकार पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने फसल नुकसान, पानी और चारे की कमी का मुद्दा कई बार उठाया है। साथ ही चारा डिपो, पशु शिविर और टैंकरों से पानी पहुंचाने की मांग भी की है। फिलहाल सरकार ने 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। अधिकारियों के मुताबिक, आगे हालात बिगड़ने पर और तहसीलें सूची में शामिल की जा सकती हैं। इसके लिए दोबारा आकलन होगा।



राजस्थान में सूखे की स्थिति को देखते हुए सरकार ने प्रभावित इलाकों के लिए राहत की तैयारी शुरू कर दी है, लेकिन असली चुनौती इन इंतजामों का फायदा समय पर गांवों तक पहुंचाने की है। किसानों को फसल के नुकसान से राहत मिले, पशुपालकों को सस्ती दरों पर चारा मिले और लोगों को पीने के पानी के लिए परेशान न होना पड़े। इसके लिए प्रशासन को अभी से पुख्ता इंतजाम करने होंगे। क्योंकि इस बार राजस्थान में पानी का संकट गर्मियां आने से पहले ही चिंता बढ़ाने लगा है।

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