भारत में डिसेंट वर्क: नौकरी बढ़ी, लेकिन अच्छी नौकरी अब भी दूर की बात, Decent Work Index ने खोली रोजगार की हकीकत

Manya Jain | Sootr Creatives | Nov 02, 2026, 17:00 IST
भारत में बेरोजगारी दर 3.2% हुई, लेकिन वीक डेन्ट वर्क इंडेक्स नौकरी की सुरक्षा, वेतन और सामाजिक सुरक्षा पर सवाल उठाता है।
India's unemployment rate declined to 3.2%, but the low Decent Work Index highlights concerns over job security, wages and social protection.
भारत में बेरोजगारी की दर में कमी आई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017-18 में बेरोजगारी दर 6.1% थी। यह 2023-24 में घटकर 3.2% रह गई। महिलाओं की कामकाज में भागीदारी भी बढ़ी है। पहली नजर में ये आंकड़े अच्छे रोजगार की तस्वीर दिखाते हैं। लेकिन नौकरी मिलने का मतलब अच्छी नौकरी मिलना नहीं है।

देश में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग काम कर रहे हैं, जिनके पास नौकरी की सुरक्षा नहीं है। कई लोगों को लिखित कॉन्ट्रैक्ट, पेड लीव, पीएफ और बीमा जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। इसके बावजूद सरकारी आंकड़ों में उन्हें रोजगार करने वाला माना जाता है।



एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का डिसेंट वर्क इंडेक्स (DWI) 2017-18 में 0.247 था। 2023-24 में यह बढ़कर 0.302 हो गया। यानी सुधार तो हुआ, लेकिन अच्छी नौकरी की स्थिति अब भी कमजोर है। करीब 90% कामगार अनौपचारिक रोजगार में हैं। इसका मतलब है कि हर 10 में से लगभग 9 लोगों के पास रोजगार की पूरी सुरक्षा नहीं है।



क्या कहते हैं आंकड़े

आंकड़े बताते हैं कि भारत में बेरोजगारी दर 2017-18 के 6.1% से घटकर 2023-24 में 3.2% रह गई है। लेकिन नौकरी की क्वालिटी नापने वाला डिसेंट वर्क इंडेक्स (DWI) सिर्फ 0.302 है। करीब 90% कामगार अब भी अनौपचारिक काम में हैं। अनुसूचित जनजाति और OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) की महिलाओं के नतीजे तो और भी बिगड़े हैं। तीन बड़े अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अब नौकरी की गिनती नहीं, उसकी गुणवत्ता देखनी होगी।



भारत में बेरोजगारी का दर

यह मामला आपसे क्यों जुड़ा है?

आप नौकरी करते हैं या आपके घर में कोई नौकरी करता है, तो यह खबर आपके काम की है। बेरोजगारी घटने से हर घर की परेशानी खत्म नहीं होती है। बीमारी, छंटनी या मंदी आने पर बिना सुरक्षा वाले कामगार सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। आपकी नौकरी में लिखित कॉन्ट्रैक्ट, पेड लीव और PF है या नहीं, यही सबसे बड़ा फर्क पैदा करता है।



पहले क्या था

2017-18 में भारत में बेरोजगारी दर 6.1% थी। छह साल बाद, यानी 2023-24 में यह घटकर 3.2% रह गई है। इसी दौरान महिलाओं की कामकाज में भागीदारी भी बढ़ी है। अब पहले से ज्यादा महिलाएं नौकरी के लिए घरों से बाहर निकल रही हैं। सरकारी दस्तावेजों में भी इस बदलाव का जिक्र किया गया है।



लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि रोजगार तो बढ़ा, लेकिन कैसा रोजगार?



मामला अब डिसेंट वर्क का है

पहले डिसेंट वर्क का मतलब समझ लेते हैं। ILO (International Labour Organization) के मुताबिक, डिसेंट वर्क यानी ऐसा रोजगार, जिसमें सही कमाई हो। साथ ही काम के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान भी मिले। यही बात सतत विकास लक्ष्य 8 यानी SDG-8 में भी कही गई है। इसमें सबके लिए डिसेंट वर्क की बात है।



पेट भरना और पौष्टिक खाना खाना अलग-अलग बातें हैं। रोजगार और डिसेंट वर्क के बीच भी यही अंतर है। उदाहरण के लिए, बिना कॉन्ट्रैक्ट के कपड़े सिलने वाला व्यक्ति है। बिना बीमा के काम करने वाला गिग वर्कर है। बिना पेड लीव के काम करने वाला मजदूर है। ये तीनों रोजगार की कैटेगरी में आते हैं। लेकिन इनके काम करने की असल स्थिति क्या है? यही सबसे बड़ा सवाल है।



डिसेंट वर्क इंडेक्स को तीन पैमानों पर समझा जा सकता है। पहला रोजगार की स्थिति, दूसरा रोजगार के मौके और तीसरा सामाजिक सुरक्षा है।



