राजस्थान के इस मंदिर में नहीं है मूर्ति, मां के नाभि स्वरूप की होती है पूजा; अंबाजी की अनोखी मान्यता जानिए
राजस्थान के सिरोही जिले में पिंडवाड़ा के पास स्थित आरासुरी अंबा माता मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यहां मंदिर में देवी की पारंपरिक मूर्ति नहीं है, बल्कि चक्र स्वरूप की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह स्थान मां शक्ति के नाभि स्वरूप से जुड़ा हुआ है। गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी धाम की मान्यताएं भी इसी परंपरा से जुड़ी बताई जाती हैं।
स्थानीय इतिहासकार डॉ. उदयसिंह डिंगार के अनुसार, आरासना अंबाजी को क्षेत्र के प्रमुख शक्तिपीठों में विशेष स्थान प्राप्त है। यहां आने वाले श्रद्धालु मां के चक्र स्वरूप के दर्शन करते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं।
मां के नाभि स्वरूप की होती है पूजा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण कर रहे थे, तब देवी का नाभि अंग आरासना की पहाड़ी पर गिरा था। इसी मान्यता के चलते यहां मां के नाभि स्वरूप की आराधना की जाती है।
मंदिर की सबसे खास बात यह है कि गर्भगृह में देवी की सामान्य प्रतिमा के स्थान पर चक्र की पूजा होती है। श्रद्धालु इसे मां शक्ति का प्रतीक मानते हैं। इसी कारण यह मंदिर दूसरे देवी मंदिरों से अलग पहचान रखता है।
त्रिशूल से किया था आरासुर का संहार
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में इस क्षेत्र में आरासुर नाम का एक नरभक्षी राक्षस आतंक मचाता था। लोगों की रक्षा के लिए मां शक्ति ने त्रिशूल से उसका संहार किया और क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्त कराया।
मान्यता है कि इसी घटना के बाद देवी को आरासुरी नाम से जाना जाने लगा। मंदिर के पीछे स्थित पहाड़ी पर आज भी त्रिशूल स्वरूप की पूजा की जाती है। श्रद्धालु इस स्थान को देवी की शक्ति और पराक्रम से जोड़कर देखते हैं।
भक्त की प्रार्थना पर प्रकट हुए चक्र
एक स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, माली समाज की एक महिला मां की अनन्य भक्त थीं। वह रोज पहाड़ी पर चढ़कर देवी के त्रिशूल की पूजा करती थीं। उम्र बढ़ने के साथ जब उनके लिए पहाड़ी पर जाना मुश्किल हो गया, तो उन्होंने मां से प्रार्थना की।
कथा के मुताबिक, इसके बाद पहाड़ी की तलहटी में एक बड़ी चट्टान पर कुमकुम के पदचिह्न चक्र के रूप में प्रकट हुए। तभी से वहां चक्र की पूजा शुरू हुई। स्थानीय परंपरा के अनुसार, उसी माली परिवार के वंशज पीढ़ियों से मंदिर की सेवा-पूजा करते आ रहे हैं।
ऐसे गुजरात पहुंचीं मां अंबा
इतिहासकार डॉ. डिंगार के अनुसार, गुजरात के दांता रियासत के शासक मां आरासुरी के भक्त थे। उन्होंने देवी से दांता चलने की प्रार्थना की। मान्यता है कि मां ने यात्रा के दौरान पीछे मुड़कर नहीं देखने की शर्त रखी थी।
कथा के अनुसार, दांता की सीमा के पास राजा ने पीछे मुड़कर देखा, जिसके बाद मां वहीं ठहर गईं। बाद में उस स्थान पर मंदिर बनवाया गया, जो आज अंबाजी धाम के नाम से प्रसिद्ध है।
इस तरह आरासुरी अंबा माता मंदिर और गुजरात के अंबाजी धाम के बीच गहरा धार्मिक संबंध माना जाता है। इन दोनों स्थानों पर श्रद्धालु मां अंबा के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। हालांकि, इन कथाओं और मान्यताओं को धार्मिक परंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।