शिक्षा सर्वे का बड़ा खुलासा: अमीर हों या गरीब, बेटियों के साथ भेदभाव एक जैसा
समझें क्या है मामला
एक गरीब परिवार की बेटी।
एक अमीर परिवार की बेटी।
Gender gap in education: दोनों के साथ स्कूल के दरवाजे पर लगभग एक जैसा बर्ताव होता है। यह किसी अनुमान की बात नहीं है। यह ताजा सरकारी आंकड़ों में दर्ज है।
देश के नए शिक्षा सर्वे में जाति, आय और लिंग तीनों आधार पर भेदभाव की जांच हुई। जाति और आय का असर पैसे से घटता पाया गया। लेकिन बेटा बेटी का फासला हर आय वर्ग में लगभग बराबर निकला।
सबसे अमीर 20% परिवारों में भी बेटियां बेटों से करीब दो में पीछे रहीं। सबसे गरीब 20% परिवारों में भी यही फासला मिला। यह पैटर्न स्कूल की हर स्टेज पर एक जैसा बना रहा।
यह आपसे क्यों जुड़ा है
अगर आपके घर में मोहल्ले में या स्कूल में बेटा प्राइवेट कोचिंग जाता है और बेटी सरकारी क्लास तक सीमित रहती है, तो यह कोई अकेला फैसला नहीं है। यह सर्वे कहता है कि यह देश भर के लाखों घरों में हो रहा एक जैसा फैसला है। सोचिए एक बार, अगर पैसे की कोई कमी नहीं है, तब भी बेटी को कम मिल रहा है तो असली वजह क्या है।
पहले क्या था
निजी स्कूल और ट्यूशन का बाजार भारत में पिछले दो दशक में तेजी से बढ़ा है। सरकारी स्कूलों की फीस लगभग शून्य होने के बावजूद परिवार प्राइवेट स्कूल को बेहतर भविष्य की गारंटी मानते हैं। इसी सोच के चलते परिवार सीमित बजट में यह तय करते हैं कि किस बच्चे पर कितना खर्च होगा।
पुराने सर्वे भी बेटा बेटी के बीच खर्च का अंतर दिखाते रहे हैं, लेकिन इस बार सर्वे ने जाति, आय और लिंग को अलग अलग करके देखा है। यही इस अध्ययन को खास बनाता है।
क्या हुआ और क्यों
पहले जाति की बात करें। सामान्य वर्ग के 42 में से हर 100 बच्चे प्राइवेट स्कूल जाते हैं। आदिवासी परिवारों में यह आंकड़ा 16 है। बड़ी वजह पैसा है। सामान्य वर्ग परिवार शिक्षा पर औसतन हर महीने करीब 39 सौ रुपए प्रति सदस्य खर्च करते हैं, जबकि अनुसूचित जनजाति परिवार करीब 25 सौ रुपए।
लेकिन जब समान खर्च वाले परिवारों की तुलना एक ही राज्य में की गई, तो दलित बच्चे फिर भी 15 में और आदिवासी बच्चे 13 में पीछे मिले। दो परिवार, एक जैसा खर्च, एक जैसा राज्य, फिर भी एक बच्चे को प्राइवेट स्कूल का दरवाजा आसानी से नहीं मिलता।
अलग तरीके से चलता है कोचिंग का बाजार
यहीं से मामला पलटता है। कोचिंग का बाजार पूरी तरह अलग तरीके से चलता है। यहां जाति का असर पैसे से नहीं, बल्कि भूगोल से तय होता है। एक ही राज्य में दलित और सामान्य वर्ग के बच्चों की तुलना करें तो फासला लगभग खत्म हो जाता है। कारण साफ है, ट्यूशन का कारोबार देश के कुछ हिस्सों में ज्यादा फैला है, और अलग अलग समुदाय अलग अलग जगह रहते हैं।
लेकिन सवाल यह है, बेटा बेटी का फासला किस चीज से चलता है? जवाब चौंकाने वाला है। राष्ट्रीय स्तर पर हर सौ लड़कों में से करीब 28 प्राइवेट कोचिंग लेते हैं, लड़कियों में यह आंकड़ा 26 है।
प्राइवेट स्कूल में भी 35 लड़कों के मुकाबले 30 लड़कियां मिलती हैं। यह फासला सबसे अमीर और सबसे गरीब परिवारों में करीब करीब बराबर रहता है। दलित हो, आदिवासी हो या सामान्य वर्ग, फासला हर जगह करीब एक से दो के बीच अटका रहता है।
यही वो जगह है जहां चीजें इंटरेस्टिंग होती हैं। इसे एक उदाहरण से समझें। मान लीजिए एक परिवार के पास हर महीने तीन हजार रुपए ट्यूशन पर खर्च करने की क्षमता है।
ऐसे परिवार में भी बेटे को कोचिंग भेजने की संभावना बेटी से थोड़ी ज्यादा ही रहती है, भले ही पैसे की कोई कमी न हो। ये फैसला बजट का नहीं, प्राथमिकता का है।
कौन कौन इसमें शामिल है
इस मामले में तीन पक्ष हैं। पहला, परिवार खुद, जो बेटे और बेटी के बीच सीमित संसाधन बांटते समय एक अनकहा फैसला लेते हैं। दूसरा, प्राइवेट स्कूल और कोचिंग संस्थान, जो जिस इलाके में मौजूद हैं वहीं तक सेवा पहुंचा पाते हैं।
