कांग्रेस के दिग्गज और संघ का दरबार, कभी प्रणब तो अब थरूर की मुलाकात, कांग्रेस में रहते सिंधिया और नेताम भी कर चुके संवाद
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पहुंचना हो, ज्योतिरादित्य सिंधिया का संघ प्रमुख मोहन भागवत से मिलना हो या अब इंदौर में कांग्रेस सांसद शशि थरूर की संघ के सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी से मुलाकात, इन घटनाओं ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े किए हैं।
सुरेश सोनी से मिले शशि थरूर
ताजा मामला इंदौर का है, जहां 2 से 4 नवंबर तक आरएसएस की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक आयोजित हुई। इसी दौरान कांग्रेस सांसद शशि थरूर की संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सुरेश सोनी से मुलाकात की खबर सामने आई। थरूर इंदौर में कैंसर जागरूकता से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल होने आए थे।
इसके बाद वे संघ की बैठक के परिसर पहुंचे और सुरेश सोनी से उनकी लंबी बातचीत हुई। बताया गया कि दोनों के बीच चर्चा खुले बैठक कक्ष में हुई और उस दौरान कोई अन्य व्यक्ति मौजूद नहीं था। थरूर की इस मुलाकात को लेकर इसलिए भी चर्चा है क्योंकि वे कांग्रेस के मौजूदा सांसद हैं।
प्रणब मुखर्जी का नागपुर जाना बना था राष्ट्रीय बहस
कांग्रेस और संघ के बीच संवाद का सबसे चर्चित उदाहरण पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी का है। जून 2018 में वे नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में आयोजित तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। उस समय भी मोहन भागवत संघ प्रमुख थे।
प्रणब मुखर्जी के इस फैसले ने कांग्रेस के भीतर असहजता पैदा कर दी थी। जयराम रमेश और आनंद शर्मा सहित कई नेताओं ने उनसे कार्यक्रम में शामिल नहीं होने का आग्रह किया था। पी. चिदंबरम ने भी उनसे कहा था कि वे कार्यक्रम में जाएं और संघ को अपनी विचारधारा की कमियां बताएं।
हालांकि प्रणब मुखर्जी नागपुर पहुंचे और उन्होंने अपने भाषण में भारतीय राष्ट्रवाद, विविधता, सहिष्णुता और सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया। उन्होंने कहा था कि भारत की पहचान उसकी विविधता और सहिष्णुता में है। इस कार्यक्रम के बाद कांग्रेस और संघ के रिश्तों को लेकर देशभर में बहस छिड़ गई थी।
सिंधिया की संघ से मुलाकात के बाद बदला राजनीतिक ठिकाना
कांग्रेस से भाजपा में गए ज्योतिरादित्य सिंधिया का मामला भी इस संदर्भ में अक्सर याद किया जाता है। मार्च 2020 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने से पहले सिंधिया ने संघ नेताओं से मुलाक़ात की थी। भोपाल में भी उनकी संघ नेताओं से गुपचुप मुलाक़ात हुई थी।
बीजेपी में शामिल होने के बाद के कर सिंधिया नागपुर पहुंचे थे। उन्होंने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के निवास और संघ से जुड़े स्मृति स्थलों का दौरा किया। संघ प्रमुख मोहन भागवत से उनकी मुलाकात की भी जानकारी सामने आई थी।
सिंधिया ने हेडगेवार के निवास को राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा देने वाला स्थान बताया था। गौरतलब है कि सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने के साथ मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार संकट में आ गई थी और बाद में भाजपा की सरकार बनी।
अरविंद नेताम भी संघ के मंच पर पहुंचे
छत्तीसगढ़ के पूर्व केंद्रीय मंत्री और आदिवासी नेता अरविंद नेताम का नाम भी इस सूची में शामिल है। जून 2025 में उन्हें नागपुर में संघ के कार्यकर्ता विकास वर्ग के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। इस कार्यक्रम में उन्होंने मोहन भागवत के साथ मंच साझा किया।
नेताम इंदिरा गांधी और पीवी नरसिम्हा राव की सरकारों में मंत्री रह चुके हैं। हालांकि वे 2023 में कांग्रेस छोड़कर हमर राज पार्टी बना चुके थे। उनके संघ के मंच पर पहुंचने से छत्तीसगढ़ की राजनीति में भी चर्चा शुरू हुई थी। नेताम ने संघ और आदिवासी समाज के बीच बेहतर संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया था। कांग्रेस ने इसकी आलोचना की थी।
वैचारिक विरोध के बीच संवाद के दरवाजे
इन उदाहरणों को देखें तो कांग्रेस और संघ के बीच राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत मुलाकातों तथा संवाद के अवसर सामने आते रहे हैं। प्रणब मुखर्जी ने संघ के मंच से अपनी बात रखी, अरविंद नेताम ने आदिवासी समाज के मुद्दों पर संघ के कार्यक्रम में भाग लिया, सिंधिया ने भाजपा में आने से पहले संघ नेतृत्व से संपर्क किया और अब शशि थरूर की सुरेश सोनी से मुलाकात चर्चा में है।
निष्कर्ष
हालांकि हर मुलाकात का संदर्भ और समय अलग है। किसी मुलाकात को राजनीतिक समीकरणों से जोड़ना या उसे विचारधारा में बदलाव का संकेत मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस और संघ के बीच सार्वजनिक वैचारिक टकराव के समानांतर संवाद और व्यक्तिगत संपर्कों का सिलसिला भी समय-समय पर सामने आता रहा है।
सिंधिया की कांग्रेस में शामिल रहते और अरविंद नेताम की चर्चित संघ संबंधी घटनाएं कांग्रेस छोड़ने के बाद की हैं। वहीं प्रणब मुखर्जी का मामला कांग्रेस के भीतर विरोध के बावजूद संघ के मंच पर जाने का था। शशि थरूर की मुलाकात को इसे किसी राजनीतिक समझौते या विचारधारा परिवर्तन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। हालांकि थरूर का कुछ समय से बीजेपी के प्रति झुकाव चर्चा का विषय रहा है।