सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स के टॉप पदों पर किसका हक? IPS या फोर्स के अपने अधिकारी: समझें क्यों छिड़ी है लड़ाई

Saurabh Mishra | Oct 04, 2026, 16:43 IST
IPS बनाम CAPF विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPF IPS) में आईपीएस अधिकारियों की डेपुटेशन के मुद्दे की सुनवाई की। CAPF IPS के अधिकारियों ने बताया कि उन्हें उच्च पदों तक पहुँचने के लिए जरूरी अवसर कम मिल रहे हैं। 2025 के निर्णय के बाद सिर्फ 46 आईपीएस अधिकारी ही डेपुटेशन पर शामिल हुए थे। नया CAPF कानून 2026 में प्रभावी होगा, जिसके तहत डेपुटेशन के प्रावधानों में सुधार होगा।

सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज यानी CAPF के बड़े पदों पर किसे ज्यादा मौका मिले, उन अधिकारियों को, जिन्होंने पूरी नौकरी इन्हीं फोर्सेज में बिताई है या डेपुटेशन पर आने वाले भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों को? CRPF, BSF, CISF, ITBP और SSB में लंबे समय से चल रहे विवाद की जड़ यही सवाल है।



मामला अब फिर सुप्रीम कोर्ट में है। वजह है 23 मई 2025 के फैसले की कथित अवमानना यानी कंटेम्प्ट। तब सर्वोच्च न्यायालय ने डीआईजी-आईजी स्तर तक डेपुटेशन वाले पद धीरे-धीरे कम करने को कहा था। इसके बाद भी सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड यानी SAG स्तर तक 46 आईपीएस अधिकारी सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPF) में डेपुटेशन पर आए। इसी बीच केंद्र सरकार 2026 में नया CAPF कानून भी ले आई। अब सवाल पुराने फैसले पर अमल और नए कानून, दोनों का है और गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में।



सुप्रीम कोर्ट में अभी इस मामले पर क्या चल रहा?


IPS और CAPF अफसरों की लड़ाई शुरू कहां से हुई?

इस विवाद को समझने के लिए सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स का ढांचा समझना जरूरी है। सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और SSB में अपने ग्रुप-A अधिकारी होते हैं। ये आम तौर पर संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा के जरिए सीधे असिस्टेंट कमांडेंट बनते हैं। इसके बाद प्रमोशन पाकर डिप्टी कमांडेंट, सेकेंड-इन-कमांड, कमांडेंट, डीआईजी और IG रैंक तक पहुंचते हैं। परेशानी यह है कि जैसे-जैसे CAPF में अधिकारियों की रैंक बढ़ती है, पदों की संख्या कम होती जाती।



CAPF Promotion Dispute

इसके साथ डेपुटेशन की व्यवस्था भी है। CAPF के कई बड़े पदों पर दूसरे कैडर, खासकर IPS अधिकारियों को लाया जाता रहा है। नया CAPF कानून आने से पहले डीआईजी के 20% और IG के 50 फीसदी पद डेपुटेशन से भरने का प्रावधान था।



CAPF कैडर अफसरों की शिकायत है कि वे असिस्टेंट कमांडेंट से नौकरी शुरू कर सालों तक सीमा, नक्सल प्रभावित और दूसरे संवेदनशील इलाकों में काम करते। जब वे बड़े पदों तक पहुंचने की स्थिति में आते हैं तो पद पहले ही कम होते हैं। उनमें भी कई पद डेपुटेशन के लिए रखे जाने से उनके प्रमोशन के मौके और कम हो जाते हैं।




प्रमोशन से NFFU की लड़ाई कैसे शुरू हुई?

CAPF अधिकारियों की परेशानी केवल पद की नहीं, सैलरी की भी थी। इसी वजह से NFFU यानी नॉन फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन की मांग उठी थी। इसे आसान भाषा में समझें। अगर कोई CAPF का अधिकारी प्रमोशन के लिए जरूरी शर्तें पूरी कर चुका है, लेकिन पद खाली नहीं होने के कारण उसे प्रमोशन नहीं मिल रहा तो NFFU के जरिए उसे ऊंचे ग्रेड के वेतन का फायदा मिल सकता।



2015 में दिल्ली हाईकोर्ट ने CAPF अधिकारियों के पक्ष में इसे लेकर फैसला दिया था। मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट गया था और 2019 में वहां से भी अधिकारियों को राहत मिली। इसके बाद केंद्र ने CAPF के ग्रुप-A एग्जीक्यूटिव कैडर को ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप-A सर्विस यानी OGAS का दर्जा और NFFU का फायदा दिया।



इसके बावजूद असली परेशानी खत्म नहीं हुई। पुराने भर्ती नियमों के कारण वास्तविक प्रमोशन देर से मिलने पर अगली रैंक तक पहुंचने में भी देरी होती रही। यानी ज्यादा वेतन का फायदा मिल सकता था, लेकिन पद और आगे के प्रमोशन की समस्या बनी रही।



मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

23 मई 2025 का फैसला इस विवाद का सबसे बड़ा मोड़ था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि CAPF के ग्रुप-A एग्जीक्यूटिव कैडर को केवल NFFU के लिए नहीं, बल्कि कैडर से जुड़े दूसरे मामलों में भी ऑर्गेनाइज्ड ग्रुप-A सर्विस माना जाए।



कोर्ट ने केंद्र सरकार को CAPF का कैडर रिव्यू करने और भर्ती के अलावा सर्विस नियमों की समीक्षा करने का निर्देश दिया। इस प्रक्रिया में CAPF कैडर अधिकारियों की बात सुनने को भी कहा।



सुप्रीम कोर्ट का सबसे अहम निर्देश डेपुटेशन को लेकर था। कोर्ट ने कहा कि SAG यानी DIG-IG स्तर तक डेपुटेशन के लिए रखे पद फेज वाइज कम किए जाएं। इसके लिए अधिकतम दो साल की समयसीमा तय की गई।



यहां यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्स में आईपीएस अधिकारियों के डेपुटेशन को पूरी तरह बंद नहीं किया था। उसने इसे धीरे-धीरे कम करने को कहा था। केंद्र ने फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की, लेकिन अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी रिव्यू पिटीशन भी खारिज कर दी।




सरकार IPS अफसरों को CAPF में क्यों रखना चाहती है?

