धैर्य, आत्मबल और निरंतर मेहनत, आईएएस कानाराम सीरवी की शून्य से शिखर तक की कहानी
परिणाम हमेशा परिश्रम के अनुरूप ही होता है। यह साधारण सा दिखने वाला वाक्य राजस्थान कैडर के आईएएस अधिकारी कानाराम सीरवी के जीवन का मूलमंत्र है। आज के दौर में, जहां युवा सुख-सुविधाओं के अभाव या अंग्रेजी माध्यम न होने को अपनी असफलता का बहाना बनाते हैं, वहीं कानाराम सीरवी एक ऐसी मशाल बनकर उभरे हैं, जिसने यह साबित कर दिया कि सफलता का भाषा या संसाधनों की कमी से कोई लेना-देना नहीं है। उनकी यात्रा एक ग्राम सेवक की छोटी सी नौकरी से शुरू होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के गौरवशाली पद तक पहुंचने की वह दास्तां है, जो हर संघर्षशील युवा के भीतर जोश भर देती है।
सिसारवाड़ा का वो लड़का
कानाराम सीरवी का जन्म राजस्थान के पाली जिले के एक बेहद साधारण परिवार में हुआ। उनके गांव सिसारवाड़ा (सोजत रोड) में तब संसाधनों की भारी कमी थी, लेकिन कानाराम की आंखों में पल रहे सपनों की कोई सीमा नहीं थी। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल से ही प्राप्त की। उच्च शिक्षा के लिए वे जोधपुर आए और जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया।
विश्वविद्यालय के दिनों में ही उनकी शख्सियत में एक अलग गहराई दिखने लगी थी। वे रेडियो पर 'बीबीसी हिंदी' सुनते और देश-दुनिया के मुद्दों पर गंभीर चर्चा करते थे। उनके सहपाठी बताते हैं कि किसी भी विषय पर कानाराम की राय सतही नहीं होती थी; वे मुद्दे की पांचवीं या छठी तह तक जाकर सोचते थे। यही विश्लेषणात्मक सोच आगे चलकर उनके सिविल सेवा के सफर का आधार बनी।
ग्राम सेवक से IAS तक
कानाराम की कहानी अन्य टॉपर्स से इसलिए अलग है क्योंकि उन्होंने करियर का जोखिम नहीं लिया, बल्कि जिम्मेदारी के साथ सपने बुने। उन्होंने सबसे पहले ग्राम सेवक के रूप में सरकारी सेवा शुरू की। एक ओर गांव की जमीनी समस्याओं को सुलझाना और दूसरी ओर देश की सबसे कठिन परीक्षा UPSC की तैयारी करना - यह दोधारी तलवार पर चलने जैसा था।
वे अपने पहले प्रयास में असफल रहे। कई लोग एक असफलता के बाद हार मान लेते हैं, लेकिन कानाराम ने इसे सीख के रूप में लिया। उन्होंने अपनी कमियों को पहचाना और दूसरे प्रयास में अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी। उनकी मेहनत रंग लाई और उन्होंने हिंदी माध्यम से 54वीं रैंक हासिल कर पूरे देश को चौंका दिया। यह उन लोगों के लिए करारा जवाब था जो मानते थे कि हिंदी माध्यम से टॉप रैंक लाना मुमकिन नहीं है।
हनुमानगढ़ से डूंगरपुर तक छाप
2013 बैच के अधिकारी के रूप में कानाराम ने केवल पद की गरिमा ही नहीं बढ़ाई, बल्कि जनता के बीच जाकर 'जन-सेवक' की भूमिका निभाई।
हनुमानगढ़ में कृषि क्रांति: हनुमानगढ़ के कलेक्टर के रूप में उन्होंने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में तकनीक का ऐसा इस्तेमाल किया कि उनके जिले को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया।
नशा मुक्ति के लिए मानस अभियान: सीमावर्ती क्षेत्रों में नशे की समस्या को खत्म करने के लिए उन्होंने 'मानस अभियान' चलाया, जिसे आज एक सफल मॉडल माना जाता है।
वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स: चुनाव के दौरान उन्होंने बच्चों से उनके माता-पिता को पत्र लिखवाए (एक पाती माता-पिता के नाम), जिससे मतदान का प्रतिशत बढ़ गया। इस अनूठे प्रयोग ने उनका नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज करा दिया।
संकट प्रबंधन: डूंगरपुर में जब शिक्षक भर्ती को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुए, तो उन्होंने एक कुशल प्रशासक की तरह कानून व्यवस्था भी संभाली और प्रदर्शनकारियों से संवाद का रास्ता भी खुला रखा।
रणनीति: लगन, लेखन और सटीक चयन
आईएएस कानाराम सीरवी की सफलता के पीछे एक सोची-समझी रणनीति थी। उन्होंने वैकल्पिक विषय के रूप में इतिहास और भूगोल को चुना। उनके अनुसार, विषय का चुनाव तीन आधारों पर होना चाहिए। स्वयं की रुचि, अध्ययन सामग्री की उपलब्धता और विशेषज्ञों का मार्गदर्शन।
वे CSAT (प्रारंभिक परीक्षा) को लेकर भी बहुत गंभीर थे। उनका मानना था कि अगर दो विकल्पों के बीच संशय हो, तो हार मानकर प्रश्न छोड़ना नहीं चाहिए, बल्कि तार्किक सोच के साथ उसे हल करने का प्रयास करना चाहिए। मुख्य परीक्षा के लिए उन्होंने अपनी लेखन शैली पर सबसे अधिक काम किया। वे कहते हैं, केवल ज्ञान होना काफी नहीं है, उस ज्ञान को सीमित समय और शब्दों में प्रभावी ढंग से पन्नों पर उतारना ही असली कला है।
वर्तमान में हैं सवाईमाधोपुर के जिला कलेक्टर
आज कानाराम सीरवी सवाईमाधोपुर के जिला कलेक्टर के रूप में कार्य कर रहे हैं, इससे पूर्व अपने प्रशासनिक करियर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी निभाई है। उन्होंने बारां में एसडीएम के रूप में शुरुआत करने के बाद जयपुर में राज्य स्वास्थ्य बीमा एजेंसी के संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी और कृषि एवं पंचायती राज विभाग के आयुक्त के रूप में कार्य किया।
इसके बाद उन्होंने बीकानेर में निदेशक (माध्यमिक शिक्षा) के पद पर रहते हुए शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार किए। जिला कलेक्टर के रूप में उन्होंने डूंगरपुर और हनुमानगढ़ में कठिन परिस्थितियों के दौरान बेहतरीन संकट प्रबंधन का परिचय दिया।
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