थापर कॉनकस्ट की जमीन 32 साल बाद रीको के कब्जे में, एमनेस्टी स्कीम का बहाना भी नहीं आया काम

Mukesh Sharma | May 12, 2026, 19:18 IST
Photograph: (THE SOOTR)
राजस्थान के भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र में थापर कॉनकस्ट की जमीन 32 साल बाद रीको के कब्जे में आएगी। इस जमीन पर कंपनी ने न केवल तय शर्तों के हिसाब से कोई इकाई लगाई, बल्कि इस मामले को कानूनी विवाद में फंसा दिया।

राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम (RIICO) अब भिवाड़ी औद्योगिक क्षेत्र में थापर कॉनकस्ट लिमिटेड की बेशकीमती जमीन को अपने कब्जे में लेगी। रीको के चेयरमैन आईएएस शिखर अग्रवाल ने हाल ही में जारी एक आदेश में थापर की उस अर्जी को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने रद्द किए गए भूखंड को बहाल करने की गुहार लगाई थी। इस कंपनी ने जमीन मिलने के 32 साल बाद भी कोई औद्योगिक इकाई स्थापित नहीं की और मामले को कानूनी विवाद में फंसा कर रखा।



यह है पूरा मामला

पूरा मामला भिवाड़ी के खुशखेड़ा औद्योगिक क्षेत्र में स्थित 69,130 वर्गमीटर के प्लॉट संख्या एसपी-ई2/2 से संबंधित है। थापर कॉन्कास्ट को 1993 में मात्र 20 रुपए प्रति वर्गमीटर की दर से दी गई थी। शर्त स्पष्ट थी कि कंपनी यहां उद्योग स्थापित कर उत्पादन शुरू करेगी। लेकिन तीन दशक गुजर जाने के बाद भी इस जमीन पर कोई इकाई नही लगाई गई। आज इसी जमीन का बाजार मूल्य 100 करोड़ रुपए से अधिक आंकी जा रहा है।



​​फंसा दिया अदालती दांव-पेच

​आदेश के मुताबिक कंपनी ने आवंटन की तारीख से लेकर 2008 में सिविल केस में अंतरिम आदेश आने तक यानी पूरे 15 साल तक उस भूखंड पर औद्योगिक इकाई शुरू करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया।



आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कंपनी औद्योगिक इकाई स्थापित करने के बजाय केवल मुकदमेबाजी की आड़ में भूखंड को अपने पास रोके रखना चाहती थी। रीको ने इसे अनुमानित होल्डिंग करार दिया है, जिसका उद्देश्य जमीन की कीमतों में वृद्धि का लाभ उठाना हो सकता है, न कि औद्योगिक विकास।



'एमनेस्टी स्कीम' का दावा भी हुआ विफल

​सुनवाई के दौरान कंपनी ने दलील दी कि वे 'एमनेस्टी स्कीम-2023' (छूट योजना) के तहत बकाया शुल्क जमा करने के लिए तैयार हैं और नियमों का पालन करना चाहते हैं। हालांकि, रीको प्रबंधन ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। आदेश में साफ किया गया कि ​एमनेस्टी स्कीम-2023 एक समयबद्ध (Time Bound) योजना थी, जिसकी अवधि समाप्त हो चुकी है। ​भविष्य में नियमों के पालन की इच्छा जताना पुराने दोषों को खत्म नहीं कर सकता।



सरकारी जमीन की बर्बादी बर्दाश्त नहीं

​सूत्रों का कहना है कि औद्योगिक भूखंड विकास के लिए दिए जाते हैं, न कि उन्हें बैंक की तरह लॉक करने के लिए। चेयरमैन ने अपने फैसले में लिखा कि म्यूचुअल विवाद के लंबित होने मात्र से सरकारी जमीन के इतने लंबे समय तक गैर-उपयोग को उचित नहीं ठहराया जा सकता। कंपनी ने आवंटन की आवश्यक शर्तों का उल्लंघन किया है, इसलिए हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।



​यह निर्णय माननीय हाई कोर्ट (सिंगल बेंच) के आदेश दिनांक 07.04.2026 के अनुपालन में की गई सुनवाई के बाद लिया गया है। रीको मुख्यालय में हुई व्यक्तिगत सुनवाई और मौखिक तर्कों के बाद चेयरमैन ने पाया कि कंपनी के अभ्यावेदन (Representation) में कोई दम नहीं है।



दोबारा कंपनी को सौंपने की कोशिश नाकाम

बताया जाता है कि रीको के कुछ अधिकारी इस बेशकीमती जमीन को नियमों को ताक पर रखकर कंपनी को दोबारा सौंपने की कोशिश में थे। लेकिन, मामला मुख्यमंत्री और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो तक पहुंचने के कारण रीको प्रबंधन को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। रीको चैयरमेन के आदेश के बाद अब साफ हो गया है कि खुशखेड़ा (तिजारा) स्थित यह विशाल भूखंड रीको की मिल्कियत बना रहेगा और संबंधित कंपनी का उस पर कोई दावा नहीं होगा।



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