साल के आखिर में चरम पर होगा ‘गॉडजिला’ एल नीनो, समुद्र में रिकॉर्ड गर्मी; क्या भारत में बढ़ेगा खाद्य संकट?
दुनिया पर मौसम का एक बड़ा खतरा मंडरा रहा। प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) का पानी तेजी से गर्म हो रहा। अनुमान है कि इस साल के आखिर में यह गर्मी पुराने रिकॉर्ड तोड़ सकती। 21 अक्टूबर को विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेताया कि एल नीनो का असर 2027 में भी महसूस किया जाएगा। इससे भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में तापमान बढ़ सकता। कहीं सूखा पड़ सकता, तो कहीं भारी बारिश और बाढ़ कोहराम मचा सकती। इसका सीधा असर खेती, पानी और खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर पड़ सकता है । THE Sootr Prime में समझिए कि हजारों किलोमीटर दूर समुद्र में बढ़ रही गर्मी भारत के मानसून और दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए इतनी बड़ी चिंता क्यों बन गई है।
साल के आखिर में क्यों बढ़ सकता है गर्मी का खतरा?
इस खतरे की वजह है एल नीनो (El Nino)। यह प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक घटना है। इस दौरान समुद्र के बीच और दक्षिण अमेरिका की तरफ वाले हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता। समुद्र की यह गर्मी हवा और बारिश के पूरे सिस्टम को प्रभावित करती है। इस बार चिंता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि एल नीनो बहुत तेजी से मजबूत हुआ है। जून 2026 में शुरू हुई इस घटना के अक्टूबर से दिसंबर के बीच अपने सबसे ताकतवर स्तर पर पहुंचने का अनुमान है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मुताबिक, प्रशांत महासागर के एक खास हिस्से का तापमान सामान्य से करीब 3.8 डिग्री सेल्सियस ज्यादा हो सकता। यह असाधारण बढ़ोतरी होगी। इसी वजह से इसे 'गॉडज़िला' या 'सुपर एल नीनो' कहा जा रहा। हालांकि, ये वैज्ञानिक नाम या श्रेणी नहीं है, बल्कि इसकी ताकत बताने के लिए इस्तेमाल होने वाले नाम हैं।
यहां एक बात समझना जरूरी है। 3.8 डिग्री की बढ़ोतरी पूरी पृथ्वी के तापमान में नहीं होगी। यह समुद्र के उस हिस्से का अनुमान है, जहां से एल नीनो की शुरुआत होती, लेकिन इस छोटे से हिस्से में बदलाव का असर हजारों किलोमीटर दूर तक पहुंच सकता।
समुद्र का गर्म पानी दुनिया का मौसम कैसे बदल देता है?
इसे ऐसे समझिए। समुद्र का पानी गर्म होने पर उससे ज्यादा भाप उठती है। भाप से बादल बनते हैं और बारिश होती है, लेकिन बारिश कहां होगी, यह हवाओं की दिशा और ताकत पर भी निर्भर करता है। सामान्य दिनों में प्रशांत महासागर की हवाएं गर्म पानी को दक्षिण अमेरिका से इंडोनेशिया की तरफ धकेलती हैं। इससे इंडोनेशिया के आसपास ज्यादा बादल बनते हैं और बारिश होती है। एल नीनो आने पर ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। गर्म पानी समुद्र के बीच और पूर्वी हिस्से में फैलने लगता है। इसके साथ बादल बनने और बारिश होने की जगह भी बदल सकती।
यही बदलाव भारत तक पहुंचता है। कुछ इलाकों में बारिश कम होने लगती है। दूसरी तरफ दुनिया के कुछ हिस्सों में ज्यादा बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। यानी समुद्र की गर्मी एक जगह बढ़ती है, लेकिन मौसम कई देशों का बदल सकता है। ऐसा इस बार के मानसून सीजन में भारत में भी कई राज्यों में नजर आया। कहीं बहुत ज्यादा बारिश की वजह से बाढ़ के हालात पैदा हुए तो कहीं औसत से बेहद कम बारिश हुई।
मौसम के इस बदलाव को समझने के लिए हमें एल नीनो, ला नीना को भी समझना होगा।
एल नीनो, ला नीना और ENSO क्या हैं?
