शिक्षक के एक सवाल ने बदल दी जिंदगी...आईएएस चंद्रकांत वर्मा की प्रेरक कहानी
रायपुर जिले के एक छोटे से कस्बे में पढ़ने वाला एक छात्र अपने शिक्षक के सामने खड़ा था। शिक्षक ने उससे एक साधारण-सा सवाल पूछा-बड़े होकर क्या बनना चाहते हो? उस बच्चे के पास कोई जवाब नहीं था। वह घर लौटा और अपने पिता से यही सवाल पूछा। पिता ने मुस्कुराते हुए कहा-कह दो कि तुम कलेक्टर बनना चाहते हो। उस समय न तो उसे यह पता था कि कलेक्टर क्या होता है और न ही यह मालूम था कि वहां तक पहुंचने का रास्ता कितना कठिन होगा, लेकिन उसी दिन एक सपना जन्म ले चुका था। वर्षों बाद वही छात्र भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुना गया और आज छत्तीसगढ़ के चर्चित अधिकारियों में गिना जाता है। यह कहानी छत्तीसगढ़ कैडर के वर्ष 2017 बैच के आईएएस अधिकारी चंद्रकांत वर्मा की है।
सरकारी स्कूल से शुरू हुआ सफर
चंद्रकांत वर्मा का जन्म 1983 में रायपुर जिले के खरोरा में हुआ था। उनके पिता दउआ राम वर्मा पुलिस विभाग में सहायक उपनिरीक्षक के पद पर कार्यरत थे, जबकि उनकी मां सत्यभामा वर्मा गृहिणी थीं। पिता की नौकरी के कारण परिवार को अलग-अलग स्थानों पर रहना पड़ा। इसी दौरान चंद्रकांत की पढ़ाई देवभोग के सरकारी विद्यालय में हुई। छठी से दसवीं कक्षा तक उन्होंने हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की। साधारण माहौल में पढ़ाई करने वाले चंद्रकांत ने बचपन से ही अनुशासन और संघर्ष को बहुत करीब से देखा था। शायद यही वजह थी कि कठिन परिस्थितियां भी उनका आत्मविश्वास नहीं तोड़ सकीं।
साइकिल से कॉलेज, फिर आईआईटी तक का सफर
बारहवीं की परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करने के बाद उन्होंने अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा पास की और रायपुर के राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में दाखिला ले लिया। यह दौर आसान नहीं था। कॉलेज आने-जाने के लिए उन्हें प्रतिदिन करीब दस किलोमीटर तक साइकिल चलानी पड़ती थी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान से पर्यावरण इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल की।
एक के बाद एक मिली सफलताएं
उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद चंद्रकांत वर्मा ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। वर्ष 2008 में उनका चयन सहायक अभियंता के पद पर हुआ। इसके बाद वर्ष 2012 में वे नायब तहसीलदार बने। वर्ष 2013 में उन्होंने उप पुलिस अधीक्षक का पद हासिल किया और अगले ही वर्ष डिप्टी कलेक्टर के रूप में चयनित हो गए। लगातार मिल रही सफलताओं के बावजूद उनका अंतिम लक्ष्य अभी भी अधूरा था। उन्हें अपने पिता का सपना पूरा करना था।
पांच बार परीक्षा, फिर मिली मंजिल
संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफलता हासिल करना आसान नहीं होता। चंद्रकांत वर्मा को भी इस कठिन रास्ते से गुजरना पड़ा। उन्होंने हार नहीं मानी और लगातार प्रयास करते रहे। आखिरकार पांचवें प्रयास में उन्हें सफलता मिली। उन्होंने देशभर में 352वीं रैंक हासिल की और भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित हो गए। यह केवल एक परीक्षा में सफलता नहीं थी, बल्कि वर्षों के संघर्ष, धैर्य और विश्वास की जीत थी।
बस्तर से खैरागढ़ तक का सफर
चंद्रकांत वर्मा ने 28 अगस्त 2017 को भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनकी पहली नियुक्ति बस्तर जिले में सहायक कलेक्टर के रूप में हुई। उन्होंने जगदलपुर में तहसीलदार और अनुविभागीय अधिकारी के रूप में काम किया। इसके बाद सारंगढ़ और रायगढ़ में भी प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं।
रायपुर स्मार्ट सिटी परियोजना में अतिरिक्त प्रबंध संचालक के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण योजनाओं पर काम किया। कांकेर में अतिरिक्त कलेक्टर और गरियाबंद में जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के रूप में भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां निभाईं। इसके अलावा चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, हस्तशिल्प, हथकरघा और ग्रामोद्योग जैसे कई विभागों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण दायित्व संभाले। इसके बाद वे खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के कलेक्टर बने। वर्तमान में वे स्टेट वाटरशेड मैनेजमेंट एजेंसी के डायरेक्टर हैं।
स्पष्ट लक्ष्य, मजबूत संकल्प
चंद्रकांत वर्मा की कहानी केवल एक आईएएस अधिकारी की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस सपने की कहानी है, जिसकी शुरुआत एक शिक्षक के सवाल और एक पिता के जवाब से हुई थी। यह कहानी यह भी बताती है कि बड़े सपनों को पूरा करने के लिए बड़े शहरों, महंगे स्कूलों या विशेष सुविधाओं की जरूरत नहीं होती। अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और उसे हासिल करने का संकल्प मजबूत हो, तो सरकारी स्कूल से निकलकर भी देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं तक पहुंचा जा सकता है।
यह खबरें भी पढ़ें...
हिंदी मीडियम से आईआईटी, फिर आईएएस... जानिए कुणाल दुदावत की कहानी
तीन बार हार, चौथी बार जीत... आईएएस अविनाश मिश्रा की प्रेरक कहानी
खाकी की सख्त पहचान और संवेदनशील सोच ....आईपीएस भावना पांडे की कहानी
डॉक्टर नेहा राजपूत ने छोड़ा स्टेथोस्कोप, अब IAS बनकर बदल रहीं व्यवस्था