राजस्थान के इस गांव में आजादी के बाद से नहीं हुआ वार्ड पंच का चुनाव, एक जाजम पर बैठकर चुनते हैं प्रतिनिधि
यहां राजपूत और आदिवासी समाज के लोग एक जाजम पर बैठकर चर्चा करते हैं और मिलकर उम्मीदवार का नाम तय करते हैं। खास बात यह है कि फैसले में दोनों समाजों की बराबर भागीदारी रहती है। गांव के लोगों के मुताबिक, आजादी के बाद शुरू हुई यह परंपरा आज भी चली आ रही है।
सामान्य हो या एसटी सीट, सहमति से होता है फैसला
गांव की परंपरा के अनुसार वार्ड पंच की सीट सामान्य वर्ग के लिए हो या अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित, उम्मीदवार का चयन आपसी सहमति से किया जाता है। ग्रामीणों का प्रयास रहता है कि किसी भी सीट पर चुनावी टकराव की स्थिति न बने। इसके लिए पहले बातचीत होती है। सभी पक्षों की राय ली जाती है और फिर नाम तय किया जाता है।
इस व्यवस्था में सामाजिक तालमेल को सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि चुनाव में जीत-हार के कारण रिश्तों में खटास नहीं आनी चाहिए। गांव का प्रतिनिधि ऐसा हो, जिसे सभी लोग स्वीकार कर सकें। इसी सोच के चलते वर्षों से निर्विरोध चयन की परंपरा निभाई जा रही है।
एक वार्ड से बढ़कर हुए दो, दोनों में निर्विरोध चयन
पहले सज्जन सिंह का गड़ा गांव में एक ही वार्ड था। आबादी बढ़ने के साथ अब यहां दो वार्ड बनाए गए हैं। इस बार भी दोनों वार्डों में ग्रामीणों ने सहमति से प्रतिनिधि चुन लिए।
वार्ड संख्या एक सामान्य वर्ग के लिए है। यहां तारा कुंवर को निर्विरोध वार्ड पंच चुना गया है। वहीं, वार्ड संख्या दो एसटी वर्ग के लिए आरक्षित है। इस वार्ड से लसी देवी को निर्विरोध चुना गया है।
वार्ड में है करीब 400 मतदाता
दोनों वार्डों में कुल करीब 396 मतदाता हैं। ऐसे में मतदान की प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ी। राजस्थान निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची पर आधारित उपलब्ध आंकड़ों में वार्ड एक में 191 और वार्ड दो में 204 मतदाता दर्ज हैं। यानी कुल 395 मतदाता हैं। स्थानीय स्तर पर जारी आंकड़े में वार्ड एक के मतदाताओं की संख्या 192 बताई गई है।
चौराहे पर हुआ दोनों का स्वागत
दोनों वार्डों में निर्विरोध चयन के बाद गांव में खुशी का माहौल रहा। ग्रामीणों ने गांव के चौराहे पर तारा कुंवर और लसी देवी का माला पहनाकर स्वागत किया।
चौपाल पर ही सुलझा लेते हैं विवाद
गांव में भाईचारे की यह परंपरा केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। छोटे-बड़े विवाद होने पर भी ग्रामीण पहले आपस में बैठकर समाधान निकालने की कोशिश करते हैं। बातचीत और समझाइश के जरिए विवाद सुलझाने को प्राथमिकता दी जाती है।
ग्रामीणों के अनुसार, इस व्यवस्था से गांव में आपसी विश्वास बना रहता है। लोग एक-दूसरे की बात सुनते हैं और मिलकर रास्ता निकालते हैं। यही वजह है कि चुनावी माहौल में भी गांव में आपसी खींचतान की जगह सहमति को प्राथमिकता मिलती है।
आज जब पंचायत चुनावों में कई जगह उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिलता है, तब सज्जन सिंह का गड़ा गांव की यह परंपरा बताती है कि स्थानीय लोकतंत्र में सहमति और सामाजिक एकता की भी अहम भूमिका हो सकती है।