गृह मंत्रालय का कहना है कि CAPF की तुलना सामान्य ग्रुप-A सरकारी सेवाओं से नहीं की जा सकती। इन फोर्सेज का काम सीधे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ा है। केंद्रीय बलों को अक्सर राज्यों में पुलिस और प्रशासन के साथ काम करना पड़ता है। सरकार का तर्क है कि IPS अफसर राज्य पुलिस और केंद्रीय बलों के बीच तालमेल बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए बड़े पदों पर उनकी डेपुटेशन जरूरी है।



वहीं CAPF अफसरों का कहना है कि वे पूरी नौकरी इन्हीं फोर्सेज में बिताते हैं और यूनिट की कमान से लेकर मुश्किल ऑपरेशन तक संभालते हैं। ऐसे में बड़े पदों तक पहुंचने के ज्यादा मौके उन्हें मिलने चाहिए। इसका एक दूसरा पहलू भी है। कई बार डेपुटेशन के लिए रखे पद भी खाली रह जाते हैं, क्योंकि राज्य अपने IPS अधिकारियों को केंद्रीय डेपुटेशन पर भेजने में दिलचस्पी नहीं दिखाते।



नया CAPF कानून क्या है?

सुप्रीम कोर्ट में यह लड़ाई चल ही रही थी कि केंद्र सरकार 2026 में सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) बिल लेकर आई थी। इसे 25 मार्च 2026 को राज्यसभा में पेश किया गया था। अप्रैल में संसद से पास होने के बाद यह कानून बन गया।



इसका मकसद पांचों CAPF के ग्रुप-A अधिकारियों के लिए एक जैसी व्यवस्था बनाना है। केंद्र सरकार इसके तहत भर्ती, प्रमोशन, डेपुटेशन और नौकरी से जुड़ी दूसरी शर्तों के नियम बना सकेगा। सबसे अहम बात बड़े पदों की है। नए कानून के मुताबिक CAPF में आईजी के 50% पद डेपुटेशन से भरे जाएंगे। इसके अलावा एडीजी रैंक के कम से कम 67% पद डेपुटेशन के लिए रहेंगे। वहीं, स्पेशल डीजी और डीजी के सभी पद डेपुटेशन से भरे जाएंगे।



कानून में केंद्र को नियम बनाने की ऐसी शक्ति भी दी गई है, जो किसी असंगत अदालती आदेश या पुराने नियम के बावजूद लागू हो सकती। ताजा विवाद इसी वजह से बढ़ा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट 2025 में डीआईजी और आईजी स्तर तक डेपुटेशन वाले पद धीरे-धीरे कम करने को कह चुका था।



सरकार का कहना है कि पांचों फोर्सेज के लिए एक जैसी व्यवस्था और केंद्र-राज्य के बेहतर तालमेल के लिए यह कानून जरूरी है। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि इससे सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले का असर कम होगा और CAPF कैडर अधिकारियों को बड़े पदों तक पहुंचने में नुकसान होगा।




अब सुप्रीम कोर्ट में दो अलग-अलग सवाल

अब सुप्रीम कोर्ट के सामने दो जुड़े हुए मामले हैं। पहला कंटेम्प्ट का है- क्या सरकार ने मई 2025 के फैसले पर ठीक से अमल किया? इसी में 46 IPS अधिकारियों की डेपुटेशन का सवाल है।



दूसरा मामला नए CAPF कानून का है। CAPF अधिकारियों ने इसकी संवैधानिक वैधता को अलग से भी चुनौती दी है। केंद्र सरकार चाहती है कि दोनों मामलों को साथ सुना जाए, क्योंकि उसका कहना है कि नया कानून कंटेम्प्ट केस से भी जुड़ा है।



फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने यह तय नहीं किया है कि 46 आईपीएस अधिकारियों की डेपुटेशन उसके पुराने आदेश की अवमानना है। यह भी तय होना बाकी है कि 2026 का नया कानून 2025 के फैसले को कितना प्रभावित करता है।



यानी यह सिर्फ IPS बनाम CAPF अफसरों की लड़ाई नहीं। असली सवाल यह है कि देश के पांच बड़े केंद्रीय सुरक्षा बलों में अपने कैडर के अफसरों और डेपुटेशन पर आने वाले अधिकारियों के बीच संतुलन कैसे बने। CAPF में पूरी नौकरी बिताने वाले अफसरों के लिए टॉप पदों तक कितना रास्ता खुले और IPS डेपुटेशन की सीमा कहां तय हो- अब इसी सवाल का जवाब सुप्रीम कोर्ट से आना है।




यह खबर क्यों जरूरी है

यह मामला सिर्फ पदों का नहीं है। एक तरफ कैडर अधिकारी हैं, जो दशकों तक यूनिट की कमान संभालते और संघर्ष वाले इलाकों में सेवा देते हैं। दूसरी तरफ सरकार है, जो संघीय तालमेल और परिचालन जरूरतों का तर्क देती है। साथ ही संसद के बनाए कानून और अदालती आदेश का रिश्ता भी परखा जाएगा। यह शक्तियों के बंटवारे का संवैधानिक सवाल है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला दोनों पक्षों के लिए अहम होगा।

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