जीडीपी ग्रोथ विवाद: किस रफ्तार से दौड़ रहा देश? जानें GDP 7.8 % या 2.6 %

CHAKRESH | Sept 04, 2026, 17:26 IST
india gdp growth controversy issue
सरकारी आंकड़ों में भारत की जीडीपी 7.8% बढ़ी है, पर पूर्व वित्त सचिव ने इसे 2.6% बताया। एक ही अर्थव्यवस्था के दो अलग आंकड़े कैसे संभव हैं? thesootr Prime पर समझिए पूरा गणित।

भारत की अर्थव्यवस्था या कहें GDP 7.8% की रफ्तार से बढ़ी है। कम से कम सरकारी आंकड़े तो यही कहते हैं। लेकिन एक पूर्व वित्त सचिव ने इसी हफ्ते एक कैलकुलेशन शेयर किया। उनका दावा है कि असली ग्रोथ सिर्फ 2.6% है। यह फर्क इतना बड़ा है कि सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। विपक्ष को मुद्दा मिल गया है और सरकार बचाव में है।



सवाल यह है, दोनों आंकड़े एक ही अर्थव्यवस्था के बारे में कैसे हो सकते हैं? तो thesootr Prime में आज इसे समझने की कोशिश करते हैं।



समझें क्या है मामला

31 अगस्त 2026 को सांख्यिकी मंत्रालय ने Q1 FY27 यानी अप्रैल-जून 2026 का जीडीपी डेटा जारी किया। आंकड़ा था 7.8% रियल ग्रोथ का, जिस पर सरकार की ओर से खुशियां मनाने जैसा माहौल बनाया गया, लेकिन… पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इस डेटा पर सवाल उठाकर सनसनी पैदा कर दी। उनका कहना है कि असली ग्रोथ तो 2.6% के आसपास ही है। कांग्रेस नेताओं ने तुरंत इस दावे को लपक लिया। सरकार ने गर्ग की गणना को गलत बताया।



यह आपसे क्यों जुड़ा है

जीडीपी सिर्फ एक नंबर नहीं है। यह तय करता है कि देश में नौकरियां कितनी बनेंगी? महंगाई कितनी बढ़ेगी? और सरकार टैक्स कितना वसूलेगी। अगर असली ग्रोथ 2.6% है तो नौकरियों का संकट और गहरा सकता है। और अगर 7.8% सही है तो अर्थव्यवस्था मजबूत दिशा में है। यही वजह है कि यह बहस सिर्फ नेताओं की नहीं, आपकी जेब से भी जुड़ी हुई है।



पहले क्या था

दरअसल भारत में जीडीपी नापने का एक आधार वर्ष होता है। पिछला आधार वर्ष 2011-12 था। इस साल सरकार ने आधार वर्ष बदलकर 2022-23 कर दिया और नए डेटा सोर्स भी जोड़े, जिनमें प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स और बैंकिंग सर्विस प्राइस इंडेक्स शामिल हैं। ऐसा दस साल में एक बार होता है ताकि अर्थव्यवस्था की नई तस्वीर पकड़ी जा सके।



( प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स बैंकिंग सर्विस प्राइस इंडेक्स नीचे दिए गए लिंक्स पर जाकर आसानी से समझ सकते हैं। )



तो इस बदलाव के साथ पुराने आंकड़े भी दोबारा कैलकुलेट हुए। नतीजा यह हुआ कि पुरानी तिमाहियों के नंबर भी बदल गए।



चलिए जीडीपी विवाद को सीधी भाषा में समझते हैं।

सरकार हर साल जीडीपी नापती है। इस बार उसने नापने का तरीका बदल दिया। जैसे कोई पुराना तराजू हटाकर नया तराजू ले आए। नए तराजू से नापोगे तो नंबर भी बदलेंगे, यह तो होना ही था।



