न्यायालय का फैसला: लापरवाही पर अलवर UIT और नगर निगम की संपत्ति होगी कुर्क
News In Short
- युवक सुंदरलाल सैनी को ढाई साल से खांचा भूमि नहीं देने पर कोर्ट ने जताई नाराजगी।
- यूआईटी और नगर निगम एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर मामले को टालते रहे।
- लगातार अवहेलना देख ACJM कोर्ट ने दोनों विभागों की संपत्ति कुर्क करने को कहा है।
- अधिकारियों पर गलत खसरा नंबर की रिपोर्ट देकर कोर्ट को गुमराह करने का भी आरोप।
- पूर्व में जिला कलेक्टर की गाड़ी को कुर्क करने के आदेश दिए जा चुके हैं।
News In Detail
Alwar: राजस्थान के अलवर जिले में प्रशासन की लापरवाही पर न्यायालय ने अपना हंटर चलाया है। एसीजेएम (ACJM) कोर्ट ने शहर के दो बड़े निकायों, यूआईटी (UIT) और नगर निगम की संपत्ति को कुर्क करने के आदेश दिए हैं। यह मामला पिछले ढाई साल से अटके एक भूमि विवाद से जुड़ा है।
अदालत ने यह फैसला तब लिया जब अधिकारियों ने बार-बार दिए गए आदेशों को नजरअंदाज किया। खास बात यह है कि इसी मामले में पूर्व में जिला कलेक्टर के कार्यालय और उनकी गाड़ी तक को कुर्क करने के आदेश दिए जा चुके हैं।
ढाई साल से फाइलों में घूम रहा मामला
विवाद की जड़ खांचा भूमि का आवंटन है। सुंदरलाल सैनी को यह जमीन देने के आदेश न्यायालय द्वारा बहुत पहले ही दिए जा चुके थे। लेकिन यूआईटी प्रशासन लगातार इसमें ढिलाई बरतता रहा।
यूआईटी का कहना था कि उन्होंने सारे जरूरी दस्तावेज नगर निगम को भेज दिए हैं। वहीं नगर निगम की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। दोनों विभागों की इस आपसी खींचतान के बीच आम आदमी न्याय के लिए भटकता रहा।
कोर्ट को गुमराह करने का गंभीर आरोप
अदालत की नाराजगी की एक बड़ी वजह गलत जानकारी देना भी रही। न्यायालय ने खसरा नंबर 1207 को लेकर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। लेकिन अधिकारियों ने इसकी जगह खसरा नंबर 674 और 676 की रिपोर्ट पेश कर दी।
अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया में बाधा और गुमराह करने की कोशिश माना है। अधिकारियों की इस हरकत ने मामले को और ज्यादा उलझा दिया। कोर्ट ने इसे प्रशासन की गहरी लापरवाही करार दिया है।
निर्देशों की भी हुई अनदेखी
इस मामले में जिला कलेक्टर आईएएस अर्तिका शुक्ला को भी कई बार दखल देने को कहा गया था। न्यायालय चाहता था कि कलेक्टर खुद इस मामले में जरूरी कार्रवाई सुनिश्चित करें। लेकिन प्रशासन के स्तर पर कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।
प्रशासन की इस कार्यशैली से कोर्ट का भरोसा डगमगा गया। जब समझाने और निर्देश देने से बात नहीं बनी, तो कोर्ट ने कुर्की जैसा कड़ा कदम उठाने का फैसला किया। अब विभागों के पास अपनी संपत्ति बचाने के लिए सीमित समय है।
क्या होती है संपत्ति की कुर्की?
संपत्ति की कुर्की एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसके तहत अदालत के आदेश पर किसी देनदार या फरार अपराधी की चल-अचल संपत्ति को सरकारी कब्जे में ले लिया जाता है। यह आमतौर पर कर्ज वसूली या आपराधिक मामले में फरार घोषित होने पर की जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
खांचा भूमि क्या होती है और यह विवाद क्या है?
खांचा भूमि शहरी या नगरीय क्षेत्रों में स्थित छोटे भू-खंड या भू-पट्टी होती है, जो किसी आवंटित भूखंड के आगे, पीछे या बगल में स्थित होती है। यह स्वतंत्र रूप से उपयोग करने लायक नहीं होती और न ही इसका अलग से नीलामी योग्य भूखंड बनाया जा सकता है। सुंदरलाल सैनी को ऐसी ही जमीन आवंटित करने का आदेश कोर्ट ने दिया था। विभाग पिछले ढाई साल से इसे देने में आनाकानी कर रहे थे, जिसके कारण यह विवाद बढ़ा।
कोर्ट ने संपत्ति कुर्क करने का आदेश क्यों दिया?
कोर्ट ने यह आदेश इसलिए दिया क्योंकि यूआईटी और नगर निगम के अधिकारी लगातार न्यायिक आदेशों की अवहेलना कर रहे थे। अधिकारियों ने कोर्ट को गलत खसरा नंबर की जानकारी देकर गुमराह करने की कोशिश की और कलेक्टर के निर्देशों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई।
क्या इससे पहले भी ऐसी कोई कार्रवाई हुई है?
जी हां, यह मामला इतना गंभीर हो गया था कि इससे पहले एसीजेएम कोर्ट ने जिला कलेक्टर के कार्यालय और उनकी आधिकारिक कार को भी कुर्क करने के आदेश दिए थे। बार-बार मौका देने के बाद भी जब अधिकारियों की कार्यशैली नहीं बदली, तब कोर्ट ने विभागों की संपत्ति कुर्की का फैसला लिया।
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