राजस्थान का अनोखा गांव, जहां दशहरे पर नहीं जलता रावण: 100 साल पुरानी मूर्ति का तीर-कमान से होता है वध
आज विजयदशमी है। देश भर में शाम होते ही रावण के बड़े-बड़े पुतले जलाए जाएंगे। लोग तालियां बजाएंगे और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाएंगे, लेकिन राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में एक ऐसा गांव भी है, जहां दशहरे की तस्वीर बिल्कुल जुदा होती है। यहां रावण के पुतले का दहन नहीं होता, बल्कि राम बने बच्चे के हाथों उसका वध कराया जाता। हैरानी की बात यह है कि जिस रावण का वध होता है, उसकी मूर्ति करीब 100 साल से उसी जगह खड़ी है।
यह गांव है शाहपुरा इलाके का रोपा। आसपास के लोग इसे 'रावण का गांव' भी कहते हैं। यहां दशहरे पर रावण को जलाने के बजाय तीर-कमान से उसका प्रतीकात्मक वध किया जाता। यह परंपरा करीब एक सदी से चली आ रही।
राजस्थान के रोपा गांव में रावण का दहन नहीं, वध होता
रोपा गांव के बीच में एक चौक है। इसे रावण चौक कहा जाता। इसी चौक में सीमेंट से बनी रावण की करीब 10 फीट ऊंची मूर्ति खड़ी है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह मूर्ति करीब सौ साल पुरानी है। इसे जलाने या तोड़ने के लिए नहीं बनाया गया था। यही वजह है कि दशहरे पर इसका दहन नहीं होता। हर साल विजयदशमी से पहले ग्रामीण मिलकर मूर्ति की साफ-सफाई करते हैं। उस पर नया रंग चढ़ाया जाता। फिर पूरे गांव में दशहरे की तैयारियां शुरू हो जाती।
गांव के बच्चे और युवा रामायण के अलग-अलग किरदार के रूप में खुद को तैयार करते हैं। कोई राम बनता है, तो कोई लक्ष्मण और हनुमान। इसके बाद शुरू होती है दो दिन तक चलने वाली अनोखी परंपरा।
पहले दिन लंका दहन,दूसरे दिन रावण वध
रोपा गांव में दशहरे का कार्यक्रम एक दिन पहले ही शुरू हो जाता है। पहले दिन लंका दहन किया जाता है। इसकी शुरुआत भगवान चारभुजा नाथ मंदिर से होती है। मंदिर से ठाकुरजी की शोभायात्रा निकाली जाती है। इसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल होते हैं। इसके बाद राम और लक्ष्मण का किरदार निभाने के लिए बोली लगाई जाती। गांव के बच्चे और युवा इन किरदारों के लिए तैयार होते हैं।
हनुमान का रूप धरे बच्चे रावण चौक की ओर जाते हैं। वहां लंका दहन का मंचन किया जाता। इस बार भी दशहरे से एक दिन पहले सोमवार शाम को यह परंपरा निभाई गई। इसके बाद सभी को विजयदशमी का इंतजार रहता है। आज गांव में फिर लोग रावण चौक पर जुटेंगे। राम का किरदार निभाने वाला बच्चा हाथ में धनुष-बाण लेकर आएगा। फिर रावण की मूर्ति पर तीर चलाकर उसके वध का मंचन किया जाएगा। इस दौरान आसपास के गांवों से भी लोग कार्यक्रम देखने पहुंचते हैं।
रावण को जलाते क्यों नहीं हैं गांव वाले?
आमतौर पर दशहरे पर रावण को बुराई का प्रतीक मानकर जलाया जाता है, लेकिन रोपा गांव के लोगों की सोच थोड़ी अलग है। गांव के पंडित सत्यनारायण शर्मा बताते हैं कि यहां रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाता। ग्रामीण उसे एक बड़ा विद्वान भी मानते हैं। यही वजह है कि यहां रावण की मूर्ति को जलाने की परंपरा नहीं।
लोग उसकी विद्वता का सम्मान करते हैं। साथ ही रामायण की कहानी के मुताबिक, दशहरे पर उसका प्रतीकात्मक वध भी करते हैं। इस तरह गांव में रावण की मूर्ति भी बनी रहती है और विजयदशमी की परंपरा भी निभाई जाती है।
रावण की मूर्ति के सामने मन्नत भी मांगते हैं लोग
रोपा गांव में रावण की मूर्ति सिर्फ दशहरे के कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों की इससे आस्था भी जुड़ी हुई है। गांव वालों के मुताबिक, जब किसी का काम अटक जाता है या कोई परेशानी आती है तो लोग रावण की मूर्ति के पास जाकर मन्नत मांगते हैं। कुछ लोग यहां पूजा करते हैं और चढ़ावा भी चढ़ाते हैं। आसपास के गांवों से भी लोग अपनी परेशानियां लेकर यहां पहुंचते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है। हालांकि, यह उनकी धार्मिक मान्यता है।
रातभर जागकर की प्रार्थना, सुबह हुई बारिश
गांव में रावण से जुड़ी एक पुरानी कहानी भी सुनाई जाती है। ग्रामीण बताते हैं कि कई साल पहले इलाके में भयंकर सूखा पड़ा था। बारिश नहीं होने से लोग परेशान थे। खेत सूख रहे थे और पानी की कमी होने लगी थी। तब गांव के लोगों ने रावण की मूर्ति के पास रातभर जागकर प्रार्थना की। ग्रामीणों के मुताबिक, अगली सुबह इलाके में तेज बारिश हुई। गांव वाले इसे अपनी आस्था से जोड़कर देखते हैं। उनका कहना है कि इस घटना के बाद रावण की मूर्ति के प्रति लोगों का विश्वास और बढ़ गया।
100 साल से नहीं बदला दशहरा मनाने का तरीका
समय के साथ दशहरा मनाने के तरीके बदल गए। शहरों में रावण के पुतले बड़े होते गए, लेकिन रोपा गांव में आज भी पुरानी परंपरा कायम है। यहां रावण की मूर्ति को हर साल नया रंग दिया जाता। रामायण के किरदार तैयार होते हैं। लंका दहन होता है और फिर तीर-कमान से रावण वध का मंचन किया जाता है।
रोपा गांव की खास बात यही है कि यहां रावण को जलाए बिना भी दशहरा मनाया जाता है। ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि करीब 100 साल से चली आ रही ऐसी परंपरा है, जिसे वे अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।