अब असली उलझन यहां से शुरू होती है। पिछले साल की कमाई पुराने तराजू से नापी गई थी, जो थी 86.05 लाख करोड़ रुपए। नए तराजू से वही पिछले साल की कमाई नापी गई तो निकली सिर्फ 80 लाख करोड़ रुपए। और इस साल की कमाई नए तराजू से है, 88.27 लाख करोड़ रुपए निकली।



तो पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग साहब ने क्या किया? उन्होंने पुराने तराजू वाला पिछले साल का नंबर उठाया और नए तराजू वाला इस साल का नंबर उठाया। दोनों को आपस में बांट दिया। नतीजा आया 2.6%।



पर सोचिए, यह तो वैसा ही हुआ जैसे आप पुराने रेट पर सब्जी का दाम याद रखें, और आज नई दुकान के रेट से मिलाकर हिसाब लगाने बैठ जाएं। हिसाब तो गड़बड़ ही आएगा।



GDP


सही तरीका क्या है? दोनों साल का नंबर एक ही तराजू से नापो। नए तराजू से पिछला साल था 80 लाख करोड़ रुपए। इस साल है 88.27 लाख करोड़ रुपए। अब बांटो तो नंबर आता है 10.3%। महंगाई घटाने के बाद असली ग्रोथ बचती है 7.8%।



यानी विवाद की जड़ यही है, गर्ग ने दो अलग-अलग तराजू के नंबर मिला दिए।



एक और दिलचस्प बात। इसी नए तराजू से जब पुराने सालों को दोबारा नापा गया, तो FY23-24 का नंबर 9.2% से घटकर 7.2% हो गया। पर FY24-25 का नंबर 6.5% से बढ़कर 7.1% हो गया।



सोचिए, अगर सरकार सिर्फ इस साल का नंबर बढ़ाना चाहती, तो पुराने सालों का नंबर हमेशा नीचे ही दिखता। यहां तो एक साल नीचे गया, एक साल ऊपर।



इसे अपनी सैलरी से समझिए। पांच साल पहले आपने महंगाई का हिसाब पुराने तरीके से लगाया था। अब नए तरीके में मोबाइल डेटा, ओटीटी और कैब जैसे खर्चे भी जुड़ गए हैं। तो हिसाब बदलेगा ही। इसमें किसी की चालाकी नहीं, बस नापने का तरीका अपडेट हुआ है।



अब इसी बात को थोड़ा तकनीकी अंदाज में समझें

पुरानी सीरीज में पिछले साल यानी Q1 FY26 का नॉमिनल जीडीपी करीब 86.05 लाख करोड़ रुपए दिखाया गया था। नई सीरीज में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नॉमिनल जीडीपी 80 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 88.27 लाख करोड़ रुपए हो गया, जबकि रियल जीडीपी 75.46 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 81.36 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया, जिससे 7.8% की आधिकारिक ग्रोथ दर निकली।



गर्ग ने यहीं पर सवाल खड़ा किया है। उनकी दलील है कि पिछले साल के आंकड़े में भारी कटौती की वजह से इस साल की ग्रोथ एक छोटे आधार के मुकाबले नापी जा रही है। असल में यह ग्रोथ सिर्फ 2.6% के करीब बैठती है।



लेकिन असल बात यह है कि दो अलग सीरीज के नंबर आपस में तुलना नहीं किए जा सकते। यह वैसा ही है जैसे एक पुराने नक्शे और नए नक्शे को मिलाकर दूरी नाप ली जाए। दोनों नक्शों का स्केल अलग है।



सरकार और कई फैक्ट-चेकरों ने कहा कि गर्ग का 86.05 लाख करोड़ रुपए वाला आंकड़ा पुरानी 2011-12 आधार वाली सीरीज से है, जबकि 88.27 लाख करोड़ रुपए नई 2022-23 आधार वाली सीरीज से है। दोनों को मिलाकर निकाला गया 2.6% का नंबर न तो सही नॉमिनल ग्रोथ है, न रियल ग्रोथ। सीधे शब्दों में कहें तो यह गणित ही गलत सीरीज से बना है।



