सूरजगढ़ विधायक श्रवण कुमार के बेटे का पर्चा रद्द, विधायक पुत्र ने लगाया था कोर्ट का फर्जी आदेश

Ashish Bhardwaj | Oct 21, 2026, 15:05 IST
कांग्रेस विधायक श्रवण के बेटे जयप्रकाश
राजस्थान के झुंझुनूं जिले में सूरजगढ़ पंचायत समिति के वार्ड 7 से पंचायत चुनाव लड़ने पहुंचे कांग्रेस विधायक श्रवण के बेटे जयप्रकाश का नामांकन निरस्त कर दिया गया। उन पर आरोप है कि उन्होंने कोर्ट का फर्जी आदेश दिया था। नामांकन के लिए मतदाता सूची में समय पर नाम नहीं जुड़वाने के कारण उनका नामांकन रद्द किया गया है।

राजस्थान के पंचायती राज चुनाव में सूरजगढ़ से कांग्रेस विधायक श्रवण कुमार के बेटे जयप्रकाश के नामांकन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और चुनाव लड़ने का रास्ता साफ कराने के लिए एसडीएम कार्यालय में हाईकोर्ट के आदेश की कॉपी भेजी गई थी। निर्वाचन आयोग ने आदेश की प्रमाणित प्रति मांगी, लेकिन वह उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके बाद सूरजगढ़ पंचायत समिति के वार्ड 7 से जयप्रकाश का नामांकन निरस्त कर दिया गया।



जयप्रकाश ने दी मामले में सफाई

यह मामला इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि हाईकोर्ट में मतदाता सूची से जुड़ी याचिका पर अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को तय की गई थी। दूसरी तरफ जयप्रकाश ने फर्जी आदेश भेजने के आरोप से इनकार किया है। उनका कहना है कि उन्होंने नामांकन के साथ कोई आदेश नहीं लगाया। ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि आदेश की कॉपी किसने और किस आधार पर एसडीएम कार्यालय भेजी।



नगर पालिका की सूची में था नाम

जयप्रकाश का नाम सूरजगढ़ नगर पालिका के वार्ड 25 की मतदाता सूची में दर्ज था। वे पंचायत चुनाव में उतरना चाहते थे, इसलिए जीणी ग्राम पंचायत की मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए आवेदन किया। लेकिन चुनाव अधिसूचना जारी होने से 10 दिन पहले तक ही नाम जोड़ने की समयसीमा थी। अवधि निकल जाने के कारण बूथ लेवल ऑफिसर ने उनका नाम जोड़ने से इनकार कर दिया।



इसके बाद जयप्रकाश ने 15 अक्टूबर को राजस्थान हाईकोर्ट (Rajasthan Highcourt) में याचिका दायर की। 16 अक्टूबर को मामले की सुनवाई हुई और अदालत ने अगली तारीख 27 अक्टूबर तय कर दी। इसी दौरान जयप्रकाश सूरजगढ़ पंचायत समिति के वार्ड 7 से नामांकन दाखिल करने पहुंचे। उनकी दावेदारी के लिए जीणी पंचायत की मतदाता सूची में नाम होना जरूरी था।



आयोग ने मांगी प्रमाणित प्रति

नामांकन के दौरान हाईकोर्ट के आदेश की एक कॉपी सामने आने की बात कही गई। रिटर्निंग ऑफिसर (returning officer) ने इस मामले में निर्वाचन आयोग से मार्गदर्शन मांगा। आयोग ने आदेश की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराने को कहा, लेकिन वह नहीं दी गई। इसके बाद नामांकन खारिज कर दिया गया।



एसडीएम और रिटर्निंग ऑफिसर संदीप चौधरी के अनुसार, नामांकन के दौरान आदेश का प्रिंट लगाया गया था। आयोग से सलाह मांगी गई थी और प्रमाणित प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके बाद निर्वाचन प्रक्रिया के तहत नामांकन निरस्त किया गया।



जयप्रकाश बोले- मुझे जानकारी नहीं

जयप्रकाश ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया। उनका कहना है कि उन्होंने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए अदालत में याचिका जरूर लगाई थी, लेकिन समयसीमा निकल जाने के कारण नाम नहीं जुड़ सका। उन्होंने यह भी कहा कि नामांकन पत्र के साथ कोई आदेश नहीं लगाया था। उनके मुताबिक, किसी दूसरे व्यक्ति ने एसडीएम को कॉपी भेजी होगी और उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।



इस बयान के बाद मामले में एक अहम सवाल उठता है कि यदि जयप्रकाश ने आदेश नहीं भेजा, तो एसडीएम कार्यालय तक उसकी कॉपी कैसे पहुंची। इसका जवाब जांच और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल के बाद ही मिल सकेगा।




फर्जी पाए जाने पर FIR की बात

झुंझुनूं के जिला कलेक्टर डॉ. अरुण गर्ग ने बताया कि सूरजगढ़ के रिटर्निंग ऑफिसर से मामले की जानकारी मिलने के बाद निर्वाचन आयोग को पत्र लिखा गया था। आयोग से आदेश की प्रमाणित प्रति मांगी गई थी, जो उपलब्ध नहीं कराई गई। कलेक्टर के अनुसार, यदि आदेश फर्जी पाया जाता है तो एफआईआर दर्ज कराई जाएगी।



फिलहाल उपलब्ध जानकारी में फर्जी आदेश भेजने के आरोप की अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि जयप्रकाश ने ही फर्जी दस्तावेज भेजा था। जयप्रकाश ने ऐसा करने से इनकार किया है और जिला प्रशासन ने भी एफआईआर को आदेश फर्जी पाए जाने की स्थिति से जोड़ा है।




चुनावी प्रक्रिया के बीच मामला चर्चा में

सूरजगढ़ पंचायत समिति के वार्ड 7 से नामांकन निरस्त होने के बाद यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। अब जांच का केंद्र यह होगा कि एसडीएम कार्यालय में पहुंची कॉपी किसने भेजी, उसका स्रोत क्या था और क्या उसमें अदालत के वास्तविक आदेश से छेड़छाड़ की गई थी।



मामले में अगला कदम दस्तावेजों के सत्यापन पर निर्भर करेगा। यदि जांच में दस्तावेज फर्जी पाया जाता है, तो कानूनी कार्रवाई हो सकती है। तब तक आरोपों को आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।



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