टोंक के किसान नवहिंद ने सफेद चंदन की 50 पौधों से बनाई 'ग्रीन एफडी', 15 साल का सपना

Ashish Bhardwaj | Sept 25, 2026, 16:51 IST
sandalwood tree
नवहिंद चौधरी, 72 साल के किसान, ने अपने खेत में 50 सफेद चंदन के पौधे लगाए हैं। ये पौधे चार वर्षों में उगकर, 15 साल बाद उत्पादन देने के लिए तैयार होंगे। उन्होंने अरणी के पौधे का उपयोग किया है, जो चंदन की वृद्धि में मददगार है। इसके अलावा, कालीमिर्च और सतावरी जैसी औषधीय फसलों की भी खेती कर रहे हैं।

समझें क्या है पूरा मामला

  • टोंक के किसान ने खेत में लगाई 50 सफेद चंदन की पौध।
  • 15 साल बाद तैयार होगी किसान की ‘ग्रीन एफडी’।
  • नवहिंद चौधरी अरणी के साथ कर रहे चंदन की खेती।
  • 72 साल के किसान ने 45 साल में किए कई प्रयोग।
  • चंदन के साथ कालीमिर्च और औषधीय पौधों की भी खेती।

राजस्थान में टोंक जिले के किसान नवहिंद चौधरी ने अपने खेत में सफेद चंदन के 50 पौधे लगाए हैं। उन्होंने चंदन को अरणी नाम के जंगली पौधे के साथ उगाया है। किसान इसे अपनी 'ग्रीन एफडी' मानते हैं। चंदन का पेड़ तैयार होने में करीब 15 साल लगते हैं। 72 साल के किसान नवहिंद करीब 45 साल से खेती पर नए प्रयोग कर रहे हैं।



पैसे जोड़ने के लिए ज्यादातर लोग बैंक में एफडी कराते हैं। पर टोंक के एक किसान ने अपनी एफडी खेत में तैयार की है। यह एफडी है सफेद चंदन के 50 पौधे।



खेत में खड़ी ग्रीन एफडी

किसान के अनुसार चंदन के इन पौधों को लगाए चार साल हो चुके हैं। चंदन का पेड़ करीब 15 साल में पूरी तरह तैयार होता है। यानी इन्हें मैच्योर होने में अभी करीब 10 साल बाकी हैं।



किसान के मुताबिक चंदन की लकड़ी 10 से 12 हजार रुपए किलो तक बिकती है। इसलिए वे इन पौधों को एफडी जैसा मानते हैं। जैसे बैंक में पैसा समय के साथ बढ़ता है, वैसे ही ये पेड़ बढ़ रहे हैं।



अरणिया बना चंदन का साथी

नवहिंद की खेती की सबसे खास बात यह है की अरणी का इस्तेमाल है। गांवों में इसे अरणिया भी कहते हैं। अरण्य का मतलब जंगल होता है, इसी से यह नाम पड़ा। ज्यादातर किसान इस पौधे को बेकार मानते हैं। कई किसान इसे मशीन से उखड़वा देते हैं। पर नवहिंद ने पाया कि अरणिया के साथ चंदन अच्छी तरह बढ़ता है।



उनका कहना है कि जिस खेत में अरणिया हो, वहां चंदन लगाना फायदेमंद है। अरणी का भी दवाओं में उपयोग होता है। बाजार में इसकी मांग भी बनी रहती है।



क्यों चाहिए चंदन को साथी

चंदन अकेले नहीं पनपता। यह सेमी पैरासाइट यानी आंशिक परजीवी पौधा है। इसकी जड़ें पास के पौधों की जड़ों से जुड़ जाती हैं। वहीं से यह पोषण लेता है। इसी वजह से चंदन के साथ दूसरा पौधा लगाना जरूरी होता है। सही साथी पौधा चुनना ही इस खेती की असली कुंजी है।



किन पौधों के साथ लगाएं चंदन

नवहिंद ने चंदन के चार पौधे रतनजोत के साथ लगाए थे। ये चारों पौधे खराब हो गए। उनके मुताबिक जिस पौधे से तेल या दूध निकलता है, उसे चंदन के पास न लगाएं।उनके अनुभव में चंदन के साथ हेज घास लगाई जा सकती है। शुरुआत में अरहर के पौधे भी पोषण देने में मदद करते हैं। नीम, खेजड़ी, नींबू, अमरूद और केर भी साथ लगाए जा सकते हैं।



2022 से शुरू हुआ प्रयोग

वन विभाग के अधिकारियों से सलाह लेने के बाद नवहिंद ने यह प्रयोग शुरू किया। साल 2022 में वे जोधपुर के एक वन अनुसंधान केंद्र से 10 पौधे लाए। एक पौधा करीब 100 रुपए का पड़ा। पौधे यहां की जलवायु में ढल गए। इसके बाद उन्होंने असम के जोरहाट से अगरवुड के 10 पौधे मंगवाए। कई तरीके अपनाने के बाद भी अगरवुड का प्रयोग सफल नहीं हुआ।



11वीं छोड़ी, कारोबार संभाला

नवहिंद ने 1970 में 11वीं की पढ़ाई बीच में छोड़ दी थी। वे बताते हैं कि तब सरकारी नौकरी में करीब 150 रुपए महीना मिलता था। उन्होंने नौकरी के बजाय किराने की दुकान खोली। बाद में कपड़े का कारोबार किया। पावरलूम कपड़ा फैक्ट्री भी लगाई। फिर विस्फोटक का कारोबार शुरू किया। पिता भी खेती करते थे, इसलिए वे खेती से जुड़े रहे। आज उनके पास 60 बीघा जमीन है। इसमें से एक हेक्टेयर को उन्होंने एग्रो फॉरेस्ट्री की प्रयोगशाला बना रखा है।



दिल्ली में उठाई किसानों की बात

नवहिंद के मुताबिक 1994 में उन्हें दिल्ली के एक कार्यक्रम में बुलाया गया। वहां पित्त पापड़ा जैसे खरपतवार पर चर्चा हुई। लाल पगड़ी वाले किसान के तौर पर उन्हें मंच पर बुलाया गया। वहां उन्होंने औषधीय पौधों के लिए बाजार बनाने की मांग रखी। उन्होंने कहा कि खेतों के कई खरपतवार असल में औषधीय पौधे हैं। पर किसानों को इनके उपयोग और बाजार की जानकारी नहीं है।



कालीमिर्च और सतावरी भी लगाए

नवहिंद पिछले दो साल से कालीमिर्च उगाने का प्रयोग कर रहे हैं। इसके 10 पौधे सफल हो चुके हैं। उनके मुताबिक एक बेल से करीब एक किलो कालीमिर्च मिल सकती है। खेत की मेड़ पर उन्होंने सतावरी के 20 पौधे लगाए हैं। एक पौधा करीब दो साल में तैयार होता है। इससे करीब एक किलो तक जड़ मिल सकती है, जिसका पाउडर बनता है।



उन्होंने हाडसांकल, नाकतोड़ा, नरगुड़ी और अर्जुन जैसे पौधे भी लगाए हैं। वे अपने अनुभव दूसरे किसानों से भी साझा कर रहे हैं। उनका मानना है कि जंगली समझे जाने वाले पौधे भी किसान की कमाई बढ़ा सकते हैं।

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