एल नीनो दरअसल प्रशांत महासागर के पानी और उसके ऊपर चलने वाली हवाओं से जुड़ी एक मौसमी घटना है। समुद्र और हवाओं के इस पूरे सिस्टम को एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) कहते हैं। इसके तीन हिस्से हैं। पहला एल नीनो, जब समुद्र का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। दूसरा ला नीना, जब यही पानी सामान्य से ज्यादा ठंडा हो जाता है। तीसरा न्यूट्रल, जब पानी का तापमान लगभग सामान्य रहता है। इन तीनों स्थितियों से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश और गर्मी का पैटर्न बदल सकता है।
अब सवाल है कि वैज्ञानिक कैसे पता लगाते हैं कि एल नीनो कितना मजबूत है? इसके लिए वे प्रशांत महासागर के एक खास हिस्से नीनो 3.4 में पानी का तापमान मापते हैं। फिर RONI नाम के पैमाने से देखते हैं कि पानी सामान्य के मुकाबले कितना गर्म या ठंडा है। तीन महीने का औसत आधा डिग्री से ज्यादा गर्म हो, तो एल नीनो और आधा डिग्री से ज्यादा ठंडा हो, तो ला नीना की स्थिति मानी जाती है।
2026 का एल नीनो जून में शुरू हुआ और तेजी से मजबूत हुआ। जुलाई से सितंबर के बीच गर्मी का अंतर 2 से 2.8 डिग्री तक पहुंच गया। पहले यह अंतर अधिकतम करीब 3 डिग्री दर्ज हुआ था। अब इस बार पुराने रिकॉर्ड टूटने की आशंका है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, अक्टूबर से दिसंबर के बीच एल नीनो अपने सबसे मजबूत स्तर पर पहुंच सकता है।
2026 का एल नीनो पिछले वर्षों से कितना अलग है?
एल नीनो कोई नई घटना नहीं है। यह आमतौर पर दो से सात साल के अंतराल में लौट सकता है। लेकिन हर बार इसकी ताकत एक जैसी नहीं होती। 2026 में सबसे अलग बात इसकी तेजी है। जून में शुरुआत के बाद कुछ ही महीनों में समुद्र का तापमान काफी बढ़ गया। अब इसके पुराने रिकॉर्ड को पार करने का अनुमान है। दूसरी चिंता यह है कि दुनिया पहले से जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्म हो रही। ऐसे में एल नीनो की अतिरिक्त गर्मी तापमान को और ऊपर ले जा सकती।
इसका मतलब केवल गर्म दिन नहीं हैं। ज्यादा गर्मी से पानी जल्दी सूखता है। खेतों को ज्यादा सिंचाई चाहिए होती है। बिजली की मांग बढ़ती है। और अगर इसी दौरान बारिश भी कम हो जाए, तो मुश्किल कई गुना बढ़ सकती है।भारत में इस साल कमजोर मानसून के रूप में इसका असर पहले ही सामने आ चुका है।
भारत में इस साल एल नीनो ने मानसून को कितना कमजोर किया?
