ग्लोबल क्वांटम ट्रैकर में भारत की पहली एंट्री: क्वांटम कंप्यूटिंग में भारत ने रचा इतिहास

Manya Jain | Jul 12, 2026, 16:21 IST
bits pilani quantum algorithm ibm
BITS पिलानी गोवा कैंपस की टीम ने IBM के साथ मिलकर क्वांटम एल्गोरिदम बनाया है। इसने 120 क्यूबिट्स पर सबएटॉमिक पार्टिकल्स का सिमुलेशन किया, जिसे क्वांटम एडवांटेज ट्रैकर ने 'एक्टिव' माना है।

    समझें क्या है पूरा मामला

    • BITS पिलानी के गोवा कैंपस की टीम ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
    • टीम ने IBM क्वांटम के साथ मिलकर एक नया क्वांटम एल्गोरिदम बनाया।
    • इस एल्गोरिदम ने सबएटॉमिक पार्टिकल्स के व्यवहार को 120 क्यूबिट्स पर सिमुलेट किया।
    • क्वांटम एडवांटेज ट्रैकर ने इस नतीजे को 'एक्टिव' माना है।
    • यह किसी भारतीय लैब की तरफ से पहली ऐसी एंट्री है।

    डॉ. इंद्रक्षी रायचौधरी, BITS पिलानी के फिजिक्स डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। उन्होंने मडिया एजेंसी से बातचीत में इस काम को समझाया। उनके मुताबिक क्वांटम कंप्यूटर आसान जोड़-घटाव में भी कमजोर होते हैं।



    "अगर आप दो नंबर जोड़ने की कोशिश करें, तो क्लासिकल कैलकुलेटर यह आसानी से कर देता है। लेकिन क्वांटम कंप्यूटर पर यही काम बेहद मुश्किल हो जाता है," उन्होंने बताया।



    कहां छिपा है क्वांटम एडवांटेज

    डॉ. रायचौधरी के मुताबिक क्वांटम कंप्यूटर की असली ताकत कहीं और है। जटिल और आपस में जुड़े कणों वाले सिस्टम को समझना क्लासिकल कंप्यूटर के लिए बेहद कठिन होता है। लेकिन यही काम क्वांटम कंप्यूटर के लिए अपेक्षाकृत आसान है।



    उन्होंने कहा कि यह बात सुनने में उल्टी लग सकती है, लेकिन असली क्वांटम एडवांटेज यहीं छिपा है। सरकारें और कंपनियां इसी वजह से क्वांटम कंप्यूटिंग में भारी निवेश कर रही हैं। यह समझना अब भी सबसे बड़ी चुनौती है कि क्वांटम कंप्यूटर कहां फायदा दे सकते हैं।



    टीम ने जो समस्या हल की, वह भौतिकी के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक ऐसी सिर्फ तीन समस्याएं हैं, जो अब तक क्लासिकल कंप्यूटरों की पहुंच से बाहर रही हैं। यह उपलब्धि उन्हीं में से एक को हल करने जैसी है।



    120 क्यूबिट्स पर हुआ कमाल

    टीम ने IBM के प्रोसेसर पर 120 क्यूबिट्स का इस्तेमाल किया। क्यूबिट्स क्वांटम कंप्यूटर की सबसे बुनियादी इकाई होते हैं। इस सिमुलेशन को पूरा करने में क्वांटम मशीन को सिर्फ 20 सेकंड लगे। वहीं यही काम एक क्लासिकल कंप्यूटर से करवाने पर दो घंटे लग गए।



    इससे पहले इस तरह का काम ज्यादा से ज्यादा 27 क्यूबिट्स पर ही हो पाया था। BITS पिलानी की टीम ने इसे सीधे 120 क्यूबिट्स तक पहुंचा दिया। डॉ. रायचौधरी का मानना है कि अगर आज उन्हें 1,000 क्यूबिट्स वाला कंप्यूटर मिल जाए, तो उनका एल्गोरिदम उस पर भी आसानी से काम करेगा।



    क्वांटम एडवांटेज ट्रैकर क्या है

    क्वांटम एडवांटेज ट्रैकर (QAT) ऐसे दावों की जांच करता है। इसे नवंबर 2025 में IBM ने लॉन्च किया था। इसमें फ्लैटाइरन इंस्टीट्यूट, स्टार्टअप्स ब्लूक्यूबिट और एल्गोरिदमिक भी शामिल हैं। कई एकेडमिक रिव्यूअर भी इस प्रोसेस से जुड़े हैं।



    यह एक तरह का लाइव पीयर रिव्यू सिस्टम है। रिसर्चर अपना नतीजा जमा करता है, और एक कमेटी उसे क्लासिकल और क्वांटम, दोनों मशीनों पर जांचती है। अब तक GitHub पेज पर लगभग 220 एंट्री दर्ज हुई हैं। इनमें से सिर्फ करीब एक दर्जन को स्वीकार किया गया है। इनमें से भी बहुत कम एंट्री 'एक्टिव' दावे के तौर पर बची हैं।