तो फिर सही तुलना क्या है? दोनों साल के आंकड़े एक ही सीरीज से लो। नई सीरीज के मुताबिक पिछले साल का नॉमिनल जीडीपी 80 लाख करोड़ रुपए था। इस साल यह 88.27 लाख करोड़ रुपए है। यहां से नॉमिनल ग्रोथ निकलती है 10.3%। और महंगाई घटाने के बाद रियल ग्रोथ बैठती है 7.8%।



पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् टी.सी.ए. अनंत ने सरकार की कवायद का बचाव किया है। उन्होंने कहा कि आधार वर्ष बदलने की यह कवायद एक बहुत अच्छा प्रयास रही है जिसमें कई तरह के डेटा सोर्स इस्तेमाल हुए, और इसका तरीका काफी मजबूत है।



इस बहस में एक और पहलू जुड़ता है, सेक्टर वाइज तस्वीर। नई सीरीज के मुताबिक FY23-24 की ग्रोथ पहले 9.2% आंकी गई थी, अब घटकर 7.2% रह गई है। वहीं FY24-25 की ग्रोथ पहले 6.5% थी, अब बढ़कर 7.1% हो गई है। यानी बदलाव सिर्फ इस साल तक सीमित नहीं, बीते सालों के आंकड़े भी ऊपर-नीचे हुए हैं।



अगर सरकार सिर्फ मौजूदा साल का नंबर बढ़ाना चाहती तो पुराने सालों की ग्रोथ भी हमेशा नीचे ही दिखती। लेकिन FY24-25 में ग्रोथ नीचे नहीं, ऊपर गई। यह पैटर्न किसी एकतरफा हेराफेरी की थ्योरी को कमजोर करता है।



मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन भी पहले इस तरह के बदलाव को डिफेंड कर चुके हैं। उनका कहना रहा है कि जीडीपी के आंकड़े ओवर एस्टिमेट नहीं हैं और आलोचना अक्सर बिना गहरी पड़ताल के शक पैदा करने के लिए की जाती है।



इसे एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए आपने पांच साल पहले अपनी सैलरी का हिसाब पुराने महंगाई इंडेक्स से लगाया था। अब नया इंडेक्स आया, जिसमें ज्यादा खर्चे जुड़े हैं। जैसे मोबाइल डेटा, ओटीटी सब्सक्रिप्शन और कैब राइड्स। नए इंडेक्स से आपकी असली सैलरी ग्रोथ अलग दिखेगी। कोई हेराफेरी नहीं, बस नापने का तरीका बदल गया।



जीडीपी नापने का नया और पुराना तरीका क्या है

भारत जीडीपी नापने का तरीका हर दस-ग्यारह साल में अपडेट करता है, ताकि अर्थव्यवस्था की सही तस्वीर मिल सके।


2011-12 वाले पुराने तरीके में ज्यादातर बड़ी कंपनियों का डेटा इस्तेमाल होता था। छोटे और असंगठित कारोबार, जैसे रेहड़ी-पटरी वाले, छोटी दुकानें, इनका कोई पक्का डेटा नहीं था, सिर्फ अंदाजा लगाया जाता था। कीमतों का हिसाब भी पुरानी लिस्ट से होता था।



GDP CALCULATION NEW Vs OLD WAY


2022-23 वाला नया तरीका इस कमी को दूर करता है। अब छोटे कारोबार का सीधा सर्वे होता है। हर महीने के GST डेटा को भी शामिल किया गया है, जिससे रियल टाइम तस्वीर मिलती है। कीमतों की नई लिस्ट भी बनाई गई है, जो आज के खर्चों को बेहतर पकड़ती है।


