ग्रीन पटाखों का काला सच, पारंपरिक क्रैकर्स से कम लेकिन खतरा बरकरार, हवा में छोड़ते हैं खतरनाक अल्ट्राफाइन कण

Arun Tiwari | Nov 03, 2026, 16:43 IST
क्या सच में सुरक्षित हैं ग्रीन पटाखे? कम प्रदूषण का दावा, लेकिन अल्ट्राफाइन कणों का खतरा बरकरार
Green crackers may reduce pollution compared to traditional firecrackers, but they are not completely pollution-free and can still pose serious health risks.
दीपावली पर पटाखे फोड़ने को लेकर हर साल प्रदूषण और पर्यावरण सुरक्षा की बहस होती है। बढ़ते वायु प्रदूषण को देखते हुए ग्रीन पटाखों को पारंपरिक आतिशबाजी के विकल्प के रूप में पेश किया गया है। दावा किया जाता है कि ये सामान्य पटाखों की तुलना में कम धुआं और कम प्रदूषण फैलाते हैं।

लेकिन क्या वास्तव में ग्रीन पटाखे पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं? क्या इनके इस्तेमाल से प्रदूषण की समस्या खत्म हो सकती है?



वैज्ञानिक अध्ययनों के आंकड़े बताते हैं कि ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों से बेहतर जरूर हैं, लेकिन इन्हें पूरी तरह प्रदूषण मुक्त कहना सही नहीं होगा। ग्रीन पटाखों को इस तरह तैयार किया गया है कि इनके जलने से निकलने वाले प्रदूषक तत्वों की मात्रा पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम हो। इनका उद्देश्य हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों (PM) के उत्सर्जन में कम से कम 30 प्रतिशत और गैसीय प्रदूषण में कम से कम 10 प्रतिशत की कमी लाना है। इनके शोर का स्तर भी चार मीटर की दूरी पर 125 डेसिबल से कम रखने का लक्ष्य है।



हालांकि, इन पटाखों को लेकर एक चिंता भी सामने आई है। दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में पाया गया कि ग्रीन पटाखे जलने पर बड़ी मात्रा में अल्ट्राफाइन कण छोड़ सकते हैं। ये कण आकार में बेहद छोटे होते हैं और स्वास्थ्य के लिहाज से PM2.5 और PM10 जैसे कणों से भी अधिक खतरनाक हो सकते हैं। ऐसे में ग्रीन पटाखों का इस्तेमाल प्रदूषण को कम तो कर सकता है, लेकिन इनके खतरे पूरी तरह समाप्त नहीं करता।




रसायनों के इस्तेमाल में बड़ा अंतर

पारंपरिक और ग्रीन पटाखों के बीच सबसे बड़ा अंतर उनकी रासायनिक संरचना का है। सामान्य पटाखों में लगभग 34 प्रतिशत एल्युमिनियम, 57 प्रतिशत पोटैशियम नाइट्रेट और 9 प्रतिशत सल्फर का इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत, ग्रीन पटाखों में एल्युमिनियम की मात्रा 29 प्रतिशत, पोटैशियम नाइट्रेट 28 प्रतिशत और सल्फर की मात्रा महज 5 प्रतिशत रखी जाती है। इनमें लगभग 38 प्रतिशत CSIR-NEERI की विशेष सामग्री (Fe₂O₃) का इस्तेमाल किया जाता है।



इस बदलाव का उद्देश्य पटाखों के जलने से निकलने वाले हानिकारक उत्सर्जन को कम करना है। आंकड़ों के मुताबिक, ग्रीन पटाखों में एल्युमिनियम का इस्तेमाल करीब 14 प्रतिशत, सल्फर का 44 प्रतिशत और पोटैशियम नाइट्रेट का 50 प्रतिशत तक कम किया गया है। इनके इस्तेमाल से पार्टिकुलेट मैटर के उत्सर्जन में भी लगभग 30 प्रतिशत कमी का दावा किया गया है।




इन पांच खतरनाक रसायनों पर रोक

ग्रीन पटाखों को तैयार करते समय कुछ ऐसे रसायनों का इस्तेमाल नहीं किया जाता, जो पारंपरिक आतिशबाजी में पाए जाते हैं। इनमें बेरियम नाइट्रेट, लिथियम, पारा, आर्सेनिक और कैडमियम शामिल हैं। ये रसायन पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक माने जाते हैं।



ग्रीन पटाखे कितनी मात्रा में छोड़ते है प्रदूषण
Green firecrackers may reduce emissions, but they still release harmful pollutants and are not pollution-free.