    "यह किसी सामान्य एकेडमिक जर्नल से कहीं ज्यादा सख्त प्रोसेस है," डॉ. रायचौधरी ने बताया। BITS पिलानी की एंट्री अभी 'एक्टिव' मार्क की गई है। अगर यह समस्या किसी क्लासिकल मशीन से हल हो जाती, तो इसे 'सुपरसीडेड' माना जाता। मई से अब तक यह नतीजा सुपरसीड नहीं हुआ है।



    क्या मॉडल किया गया

    टीम ने क्वार्क और ग्लूऑन के रियल टाइम व्यवहार को मॉडल किया। ये कण प्रोटॉन के अंदर मौजूद होते हैं। इन्हें नेचर की सबसे ताकतवर फोर्स, यानी स्ट्रॉन्ग फोर्स नियंत्रित करती है। यह पूरी फुल थ्योरी का एक सरल वर्जन था।



    टीम ने नई एनकोडिंग तकनीक का इस्तेमाल किया। इससे गणितीय रिडंडेंसी हट गई, और सिमुलेशन को कई क्यूबिट्स पर आसानी से स्केल किया जा सका। नॉइज़-मिटिगेशन तकनीकों ने भी इसमें मदद की।



    क्लासिकल तरीकों से प्रोटॉन का द्रव्यमान (mass) तो सटीक तरीके से पता चल जाता है। लेकिन कणों को फ्रेम-दर-फ्रेम बदलते हुए देखना क्लासिकल तरीके से बेहद मुश्किल है। डॉ. रायचौधरी के मुताबिक यह गणना क्लासिकल तरीके से करना एक्सपोनेंशियल रूप से कठिन हो जाता है।



    असली दुनिया की समस्या पर टेस्ट

    डॉ. रायचौधरी के मुताबिक मीडिया अक्सर क्वांटम कंप्यूटिंग को दवाओं की खोज या मैटेरियल साइंस से जोड़कर दिखाता है। लेकिन उन क्षेत्रों में अभी कंप्यूटेशनल स्तर पर काम काफी शुरुआती स्टेज पर है। हाई-एनर्जी फिजिक्स की तुलना में ये क्षेत्र अभी पीछे हैं।



    एन्क्रिप्शन तोड़ना या किसी बड़े मॉलिक्यूल को शुरू से सिमुलेट करना अभी भी कई साल दूर की बात है। इसी वजह से रिसर्चर्स अब एक छोटे लेकिन उपयोगी लक्ष्य पर फोकस कर रहे हैं, जिसे 'यूजफुल एडवांटेज' कहा जाता है।



    2019 में गूगल ने दावा किया था कि उसके प्रोसेसर ने कुछ मिनटों में वह काम कर दिया, जिसे सुपरकंप्यूटर 10,000 साल में पूरा करता। लेकिन उस टास्क का कोई व्यावहारिक इस्तेमाल नहीं था। वह सिर्फ क्वांटम हार्डवेयर के हिसाब से चुना गया था। BITS पिलानी की टीम ने इसके उलट एक असली भौतिकी की समस्या पर अपना एल्गोरिदम टेस्ट किया।



    CERN का न्योता

    इस उपलब्धि के बाद डॉ. रायचौधरी को CERN, स्विट्जरलैंड से बुलावा आया है। वे अगले महीने वहां जा रही हैं। CERN में दुनिया का सबसे शक्तिशाली पार्टिकल स्मैशर है, जो प्रोटॉन को तोड़कर उनके भीतर के कणों का अध्ययन करता है।



    CERN के रिसर्चर्स अभी क्लासिकल तरीकों तक सीमित हैं। उन्होंने डॉ. रायचौधरी को यह जानने के लिए बुलाया है कि क्या उनका तरीका उनके सिमुलेशन को आगे बढ़ा सकता है। यह भारतीय क्वांटम रिसर्च के लिए एक बड़ा मौका माना जा रहा है।



    भारत की क्वांटम तैयारी अभी शुरुआती दौर में

    भारत इस दिशा में अभी शुरुआत ही कर रहा है। 2023 में मंजूर हुए नेशनल क्वांटम मिशन का बजट 6,003 करोड़ रुपए है। यह मिशन क्वांटम एल्गोरिदम को फंड करता है और बेंगलुरु में एक कंप्यूटिंग हब भी चलाता है।



    लेकिन भारत के पास अभी अपना हाई-एंड क्वांटम हार्डवेयर नहीं है। यहां के रिसर्चर्स को विदेशी मशीनों पर निर्भर रहना पड़ता है। डॉ. रायचौधरी के मुताबिक सिर्फ हार्डवेयर होने से कुछ नहीं होता, अच्छे एल्गोरिदम के बिना क्वांटम कंप्यूटर बेकार साबित हो सकता है।



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