उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अयोध्या सीट क्यों चर्चा में, योगी-अखिलेश की चुनौती के क्या हैं मायने?

Saurabh Mishra | Oct 13, 2026, 13:55 IST
योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव ने एक-दूसरे को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती देकर सियासत गरमा दी है।
उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव ने एक-दूसरे को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती देकर सियासत गरमा दी है। 2024 में फैजाबाद लोकसभा सीट हारने के बाद भाजपा के लिए अयोध्या की लड़ाई अहम हो गई है। अब सवाल है कि बाबा बनाम बबुआ की यह जुबानी जंग सिर्फ बयानबाजी है या इसके पीछे कोई बड़ी चुनावी रणनीति है?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं लेकिन अयोध्या में सियासी माहौल अभी से गरमाने लगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने एक-दूसरे को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी है। दोनों की इस जुबानी जंग ने राम मंदिर वाली सीट को फिर चर्चा में ला दिया। खास बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा फैजाबाद सीट हार गई थी। हालांकि, अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में पार्टी को बढ़त मिली थी।



ऐसे में सवाल यह है कि योगी और अखिलेश का एक-दूसरे को अयोध्या से विधानसभा चुनाव लड़ने की चुनौती देना महज एक बयान है या इसके पीछे कोई सियासी मकसद छुपा है?



अखिलेश की अयोध्या में चुनाव लड़ने की चुनौती पर योगी ने क्या कहा?

यूपी CM योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के बीच इस सियासी लड़ाई की शुरुआत 8 अक्टूबर को हुई थी। अखिलेश यादव अयोध्या में भागवत कथा के कार्यक्रम में पहुंचे थे। यहां उन्होंने योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी। उन्होंने दावा किया कि भाजपा को यहां उम्मीदवार तय करने में परेशानी हो रही।




अब योगी भी कहां पीछे रहने वाले थे। इसके जवाब में उन्होंने कहा, 'चलो एक बार किस्मत आजमा लेते हैं। तय हो जाए। आप भी आइए, मैं भी आता हूं।' उन्होंने कहा कि मुकाबला आमने-सामने होना चाहिए, किसी दूसरे को आगे करके नहीं। भाजपा सूत्रों का कहना है कि योगी ने यह बात अयोध्या के पूर्व विधायक पवन पांडे को लेकर कही थी, जिन्होंने भागवत कथा आयोजित की थी, जिसमें अखिलेश यादव शामिल हुए थे।



ये बात किसी से छुपी नहीं कि पवन पांडे सपा प्रमुख अखिलेश यादव के करीबी हैं। हालांकि, योगी ने अयोध्या को अपनी आस्था का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि उनका मकसद शहर का विकास करना है, न कि सियासत करना।



क्या योगी-अखिलेश अयोध्या से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?

फिलहाल योगी आदित्यनाथ या अखिलेश यादव, दोनों में से किसी ने अयोध्या से चुनाव लड़ने का ऐलान नहीं किया है। योगी गोरखपुर शहरी सीट से विधायक हैं। अखिलेश 2024 में कन्नौज से सांसद चुने गए थे। बता दें कि पूर्व विधायक तेज नारायण पांडे उर्फ पवन पांडे, 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अखिलेश यादव की तरफ से घोषित समाजवादी पार्टी के पहले प्रत्याशी हैं। इसी साल 5 अगस्त को लखनऊ के एक कार्यक्रम में ही समाजवादी पार्टी के मुखिया ने यह ऐलान किया था कि पवन पांडे अयोध्या से चुनाव लड़ेंगे।



पवन पांडे 2012 में भाजपा के लल्लू सिंह को हराकर विधायक बने थे। वे ब्राह्मण समुदाय से आते हैं। समाजवादी पार्टी में उनकी स्थानीय पकड़ और पुराने चुनावी अनुभव के सहारे मुकाबले में उतर रही। इतना ही नहीं, वे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की जमीन खरीद में हुई कथित गड़बड़ी को लेकर मुखर हैं और चंदा चोरी के मामले में भी लगातार भाजपा पर हमला करते रहे हैं।



तीन दशक में कैसे बदले अयोध्या में चुनावी समीकरण?

अयोध्या विधानसभा सीट पर पिछले तीन दशकों में ज्यादातर समय भारतीय जनता पार्टी का कब्जा रहा है लेकिन उसके वोट प्रतिशत और जीत के अंतर में लगातार बदलाव हुआ है। 1991 में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान लल्लू सिंह को 51.3 फीसदी वोट मिले थे। उन्होंने तब 30400 वोटों से जीत दर्ज की थी। 1993 में भी वह जीते लेकिन वोट प्रतिशत घटकर 47.24 फीसदी रह गया। जीत का अंतर भी 9238 वोट रहा था। इसके बाद भाजपा का वोट प्रतिशत 1996 के विधानसभा चुनाव में 45.61, साल 2002 में 38.72 और 2007 में करीब 37 फीसदी रह गया।



2012 में समाजवादी पार्टी ने अयोध्या विधानसभा सीट पर भाजपा की जीत का सिलसिला तोड़ा। पवन पांडे ने लल्लू सिंह को 5404 वोटों से हराया। हालांकि, 2017 में भाजपा के वेद प्रकाश गुप्ता ने 50440 वोटों से जीत दर्ज की। 2022 में भी गुप्ता जीते लेकिन जीत का अंतर घटकर 19990 वोट रह गया था। वहीं, पवन पांडे का वोट प्रतिशत बढ़कर 40.4 फीसदी पहुंच गया था।




2024 में फैजाबाद की हार ने क्यों बढ़ाई भाजपा की चिंता?