तीसरा, सरकार और नीति निर्माता, जो फीस माफी जैसी योजनाओं से जाति का गैप कम करने की कोशिश करते हैं, लेकिन लिंग के गैप पर उनकी योजनाएं सीधे असर नहीं डालतीं।
दोनों पक्षों की बात
एक तर्क यह है कि परिवार सीमित बजट में बेटे को भविष्य का कमाऊ सदस्य मानकर प्राथमिकता देते हैं, यह सामाजिक सोच पीढ़ियों पुरानी है।
दूसरा तर्क यह है कि आर्थिक हालात अब पहले जैसे नहीं रहे, महिलाएं भी बड़ी संख्या में कमाई कर रही हैं, इसलिए यह प्राथमिकता अब तर्कसंगत नहीं मानी जा सकती। सर्वे खुद किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं करता, वह सिर्फ आंकड़े दिखाता है।
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ कनेक्शन
इसी सर्वे से जुड़े अलग आंकड़े इन तीन राज्यों की तस्वीर भी दिखाते हैं। छत्तीसगढ़ और राजस्थान देश के उन राज्यों में शामिल हैं जहां प्राइवेट कोचिंग लेने वाले बच्चों का प्रतिशत सबसे कम है, छत्तीसगढ़ में करीब 4.5% और राजस्थान में करीब 7.2%।
दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ उन गिने चुने राज्यों में है जहां परिवार बेटियों की शिक्षा पर बेटों से ज्यादा खर्च करते पाए गए हैं, केरल और अरुणाचल प्रदेश के साथ।
आगे क्या होगा
अगर यह ट्रेंड ऐसे ही चलता रहा तो देश की आर्थिक तरक्की जाति और आय का गैप तो धीरे धीरे कम कर देगी, लेकिन बेटा बेटी का फासला वैसे ही बना रह सकता है। यह सवाल अब नीति बनाने वालों के सामने है कि सिर्फ पैसे की मदद से यह गैप नहीं भरेगा, तो फिर रास्ता क्या है।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
आमतौर पर माना जाता है कि गरीब घरों में बेटियों के साथ भेदभाव ज्यादा होता है और अमीर घरों में कम। यह सर्वे इस धारणा को सीधे तोड़ता है। सबसे अमीर परिवारों में भी बेटी को उतना ही कम मिलता है जितना सबसे गरीब परिवार में। पैसा इस भेदभाव की जड़ नहीं है।
अब आप क्या करें
- अब आप क्या करें: अपने आसपास के स्कूल दाखिले के आंकड़ों पर ध्यान दें और बेटा बेटी के अनुपात पर सवाल पूछें
- क्यों अभी: सरकार अगली शिक्षा नीति समीक्षा में इसी सर्वे के आंकड़े इस्तेमाल कर सकती है
- आगे देखें: शिक्षा मंत्रालय की अगली रिपोर्ट, जिसमें राज्यवार पूरा ब्यौरा आ सकता है
यह खबर क्यों जरूरी है
भारतीय संविधान अनुच्छेद 15 और 21A के तहत हर बच्चे को समान और मुफ्त शिक्षा का अधिकार है। जब एक जैसी आर्थिक हैसियत वाले परिवार बेटे और बेटी के बीच शिक्षा खर्च में फर्क करते हैं, तो यह संवैधानिक समानता की भावना के खिलाफ जाता है। यह सिर्फ नीति का सवाल नहीं, सामाजिक नैतिकता का भी सवाल है।
Source:
- The Hindu: India's gender gap in private education defies caste and class
- Comprehensive Modular Survey: Education (CMS:E) 2025, NSS 80th Round, MoSPI
- Careers360, CMS Education Survey 2025
FAQ
- क्या अमीर परिवारों में बेटा बेटी का भेदभाव कम होता है?
नहीं। सर्वे के मुताबिक सबसे अमीर 20% परिवारों में भी बेटियां प्राइवेट कोचिंग और स्कूल में बेटों से लगभग उतनी ही पीछे हैं जितनी सबसे गरीब परिवारों में। - क्या जाति का असर पैसे से कम हो जाता है?
काफी हद तक हां, खासकर ओबीसी वर्ग में। लेकिन दलित और आदिवासी बच्चों के लिए फासला पैसा बराबर करने के बाद भी बना रहता है। - छत्तीसगढ़ में क्या अलग पैटर्न है?
छत्तीसगढ़ उन कुछ राज्यों में है जहां परिवार बेटियों की शिक्षा पर बेटों से ज्यादा खर्च करते पाए गए हैं, हालांकि वहां प्राइवेट कोचिंग का इस्तेमाल देश में सबसे कम माना जाता है।
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