एक लाइन में कहें तो, पुराना तरीका अंदाजे पर टिका था, नया तरीका असली सर्वे और डिजिटल डेटा पर टिका है। यही वजह है कि सरकार इसे ज्यादा भरोसेमंद बता रही है।



कौन-कौन शामिल है

इस विवाद में तीन मुख्य पक्ष हैं। पहला, सुभाष चंद्र गर्ग, जो खुद पूर्व वित्त सचिव रह चुके हैं और उनके सवाल को टेक्निकल भरोसे के साथ देखा जाता है।



दूसरा, सांख्यिकी मंत्रालय, जिसने नई सीरीज बनाई और इसे डिफेंड कर रहा है।



तीसरा, कांग्रेस पार्टी, जिसने सुभाष चंद्र गर्ग के दावे को सरकार पर हमले का हथियार बना लिया है।



दोनों पक्षों की बात

गर्ग का आरोप है कि सरकार ने आधार वर्ष का डेटा घटाकर ग्रोथ को कृत्रिम रूप से ज्यादा दिखाया है। कांग्रेस नेताओं ने भी सोशल मीडिया पर इसी दावे को शेयर करते हुए सरकार पर आंकड़ों में हेरफेर का आरोप लगाया। यह आरोप है, कोई साबित तथ्य नहीं।



दूसरी तरफ सांख्यिकी मंत्रालय और कई स्वतंत्र फैक्ट-चेकरों का कहना है कि यह पूरा विवाद ही गलत तुलना पर टिका है। उनके मुताबिक आधार वर्ष बदलना कोई नई या असामान्य बात नहीं है।



पिछली बार भी 2015 में यही हुआ था, जब आधार वर्ष 2011-12 किया गया था। सोचिए एक बार। अगर हर दस साल में आधार वर्ष बदलना जरूरी प्रक्रिया है, तो क्या हर बार इसे साजिश कहा जाएगा?



तीसरा नजरिया, मेथडोलॉजी पर सवाल

जीडीपी विवाद में एक तीसरा एंगल भी है, जो सीधे राजनीतिक नहीं है। पूर्व JNU प्रोफेसर डॉ. अरुण कुमार लंबे समय से भारत की जीडीपी मापने की मेथोडोलॉजी पर सवाल उठाते रहे हैं।



उनका तर्क है कि क्वार्टरली जीडीपी असल डेटा पर नहीं, बल्कि पिछले पूरे साल के आंकड़ों से प्रोजेक्ट करके निकाली जाती है। अगर पिछला साल अच्छा रहा हो तो मौजूदा तिमाही भी अच्छी दिख सकती है, भले हालात कुछ और हों।



इस साल अप्रैल-जून के दौरान पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से एनर्जी और फर्टिलाइजर सप्लाई पर असर पड़ा था, यह तथ्य वेरिफाई हो चुका है। डॉ. कुमार का कहना है कि इस दबाव का असर जीडीपी के आंकड़ों में ठीक से नहीं झलकता, क्योंकि भारत में 94% वर्कफोर्स असंगठित क्षेत्र में काम करता है, जबकि प्रोजेक्शन के लिए इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर इंडिकेटर, जैसे फोर-व्हीलर सेल्स और GST कलेक्शन, मुख्यतः संगठित क्षेत्र को दिखाते हैं।



एक तथ्य उनके तर्क को कुछ वजन देता है। IMF ने भारत के नेशनल अकाउंट्स डेटा को लगातार दूसरे साल "C ग्रेड" दिया है, यानी ऐसी कमियां जो आर्थिक निगरानी को मुश्किल बनाती हैं।



लेकिन डॉ. कुमार का यह निजी आकलन कि असली ग्रोथ 2 से 3% के बीच रह गई, या अर्थव्यवस्था इस तिमाही में सिकुड़ भी सकती थी, यह उनका अपना अनुमान है। कोई आधिकारिक या स्वतंत्र रूप से वेरिफाइड आंकड़ा इसकी पुष्टि नहीं करता।



