उदयपुर आतंकी हमले में जान गंवाने वाले दो पुलिस अफसर, 40 साल बाद भी शहीद के दर्जे का इंतजार
राजस्थान के उदयपुर में 1986 में हुई आतंकी घटना में जान गंवाने वाले दो पुलिस अधिकारियों के परिवार करीब 40 साल बाद भी न्याय और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। सब इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह शेखावत और रोशन लाल माथुर ने ड्यूटी के दौरान आतंकियों की गोली का सामना किया था, लेकिन उनके परिवारों का कहना है कि अब तक उन्हें शहीद का दर्जा नहीं मिल पाया है। पुलिस शहीद दिवस के मौके पर इन परिवारों का संघर्ष एक बार फिर चर्चा में है। राजेंद्र सिंह शेखावत की बेटी रुचि शेखावत और रोशन लाल माथुर के बेटे सौरभ माथुर अपने पिता को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
16 अप्रैल 1986 की घटना ने उदयपुर को झकझोर दिया
16 अप्रैल 1986 को उदयपुर के सूरजपोल इलाके में पुलिस कंट्रोल रूम के पास एक कार को रोककर पूछताछ की जा रही थी। इसी दौरान कार में सवार लोगों ने पुलिसकर्मियों पर फायरिंग कर दी। गोली लगने से सब इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह शेखावत और रिजर्व इंस्पेक्टर रोशन लाल माथुर की मौत हो गई। घटना में एएसपी सुरेशचंद्र पंड्या समेत अन्य अधिकारी भी घायल हुए थे। फायरिंग के बाद हमलावर कार लेकर फरार हो गए।
ऑपरेशन ब्लू स्टार से जुड़ा था हमले का कनेक्शन
इस घटना को ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद बदले की भावना से जुड़ा बताया गया। वर्ष 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया था। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, सुखविंदर सिंह सुक्खी और हरजिंदर सिंह जिंदा उस ऑपरेशन का बदला लेने की योजना बना रहे थे। दोनों जनरल ए.के. वैद्य की हत्या करने के लिए पुणे जा रहे थे और इसी दौरान उदयपुर में हुई घटना में उनका नाम सामने आया।
पुलिस की पूछताछ के दौरान हुई थी फायरिंग
घटना के समय उदयपुर में युवाओं के दो गुटों के बीच विवाद के कारण तनाव का माहौल था। दंगा भड़कने की आशंका को देखते हुए शहर में पुलिस बल तैनात किया गया था। उस समय पुलिस कंट्रोल रूम सूरजपोल दरवाजे में स्थित था। आधी रात को वहां से गुजर रही कार को रोककर पूछताछ की गई तो उसमें बैठे लोगों ने फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में कई पुलिस अधिकारी गोली लगने से घायल हुए और दो अधिकारियों की जान चली गई।
2005 तक चला मुकदमा, फिर भी परिवारों का संघर्ष जारी
परिवारों के अनुसार, मामले की कानूनी प्रक्रिया वर्ष 2005 तक चली। इसके बाद घटना को आतंकी वारदात के रूप में देखा गया, लेकिन दोनों अधिकारियों को शहीद का दर्जा दिलाने की मांग पूरी नहीं हो सकी। वर्षों तक परिवारों ने अपने स्तर पर प्रयास किए। बाद में 2019 के बाद उन्होंने इस मुद्दे को दोबारा उठाया और केंद्र सरकार तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की।
बेटी रुचि शेखावत और बेटे सौरभ माथुर की लड़ाई
सब इंस्पेक्टर राजेंद्र सिंह शेखावत की बेटी रुचि शेखावत और रोशन लाल माथुर के पुत्र सौरभ माथुर आज भी अपने पिता को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। उनका कहना है कि ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों को उचित सम्मान मिलना चाहिए। इतने वर्षों बाद भी मांग पूरी नहीं होने से परिवारों की पीड़ा बनी हुई है।
चंदन सिंह के परिवार को भी शहीद के दर्जे का इंतजार
राजस्थान में एक अन्य मामला सहायक उप निरीक्षक चंदन सिंह का भी है। वे 5 जून 2002 को कोर्ट में पेशी के लिए लाए गए बंदियों के बीच हुई फायरिंग में मारे गए थे। चंदन सिंह राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत बंद एक आरोपी को अदालत लेकर पहुंचे थे। इसी दौरान कुछ बदमाशों ने फायरिंग कर दी और सिर में गोली लगने से उनकी मौत हो गई। उनके पुत्र गोविंद सिंह भी अपने पिता को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं।
शहीदों की सूची और आधिकारिक दर्जे का सवाल
चंदन सिंह का नाम शहीदों की सूची में शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है, लेकिन उनके परिवार के अनुसार उन्हें अब तक औपचारिक शहीद का दर्जा और उससे जुड़े लाभ नहीं मिले हैं। इसी तरह उदयपुर की घटना में जान गंवाने वाले राजेंद्र सिंह शेखावत और रोशन लाल माथुर के परिवार भी सम्मान की मांग कर रहे हैं। इन मामलों में आधिकारिक स्थिति और पात्रता से जुड़े दस्तावेजों का महत्व है।
आगे क्या?
पुलिस शहीद दिवस पर इन परिवारों की मांग एक बार फिर सामने आई है। अब आगे यह देखना होगा कि संबंधित विभाग और सरकार इन मामलों की समीक्षा कर क्या निर्णय लेते हैं। परिवारों को उम्मीद है कि उनके लंबे संघर्ष के बाद उनके पिता की ड्यूटी के दौरान हुई शहादत को औपचारिक मान्यता मिलेगी और उन्हें उचित सम्मान दिया जाएगा।