सोनम वांगचुक ने जेल के अनुभवों पर लिखी किताब, पत्नी बोलीं-जल्द होगी लॉन्च
News In Short
- जोधपुर जेल में सोनम वांगचुक ने लिखी किताब 'Forever Positive'।
- किताब में जेल के अनुभव, सकारात्मक सोच और कठिन हालात में मानसिक मजबूती की कहानी होगी।
- जेल के दौरान पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो बनी रहीं उनका सबसे बड़ा सहारा।
- जेल में मिलने वाले अखबारों में लद्दाख से जुड़ी खबरों के हिस्से पहले ही काट दिए जाते थे।
- जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए चींटियों से सीखा संघर्ष का सबक।
News In Detail
जागेश्वर प्रसाद @ जयपुर
लद्दाख के मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अब जोधपुर सेंट्रल जेल से रिहा हो चुके हैं। वे करीब 169 दिन तक जेल में बंद रहे। इस दौरान उन्होंने जेल के अपने अनुभवों को शब्द देने का फैसला किया। उन्होंने एक नई किताब लिखनी शुरू की, जिसका संभावित नाम “Forever Positive” बताया जा रहा है। उनकी पत्नी गीतांजलि के मुताबिक यह किताब सोनम वांगचुक के जेल के अनुभव, सकारात्मक सोच और कठिन हालात में मानसिक मजबूती की कहानी होगी।
सादगी और अनुशासन में गुजरा जेल का समय
गीतांजलि का कहना है कि जेल में वांगचुक के दिन बेहद सादगी और अनुशासन में गुजरे। उन्हें एक सामान्य कोठरी में रखा गया था। न बिस्तर था और न कोई फर्नीचर। फर्श पर सिर्फ एक कंबल बिछाकर ही उन्हें सोना पड़ता था। उनके पास न घड़ी थी और न कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण। ऐसे माहौल में समय का अंदाजा लगाने के लिए सनडायल यानी धूप घड़ी से जुड़ी किताबें मंगवाई थीं।
पत्नी बनी सबसे बड़ा सहारा
जेल के बाहर उनकी पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो लगातार उनके समर्थन में खड़ी रहीं। वे समय-समय पर उनसे मिलने जेल भी जाती थीं। सोशल मीडिया के जरिए उनकी बातें लोगों तक उनकी बात पहुंचाती थीं।
गीतांजलि ने बताया कि वांगचुक ने जेल में रहते हुए कई किताबें पढ़ीं। इनमें श्री अरविंदो की ‘Tales of Prison Life’ खास रही, जिसमें अलीपुर जेल में बिताए गए एक साल के अनुभव लिखे गए हैं। इसके अलावा उन्होंने Richard Bach की ‘Jonathan Livingston Seagull’ और ‘Mister God, This Is Anna’ जैसी किताबें भी पढ़ीं।
अनुशासित दिनचर्या और वो कटे हुए अखबार
बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह कटे होने के बावजूद वांगचुक ने अपनी दिनचर्या को मजबूत बनाए रखा। हर दिन विपश्यना ध्यान, योग और सूर्य नमस्कार उनके जीवन का हिस्सा रहे।
जेल में उन्हें अखबार तो मिलते थे, लेकिन उनसे जुड़ी या लद्दाख से जुड़ी खबरों के हिस्से पहले ही काट दिए जाते थे। जब भी अखबार में कटे हुए हिस्से दिखते, वे समझ जाते थे कि उस दिन उनके बारे में कोई खबर छपी होगी।
चींटियों से सीखा संघर्ष का सबक
कारावास के दौरान जब बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग खत्म हो गया, तब वांगचुक ने अपनी कोठरी में रेंगती चींटियों को ही अपना साथी बना लिया।
वे घंटों उन्हें देखते और उनके अनुशासन तथा एकजुटता से प्रभावित होते। उन्हें लगता था कि जैसे छोटी-सी चींटियां मिलकर बड़े काम कर सकती हैं, वैसे ही लोग मिलकर लद्दाख के लिए बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
इसी जिज्ञासा के चलते उन्होंने पत्नी से ‘Ants: Workers of the World’ नाम की किताब भी मंगवाई, जिसमें चींटियों की दुनिया और उनके व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन है। यह किताब उनके बड़े भाई ने तोहफे के रूप में दी थी।
जेल में भी इंजीनियर वाला दिमाग चलता रहा
जेल में रहते हुए भी वांगचुक की वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग वाली सोच लगातार सक्रिय रही। उन्होंने जेल प्रशासन और सुप्रीम कोर्ट से थर्मामीटर उपलब्ध कराने की मांग की थी।
उनका विचार था कि बैरकों के तापमान का अध्ययन करके प्राकृतिक तरीके से जेल की इमारतों को गर्मी और सर्दी में बेहतर बनाने पर प्रयोग किया जा सकता है। यह उनकी पर्यावरण-अनुकूल वास्तुकला की सोच को भी दिखाता है।
लैपटॉप मिला, लेकिन इंटरनेट नहीं
जेल में उन्हें एक लैपटॉप भी दिया गया था। हालांकि उसमें इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। यह लैपटॉप उन्हें इसलिए दिया गया था ताकि वे NSA के तहत उनकी हिरासत से जुड़े 23 वीडियो देख सकें, जो पेन ड्राइव के जरिए भेजे गए थे। बाद में इस मामले में विवाद भी हुआ, क्योंकि वांगचुक ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उस पेन ड्राइव से चार अहम वीडियो गायब थे, जो उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार बताए गए थे।
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