2024 के लोकसभा चुनाव में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद भी भाजपा फैजाबाद सीट हार गई थी। समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने भाजपा के लल्लू सिंह को हराया था। हालांकि, फैजाबाद लोकसभा और अयोध्या विधानसभा सीट का गणित अलग है। फैजाबाद में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें अयोध्या, दरियाबाद, रुदौली, मिल्कीपुर और बीकापुर शामिल हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा को अयोध्या विधानसभा क्षेत्र में 4667 वोटों की बढ़त मिली थी।



बाकी चार क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी आगे रही थी। इसलिए फैजाबाद की हार को अयोध्या विधानसभा सीट पर भाजपा की हार सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता। फिर भी इस नतीजे ने समाजवादी पार्टी को भाजपा के खिलाफ बड़ा राजनीतिक मुद्दा दे दिया था।



अयोध्या में जातीय समीकरण किसके पक्ष में जाएंगे?

अयोध्या में दलित और ब्राह्मण वोटर्स की अहम भूमिका रहती है। मुस्लिम और यादव मतदाता भी यहां चुनावी समीकरण प्रभावित करते हैं। मुस्लिम और यादव समुदाय को समाजवादी पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है। भाजपा को सवर्णों के अलावा कुर्मी, निषाद, मौर्य और राजभर जैसे ओबीसी समुदायों के कुछ वर्गों का समर्थन मिलता रहा है। समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारकर अपना सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश की है।



वहीं, दलित मतदाताओं का रुख भी अहम होगा। हालांकि, मतदान सिर्फ जाति के आधार पर नहीं होता। उम्मीदवार की छवि और स्थानीय मुद्दे भी अपना असर डालते हैं।



राम मंदिर के अलावा क्या होंगे विधानसभा चुनाव में मुद्दे?

भाजपा अयोध्या में राम मंदिर, सड़क, पर्यटन और दूसरे विकास कार्यों को अपनी उपलब्धि बता रही। पार्टी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने करीब 50 हजार करोड़ रुपये के विकास कार्य होने का दावा भी किया है। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के नेता पवन पांडे अयोध्या में भ्रष्टाचार, अधूरे सड़क निर्माण, जरूरी सुविधाओं की कमी के आरोप लगातार लगा रहे। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों भाजपा इन आरोपों को खारिज करती है। अधिकारियों के मुताबिक, ज्यादातर बड़े प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं जबकि कुछ काम जारी हैं।



राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामला भाजपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

अयोध्या में राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मामला 2027 के विधानसभा चुनाव में बड़ा सियासी मुद्दा बन सकता। जून 2026 में यह विवाद सामने आने के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंदिर में आने वाले चंदे के हिसाब पर सवाल उठाए थे। उन्होंने ट्रस्ट और योगी सरकार की जवाबदेही को लेकर भी निशाना साधा था।



मामला बढ़ने पर एसआईटी जांच शुरू हुई और आठ लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। इसके बाद राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में भी बड़े बदलाव हुए। महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा का इस्तीफा हुआ। रिटायर्ड एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्रा को ट्रस्ट का पहला सीईओ बनाया गया। दान की व्यवस्था और मंदिर के कामकाज में भी बदलाव किए गए।



भाजपा राम मंदिर को अपनी बड़ी उपलब्धि बताती रही है। वहीं, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव चंदे में गड़बड़ी के आरोपों के जरिए मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल लगातार उठा रहे। ऐसे में भाजपा के सामने राम मंदिर के विकास कार्यों के साथ श्रद्धालुओं के चढ़ावे की सुरक्षा को लेकर उठे सवालों का जवाब देने की चुनौती भी होगी। 2027 में यह मुद्दा मतदाताओं के फैसले को कितना प्रभावित करेगा,यह अभी कहना मुश्किल है।




2027 में कब होंगे विधानसभा चुनाव?

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की मौजूदा सरकार का गठन 25 मार्च 2022 को हुआ था। इसी दिन योगी ने अपने मंत्रियों के साथ शपथ ली थी। वहीं, 18वीं विधानसभा का पहला सत्र 23 मई 2022 को शुरू हुआ था। इस हिसाब से विधानसभा का पांच साल का कार्यकाल 22 मई 2027 को पूरा होगा। ऐसे में प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव इससे पहले कराना होगा, ताकि नई सरकार का गठन समय पर हो सके।



'बाबा बनाम बबुआ' की चुनौती के पीछे क्या है?

यूपी की राजनीति में 'बाबा बनाम बबुआ' की जुबानी लड़ाई अब अयोध्या तक पहुंच गई है लेकिन सवाल यह है कि क्या दोनों नेता सचमुच यहां से 2027 में विधानसभा चुनाव लड़ेंगे? फिलहाल इसका जवाब नहीं है। इस बयानबाजी का सियासी मकसद जरूर दिखाई देता है। भाजपा राम मंदिर और विकास के मुद्दे को चर्चा में रखना चाहती है। वहीं, सपा फैजाबाद की जीत, जातीय समीकरण और स्थानीय समस्याओं के सहारे भाजपा को घेर रही है और पूरे प्रदेश में एक नैरेटिव तय करना चाहती।



दोनों नेताओं की चुनौती से अयोध्या की सीट चुनाव से पहले ही चर्चा में आ गई है। अब देखना होगा कि यह लड़ाई केवल बयानों तक रहती है या 2027 में चुनावी मैदान तक भी पहुंचती है।

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