भारत में एल नीनो का असर समझने के लिए इस साल की बारिश के आंकड़े देखिए। जून से सितंबर 2026 के बीच देश में सामान्य के मुकाबले करीब 13 फीसदी कम बारिश हुई। आमतौर पर इन चार महीनों में 868.6 मिलीमीटर बारिश होती है। इस बार केवल 759.4 मिलीमीटर हुई। यह 2001 के बाद चौथा सबसे कमजोर मानसून रहा।
बारिश की कमी पूरे मौसम में एक जैसी नहीं रही। जून में करीब 40 फीसदी कम बारिश हुई। जुलाई में सामान्य से थोड़ी ज्यादा बारिश ने राहत दी, लेकिन अगस्त में फिर करीब 16 फीसदी और सितंबर में 7 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई। यही उतार-चढ़ाव किसानों के लिए परेशानी बना। फसल को जब पानी चाहिए था, तब कई जगह बारिश नहीं हुई। कुछ इलाकों में बाद में तेज बारिश हुई, लेकिन उससे पहले की कमी पूरी नहीं हो सकी। इस कमजोर मानसून के पीछे एल नीनो एक अहम वजह रहा। हालांकि, भारत की बारिश केवल एल नीनो पर निर्भर नहीं करती। दूसरे समुद्री और मौसमी बदलाव भी इसे प्रभावित करते हैं।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून से बारिश कैसे होती है?
यहां समझना जरूरी है कि भारत में बारिश आती कैसे है। देश की सालाना बारिश का करीब 70 फीसदी हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) से मिलता है। यह मानसून जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है। गर्मियों में भारत की जमीन समुद्र के मुकाबले जल्दी गर्म होती है। गर्म हवा ऊपर उठती है और उसकी जगह भरने के लिए समुद्र से नमी वाली हवाएं आने लगती हैं।
ये हवाएं अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से पानी की भाप लेकर भारत पहुंचती हैं। जब यह नमी ऊपर जाकर ठंडी होती है, तो बादल बनते हैं और बारिश होती है। आसान भाषा में यही दक्षिण-पश्चिम मानसून है। लेकिन एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर में हवा और बारिश का सिस्टम बदलता है। इसका असर भारत की तरफ आने वाली नमी और बादलों पर भी पड़ सकता है। नतीजा, मानसून कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है। इसीलिए हजारों किलोमीटर दूर समुद्र में बढ़ी गर्मी भारत के खेतों तक पहुंच जाती।
कमजोर मानसून से भारत में अनाज की कमी हो सकती है?
कम बारिश का पहला असर खेतों पर पड़ता है। धान,मक्का,दाल और सोयाबीन जैसी खरीफ फसलें बरसात के मौसम में उगाई जाती हैं। इनके लिए सही समय पर पानी मिलना जरूरी है। इस साल खरीफ की बुवाई का कुल क्षेत्र बहुत ज्यादा नहीं घटा। सितंबर तक यह पिछले साल से करीब 1.4 फीसदी कम था,लेकिन केवल बुवाई के आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं बताते। फसल बोने के बाद बारिश कम हो जाए, तो पैदावार घट सकती है। यही वजह है कि चावल, मक्का और दालों के उत्पादन को लेकर चिंता है।
अमेरिकी कृषि विभाग के अनुमानों में भी भारत के चावल और मक्का उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले कमी की आशंका जताई गई है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि देश में अनाज खत्म हो जाएगा। भारत के पास सरकारी अनाज भंडार हैं। सिंचाई की सुविधा भी है। जरूरत पड़ने पर बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के दूसरे रास्ते अपनाए जा सकते हैं।फिर भी उत्पादन घटा, तो कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर होगा, जिनकी कमाई का बड़ा हिस्सा खाने-पीने पर खर्च होता है।
खरीफ के बाद रबी की फसल पर भी क्यों है खतरा?