आगे क्या होगा

सांख्यिकी मंत्रालय दिसंबर 2026 तक पुराने वर्षों का पूरा बैक-सीरीज डेटा जारी करने वाला है। इससे लंबी अवधि की तुलना आसान होगी। तब तक यह बहस राजनीतिक मंचों पर चलती रहेगी। संसद के अगले सत्र में भी यह मुद्दा उठ सकता है।



लेकिन सवाल यह है, क्या आम आदमी को इस राजनीतिक टकराव से कुछ मिलेगा? शायद नहीं, सीधे तौर पर नहीं। पर अगर यह बहस सांख्यिकी विभाग को अपने डेटा जारी करने का तरीका और पारदर्शी बनाने पर मजबूर करती है, तो यह फायदे की बात होगी।


निवेशकों और अर्थशास्त्रियों की नजर अब अगली तिमाही के आंकड़ों पर टिकी है। अगर Q2 FY27 में भी ग्रोथ मजबूत रहती है, तो गर्ग के दावे पर दबाव और बढ़ेगा। अगर ग्रोथ अचानक गिरती है, तो सवाल फिर उठेंगे।



डॉ. कुमार जैसे अर्थशास्त्री मेथोडोलॉजी में बदलाव की मांग भी कर रहे हैं। जैसे MSME को माइक्रो, स्मॉल और मीडियम में अलग- अलग मापना और असंगठित क्षेत्र के डेटा को बेहतर तरीके से शामिल करना। यह बहस सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि आने वाले सालों में जीडीपी नापने के तरीके की भी है।



एक बात जो आप नहीं जानते थे

ज्यादातर लोगों को नहीं पता कि जीडीपी का आधार वर्ष बदलना दुनियाभर में एक सामान्य प्रक्रिया है। अमेरिका, ब्रिटेन और चीन भी समय-समय पर अपना आधार वर्ष अपडेट करते हैं। भारत में पिछली बार यह 2015 में हुआ था, यानी करीब ग्यारह साल बाद अब दोबारा हुआ।



FAQ

  1. जीडीपी ग्रोथ 7.8% है या 2.6%?
    सरकारी और आधिकारिक आंकड़ा 7.8% रियल ग्रोथ है। 2.6% वाला दावा पुरानी और नई सीरीज को मिलाकर निकाला गया है, जिसे सांख्यिकी मंत्रालय और फैक्ट-चेकरों ने गलत तुलना बताया है।
  2. आधार वर्ष क्यों बदला गया?
    आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया गया है ताकि अर्थव्यवस्था की मौजूदा संरचना, जैसे डिजिटल सेवाएं और नई खपत के पैटर्न, बेहतर तरीके से दर्ज हो सकें।
  3. क्या असंगठित क्षेत्र की मंदी जीडीपी में दिखती है?
    अर्थशास्त्री डॉ. अरुण कुमार का तर्क है कि नहीं, क्योंकि GST और फोर-व्हीलर सेल्स जैसे इंडिकेटर मुख्यतः संगठित क्षेत्र को दिखाते हैं। यह एक तर्क है, आधिकारिक रूप से स्वीकृत निष्कर्ष नहीं।

ये भी पढ़ें...



सोना न खरीदें, विदेश में शादी भी न करें, बढ़ती GDP पर पीएम मोदी का बयान



एसबीआई की नई रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, अपराध घटने से बढ़ेगी देश की जीडीपी



भारत की GDP 7.8% पर पहुंची, नॉमिनल GDP 346 लाख करोड़ पार



अब सोना-चांदी नहीं, तांबे के पीछे पागल हो रही दुनिया!



Tags:
  • भारत
  • GST
  • महंगाई
  • सोशल मीडिया
  • JNU
  • जीडीपी
  • पश्चिम एशिया
  • अर्थव्यवस्था