SMS अस्पताल के 24 मंजिला IPD टावर में बनेगी GIS बिल्डिंग, बिजली व्यवस्था पर खर्च होंगे ₹1.62 करोड़

Jyoti Mahender Bhardwaj | Oct 09, 2026, 15:07 IST
एसएमएस अस्पताल के 24 मंजिला टावर के लिए जेडीए खर्च करेगा 1.62 करोड़
एसएमएस अस्पताल के लिए जीआईएस आधारित बिजली व्यवस्था की निर्माण प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इस परियोजना पर जयपुर विकास प्राधिकरण 1.62 करोड़ रुपये खर्च करेगा। जीआईएस सब-स्टेशन हाई-वोल्टेज उपकरणों के लिए एक सुरक्षित समाधान प्रस्तुत करेगा। यह परियोजना सैकड़ों मरीजों की चिकित्सा सेवाओं के लिए 24x7 बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करेगी।

समझें क्या है पूरा मामला

  • एसएमएस अस्पताल के 24 मंजिला आईपीडी टावर में जीआईएस बिल्डिंग बनेगी।
  • जेडीए इस पर 1.62 करोड़ रुपए खर्च करेगा और टेंडर जारी हो चुके हैं।
  • जीआईएस के हाई-वोल्टेज उपकरण बंद मेटल एनक्लोजर में लगेंगे।
  • इससे ICU, ऑपरेशन थिएटर, वेंटिलेटर, एमआरआई और सीटी स्कैन की बिजली ज्यादा सुरक्षित रहने की बात कही गई है।
  • जीआईएस सिस्टम ओपन-एयर सब-स्टेशन की तुलना में करीब 80 प्रतिशत तक कम जगह घेर सकता है।

एसएमएस अस्पताल आईपीडी टावर जीआईएस आधारित बिजली व्यवस्था से लैस होगा। जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) 24 मंजिला आईपीडी टावर के लिए जीआईएस बिल्डिंग बनवाएगा। इस पर 1.62 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके लिए टेंडर जारी कर दिए गए हैं। यह व्यवस्था परंपरागत ओपन-एयर सब-स्टेशन की जगह लेगी। जयपुर एसएमएस अस्पताल बिजली व्यवस्था को आंधी, बारिश और धूल जैसे खतरों से बचाने पर जोर है। इसका मकसद ICU, ऑपरेशन थिएटर और वेंटिलेटर को लगातार बिजली देना है।



जीआईएस सब-स्टेशन क्या है और कैसे काम करता है?

जीआईएस यानी गैस इंसुलेटेड स्विचगियर। यह हाई-वोल्टेज बिजली को कंट्रोल करने, स्विच करने और बांटने वाला सिस्टम है। इसके उपकरण एक सुरक्षित इनडोर सिस्टम में लगाए जाते हैं।



गैस इंसुलेटेड स्विचगियर जीआईएस बिल्डिंग में सर्किट ब्रेकर, बस-बार, आइसोलेटर, वोल्टेज ट्रांसफॉर्मर और अर्थिंग स्विच लगते हैं। ये सभी सीलबंद मेटल एनक्लोजर में रहते हैं। इसमें उपकरणों को खुले वातावरण में नहीं रखा जाता। उन्हें गैस-इंसुलेटेड मेटल चैंबर में रखा जाता है। इससे उपकरणों के बीच सुरक्षित इंसुलेशन बना रहता है।




स्पार्किंग और शॉर्ट-सर्किट का जोखिम कैसे घटेगा?

सोर्स के अनुसार, बंद चैंबर में उपकरण रखने से स्पार्किंग और इलेक्ट्रिकल फॉल्ट का खतरा कम होता है। उपकरण इनडोर होने से मेंटेनेंस भी अपेक्षाकृत कम होता है। सवाल यह है कि अस्पताल जैसी जगह पर बिजली की इतनी सुरक्षा क्यों जरूरी है?



आईसीयू ओटी वेंटिलेटर 24x7 बिजली सप्लाई क्यों जरूरी?

आईपीडी टावर में एक साथ सैकड़ों मरीजों का इलाज होगा। यहां ICU, वेंटिलेटर, ऑपरेशन थिएटर, डायग्नोस्टिक मशीनें और अन्य लाइफ-सपोर्ट सिस्टम चलेंगे। ऐसे में बिजली में थोड़ी देर की बाधा भी गंभीर हो सकती है। इसी जरूरत को देखते हुए टावर के लिए कॉम्पैक्ट और हाई-रिलायबिलिटी जीआईएस आधारित पावर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है।



खुले सब-स्टेशन की तुलना में जीआईएस के उपकरण बंद मेटल एनक्लोजर में रहते हैं। इसलिए आंधी, बारिश, धूल, तेज गर्मी और बाहरी वातावरण से फॉल्ट का जोखिम कम रहता है। ICU, ऑपरेशन थिएटर, वेंटिलेटर, एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी सेवाओं की बिजली ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद रहेगी, ऐसा कहा गया है।




ओपन-एयर सब-स्टेशन बनाम जीआईएस: कितनी जगह बचेगी?

एसएमएस अस्पताल जैसे घने और व्यस्त परिसर में जमीन की कमी बड़ी चुनौती है। सामान्य ओपन-एयर ग्रिड सब-स्टेशन के मुकाबले जीआईएस सिस्टम करीब 80 प्रतिशत तक कम जगह में लग सकता है। इसी कारण आईपीडी टावर के लिए कॉम्पैक्ट जीआईएस बिल्डिंग चुनी गई है।



जीआईएस सब-स्टेशन 80 प्रतिशत कम जगह कैसे घेरता है?

सोर्स के अनुसार जीआईएस सब-स्टेशन सामान्य ओपन-एयर सब-स्टेशन से 70 से 80 प्रतिशत कम जगह घेर सकता है। यानी समान क्षमता का सिस्टम 20 से 30 प्रतिशत जगह में लग जाता है।



उदाहरण के तौर पर 10,000 वर्गफीट के सामान्य सब-स्टेशन की जगह जीआईएस में 2,000 से 3,000 वर्गफीट लगेंगे। 5,000 वर्गफीट वाले सब-स्टेशन की जगह जीआईएस में 1,000 से 1,500 वर्गफीट लगेंगे। ये तुलनात्मक उदाहरण हैं, वास्तविक निर्माण क्षेत्र नहीं।




जेडीए का टेंडर और आगे क्या?

जेडीए इस जीआईएस बिल्डिंग पर 1.62 करोड़ रुपए खर्च करेगा। इसके लिए टेंडर जारी कर दिए गए हैं। अब नजर इस पर रहेगी कि टेंडर कब तक अंतिम होता है और जीआईएस बिल्डिंग का काम कब शुरू होता है। टेंडर में काम पूरा करने की समयसीमा या टावर के शुरू होने की तारीख सोर्स में नहीं दी गई है।



यह खबर क्यों जरूरी है:


एसएमएस राजस्थान के बड़े सरकारी अस्पतालों में गिना जाता है। यहां इलाज के लिए बड़ी संख्या में मरीज आते हैं। ICU और ऑपरेशन थिएटर में बिजली जाने का मतलब मरीज की जान पर खतरा हो सकता है। इसलिए अस्पताल की बिजली व्यवस्था की सुरक्षा सीधे मरीजों से जुड़ा मुद्दा है। जमीन की कमी वाले परिसर में कम जगह में बनने वाली तकनीक भी अहम है। आम लोगों को जानना चाहिए कि सरकारी पैसा किस काम पर खर्च हो रहा है।



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