इस इंडेक्स को पांच क्षेत्रों में लागू किया गया। इनमें खेती, मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण, थोक और खुदरा व्यापार शामिल हैं। इसके अलावा परिवहन क्षेत्र को भी इसमें रखा गया। नतीजे के मुताबिक, DWI 2017-18 में 0.247 था। यह 2023-24 में बढ़कर 0.302 हो गया है।



मैन्युफैक्चरिंग और परिवहन में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है। मैन्युफैक्चरिंग का DWI 0.324 से बढ़कर 0.411 हो गया। इसकी वजह काम का औपचारिक होना और डिजिटल सुविधाएं रहीं है। वहीं, परिवहन का इंडेक्स 0.285 से बढ़कर 0.35 हो गया है। इसमें शहरी लॉजिस्टिक्स और ऐप आधारित काम की बड़ी भूमिका रही। खेती का DWI भी 0.211 से बढ़कर 0.267 हुआ। हालांकि, यह अब भी सबसे नीचे है।



लेकिन जिन क्षेत्रों में सुधार हुआ, वहां भी सामाजिक सुरक्षा की स्थिति कमजोर है। कई कामगारों के पास लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं है। उन्हें पेड लीव, PF और बीमा जैसी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं हैं।



90% कामगारों के पास पक्की नौकरी नहीं

खेती की समस्या सिर्फ कम पैदावार तक सीमित नहीं है। लेखकों के मुताबिक असली परेशानी अनौपचारिक नौकरियों का बढ़ना है। ज्यादातर खेतिहर मजदूर खुद काम करते हैं। कई लोग परिवार के खेतों में बिना वेतन काम करते हैं। निर्माण और खुदरा क्षेत्र में भी हालात ऐसे ही हैं। यहां कामगारों को पक्का रोजगार नहीं मिलता है। उन्हें अस्थायी काम करना पड़ता है। कई बार ठेकेदारों की लंबी कड़ी पर निर्भर रहना पड़ता है।



ILO और IHD की इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024 के मुताबिक करीब 90% कामगार अनौपचारिक रोजगार में हैं। यह आंकड़ा 2019 के मुकाबले बढ़ा है। यानी हर 10 में से करीब 9 कामगारों को नौकरी की पक्की सुरक्षा नहीं है। अब यह समस्या कई क्षेत्रों में फैल रही है। इसमें सप्लाई चेन, गिग वर्क, लॉजिस्टिक्स और घर से होने वाला काम शामिल है। संगठित उद्योग भी इससे अछूते नहीं हैं। यहां भी ठेके पर भर्ती और आउटसोर्सिंग का चलन बढ़ा है।



अब जाति और जेंडर का पहलू देखिए

पढ़ाई, औपचारिक कंपनियों में काम और स्किल ट्रेनिंग से अच्छी नौकरी के मौके बढ़ते हैं। लेकिन अनौपचारिक काम बढ़ने से ये मौके घट जाते हैं। 2017-18 से 2023-24 के बीच पुरुषों की स्थिति सुधरी है। लेकिन अनुसूचित जनजाति और OBC की महिलाओं की स्थिति बिगड़ी है। कोविड-19 के बाद यह फर्क और बढ़ गया। ऐसे में सवाल है कि क्या असमानता सिर्फ पैसों तक सीमित है? जानकारों के मुताबिक, ऐसा नहीं है। इसकी जड़ें जाति और महिला-पुरुष के भेदभाव में भी हैं।



राज्यों के बीच भी बड़ा अंतर है। गोवा, केरल, तमिलनाडु और हरियाणा में अच्छी नौकरियों की स्थिति बेहतर है। वहीं, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश अब भी पीछे हैं।



साफ है कि सामाजिक सुरक्षा के बिना काम करने वाले लोग कम खर्च करते हैं। वे बचत भी कम कर पाते हैं। आर्थिक संकट आने पर सबसे ज्यादा परेशानी इन्हें होती है। अनौपचारिक काम से उत्पादकता घटती है। इससे टैक्स वसूली की क्षमता कमजोर होती है। साथ ही, समाज में असमानता भी बढ़ती है।



अब आप क्या करें

अब आप क्या करें:देखें कि आपके काम में लिखित कॉन्ट्रैक्ट, पेड लीव और PF की सुविधा है या नहीं।



क्यों अभी:लेख के मुताबिक चार लेबर कोड 2025 में आए। लेकिन इनका पूरा अमल अभी बाकी है।



आगे देखें:लेबर कोड लागू होने पर अगली सरकारी रिपोर्ट और PLFS के नए आंकड़े।



यह खबर क्यों जरूरी है?

संविधान का अनुच्छेद 21 सम्मान के साथ जीने का हक देता है। अनुच्छेद 14 और 15 सभी को बराबरी का अधिकार देते हैं। ये जाति और जेंडर के आधार पर भेदभाव से बचाते हैं। नीति निर्देशक सिद्धांत भी अच्छे काम और बेहतर जीवन की बात करते हैं।



जब जाति और जेंडर के कारण कामगार पीछे रह जाते हैं, तो यह संवैधानिक मुद्दा बन जाता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में गिग वर्कर्स की सुरक्षा भी जरूरी है। यह सामाजिक सोच और कानून, दोनों की परीक्षा है।

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