मानसून की कमी का असर सितंबर में बारिश खत्म होने के साथ नहीं रुकता। बारिश का पानी बांधों, तालाबों और जमीन के नीचे जमा होता है। यही पानी आगे खेती और पीने के काम आता है।जब बारिश कम होती है, तो कई जगह पानी का यह भंडार भी प्रभावित हो सकता है। इससे अक्टूबर-नवंबर में शुरू होने वाली रबी की खेती पर दबाव बढ़ता है।रबी यानी सर्दियों में बोई जाने वाली फसलें। इनमें गेहूं, चना, सरसों और मसूर शामिल हैं। अब अगर एल नीनो की वजह से सर्दी भी सामान्य से गर्म रही, तो परेशानी और बढ़ सकती है।
गेहूं जैसी फसलों को बढ़ने के दौरान ठंडे मौसम की जरूरत होती है। ज्यादा तापमान से पैदावार प्रभावित हो सकती है।यानी खतरा दो तरफ से है। पहले मानसून में कम बारिश और फिर सर्दियों में ज्यादा गर्मी। दोनों मिलकर खाद्यान्न उत्पादन और कीमतों पर असर डाल सकते हैं।
भारत के अलावा अफ्रीका, यूरोप और एशिया में क्या होगा?
भारत की तरह दुनिया के दूसरे देशों में भी एल नीनो का असर एक जैसा नहीं होगा। कहीं बारिश घटेगी, तो कहीं इतनी बढ़ सकती है कि बाढ़ आ जाए। साउथ अफ्रीका के कई हिस्सों में सूखे का खतरा है। इससे खेती और पीने के पानी की परेशानी बढ़ सकती है। वहीं पूर्वी अफ्रीका के कुछ इलाकों में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा रहेगा।
यूरोप के दक्षिणी हिस्सों में सामान्य से ज्यादा तापमान रहने की आशंका है। एशिया में भारत और आसपास के देशों में गर्मी बढ़ सकती है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों को सूखे, बाढ़ और तूफानों का सामना करना पड़ सकता है। मध्य और दक्षिण अमेरिका में भी अलग-अलग इलाकों में बारिश की कमी और बाढ़ का खतरा है। सबसे बड़ी चिंता उन देशों को लेकर है, जहां पहले से गरीबी, भूख और पानी की कमी है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, एल नीनो से करीब पांच करोड़ लोगों के सामने भूख का खतरा बढ़ सकता।
दुनिया की अर्थव्यवस्था पर कैसे पड़ेगा असर?
जब कई देशों में एक साथ खेती प्रभावित होती है, तो उसका असर दुनिया के बाजार पर पड़ता है। अनाज की सप्लाई घटने से कीमतें बढ़ सकती हैं। बाढ़ और तूफान सड़कें, बंदरगाह और माल की आवाजाही भी रोक सकते हैं। इससे उन देशों की मुश्किल बढ़ेगी, जो खाने-पीने की चीजें बाहर से मंगाते हैं। उन्हें ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।इसके साथ तेल और खाद की कीमतें बढ़ीं, तो खेती की लागत और बढ़ जाएगी। पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री व्यापार में रुकावटों के कारण दुनिया पहले से दबाव में है। ऐसे में एल नीनो नई परेशानी जोड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की 21 अक्टूबर की जानकारी के मुताबिक, अफ्रीकी विकास बैंक ने अफ्रीकी देशों को 10 से 20 अरब डॉलर के नुकसान की आशंका जताई है। वहां आर्थिक विकास पर भी असर पड़ सकता है।
आखिर भारत और दुनिया के सामने कितनी बड़ी चुनौती है?
2026 का एल नीनो साल के आखिर में अपने सबसे मजबूत स्तर पर पहुंच सकता है। इसका असर 2027 तक रहने की आशंका है। भारत में कमजोर मानसून पहले ही खेती और पानी की चिंता बढ़ा चुका है। अब सर्दियों का तापमान और अगली फसलों की पैदावार अहम होगी। दूसरी तरफ दुनिया के कई देशों को सूखे, बाढ़, भूख और महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में सरकारों को अभी से पानी बचाने, किसानों की मदद करने, अनाज का पर्याप्त भंडार रखने और मौसम की चेतावनियां समय पर लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है। क्योंकि एल नीनो को रोका नहीं जा सकता, लेकिन सही तैयारी से उसके नुकसान जरूर कम किए जा सकते हैं।