उपभोक्ता असली ग्रीन पटाखों की पहचान उनके पैकेट पर लगे CSIR-NEERI और PESO के हरे लोगो से कर सकते हैं। इसके अलावा, पैकेट पर एक विशेष एन्क्रिप्टेड QR कोड भी दिया जाता है। इसके जरिए पटाखों की प्रामाणिकता की जांच की जा सकती है।



सामान्य पटाखे कितना फैलाते हैं प्रदूषण?

पारंपरिक पटाखों से निकलने वाले PM2.5 कणों की मात्रा चौंकाने वाली है। अलग-अलग पटाखों को फोड़ने के बाद एक से छह फीट के दायरे में किए गए माप में प्रदूषण का स्तर काफी अधिक पाया गया।



आंकड़ों के मुताबिक, सांप गोली (स्नेक टैबलेट) से PM2.5 का स्तर 64,500 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया। एक हजार पटाखों वाली लड़ियों से यह स्तर 38,450 माइक्रोग्राम, पुलपुल से 28,950 माइक्रोग्राम, फुलझड़ी से 10,390 माइक्रोग्राम, चकरी से 9,490 माइक्रोग्राम और अनार से 4,860 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंचा।



ये आंकड़े बताते हैं कि आतिशबाजी के दौरान आसपास की हवा में प्रदूषण की मात्रा कितनी तेजी से बढ़ सकती है।




प्रतिबंध के बावजूद नहीं सुधरी दिल्ली की हवा

दिल्ली में पटाखों पर प्रतिबंध और उनके इस्तेमाल को लेकर कई वर्षों से अलग-अलग प्रयोग किए जा रहे हैं। इसके बावजूद दीपावली के आसपास प्रदूषण का स्तर चिंता का विषय बना हुआ है।



वर्ष 2015 में पटाखों पर प्रतिबंध नहीं था। 10, 11 और 12 नवंबर को प्रदूषण के आंकड़े क्रमशः 353, 343 और 360 दर्ज किए गए। वर्ष 2016 में भी प्रतिबंध नहीं था और 29, 30 तथा 31 अक्टूबर को ये आंकड़े 404, 431 और 445 तक पहुंच गए।



वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई। इसके बावजूद संबंधित दिनों में प्रदूषण के आंकड़े 302 से 403 के बीच रहे।



वर्ष 2018 में देशभर में सामान्य पटाखों पर प्रतिबंध लगाते हुए केवल ग्रीन पटाखों की अनुमति दी गई। इसके बाद भी 6, 7 और 8 नवंबर को प्रदूषण के आंकड़े क्रमशः 338, 281 और 390 दर्ज किए गए।



वर्ष 2019 में दिल्ली में रात 8 से 10 बजे तक केवल ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति थी। इसके बावजूद प्रदूषण के आंकड़े 287, 337 और 368 रहे।



वर्ष 2020 से 2024 तक दिल्ली और एनसीआर में अलग-अलग वर्षों में सभी प्रकार के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया। लेकिन इन प्रतिबंधों का व्यापक उल्लंघन हुआ।



वर्ष 2020 में प्रदूषण के आंकड़े 339 से 435 तक पहुंचे। वर्ष 2021 में यह 314 से बढ़कर 462 तक पहुंच गए। वर्ष 2022 में आंकड़े 259 से 312 के बीच रहे। वर्ष 2023 में 220 से 358 और वर्ष 2024 में 307 से 339 के बीच प्रदूषण दर्ज किया गया।



वर्ष 2025 में केवल ग्रीन पटाखे जलाने की अनुमति दी गई थी। इनके लिए सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे का समय निर्धारित किया गया था। हालांकि, इन प्रतिबंधों का भी व्यापक उल्लंघन हुआ। 19, 20 और 21 अक्टूबर को प्रदूषण के आंकड़े क्रमशः 296, 345 और 351 दर्ज किए गए।




कम प्रदूषण का मतलब प्रदूषण मुक्त नहीं

ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम हानिकारक उत्सर्जन करते हैं। इनके निर्माण में खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल भी कम किया गया है। लेकिन इनसे निकलने वाले अल्ट्राफाइन कण और अन्य प्रदूषक तत्व बताते हैं कि इन्हें पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता।



इसलिए ग्रीन पटाखों को प्रदूषण का स्थायी समाधान मानने के बजाय सामान्य पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने वाला विकल्प समझना अधिक उचित होगा। साफ हवा के लिए केवल पटाखों के प्रकार में बदलाव ही नहीं, बल्कि आतिशबाजी के इस्तेमाल में कमी भी जरूरी है।

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