पाक की छटपटाहट और भारत के कड़े तेवर, क्यों आउटडेटेड हो चुका सिंधु जल समझौता?
पिछले कुछ हफ्ते से पाकिस्तान से तीखे और सियासी बयान आ रहे हैं। वजह? भारत का वो फैसला, जिसमें पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को होल्ड पर रख दिया गया है।
पाकिस्तान इस कदर छटपटाया हुआ है कि उसने पिछले महीने इस पर एक कॉन्फ्रेंस तक बुला डाली। वहां उनके मंत्रियों और नेताओं ने खुलेआम धमकियां दे डालीं कि अगर नदियों का पानी रुका तो परिणाम भुगतने होंगे।
रोचक बात यह है कि भारत पहले ही इस समझौते में सुधार करने और दोबारा बातचीत करने के लिए पाकिस्तान को दो बार ऑफिशियल नोटिस भेज चुका है। लेकिन, पाकिस्तान सांप सूंघने की तरह चुप बैठा है। उसने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है।
समझौते में संशोधन की मांग अनोखी नहीं
आतंकवाद की वजह से भारत ने भले ही इस समझौते को होल्ड पर रखकर कड़ा कदम उठाया हो, लेकिन इस समझौते में संशोधन या इसके पुनर्गठन की मांग कोई अनोखी बात नहीं है।
दुनिया भर में नदियों के पानी को बांटने वाली तमाम व्यवस्थाओं में यह बेहद सामान्य है। वहां समय-समय पर समीक्षा करने के रास्ते पहले से खुले रखे जाते हैं।
खुद पाकिस्तान के भूजल वैज्ञानिक और विशेषज्ञ सालों से कह रहे हैं कि इस समझौते को अपडेट करने की सख्त जरूरत है। यह मांग तो 2016 के उरी हमले से भी बहुत पहले की है, जिसने मौजूदा गतिरोध की असल नींव रखी थी।
अंतर बस इतना है कि पहली बार दोनों देशों में से कम से कम भारत ने इस बदलाव के लिए आधिकारिक कदम आगे बढ़ाया है।
नदियां होती हैं गतिशील इकाइयां
जैसे-जैसे पानी का बहाव बदलता है। इंसानों की जरूरतें और आबादी घटती-बढ़ती है। जल प्रबंधन की नई तकनीकें आती हैं, वैसे-वैसे पानी के नियम भी बदलने चाहिए।
2013 के एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया की 113 नदी प्रणालियों को संभालने के लिए करीब 250 जल-साझाकरण समझौते वजूद में आए। समय के साथ इन समझौतों में नए प्रोटोकॉल, संशोधन और डेटा साझा करने के नए नियम जुड़ते गए। इससे इनकी कुल संख्या 688 तक पहुंच गई।
अमेरिका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी का डेटाबेस बताता है कि आज यह संख्या 800 को पार कर चुकी है। यह सबूत है कि दुनिया बदलती जमीनी हकीकत के साथ अपने समझौतों को लगातार अपडेट कर रही है।
खुद भारत का बांग्लादेश के साथ 1996 का गंगा जल समझौता 30 साल की मियाद के साथ बना था। इसका इसी साल नवीनीकरण होना तय है।
समझौते के भीतर छुपा बदलाव का रास्ता
लोग समझते हैं कि सिंधु जल समझौता हमेशा के लिए है, लेकिन ऐसा नहीं है। इस समझौते की किताब में खुद दो ऐसे रास्ते (Article VII और XII) दिए गए हैं।
इनके जरिए दोनों देश मिलकर नए प्रोजेक्ट बना सकते हैं या आपसी सहमति से नियमों को बदल सकते हैं। भारत ने इसी नियम का इस्तेमाल कर पाकिस्तान को नोटिस थमाया है।
अनुच्छेद VII (Article VII): यह दोनों देशों के स्थायी सिंधु आयोगों (PIC) को आपसी सहमति से नए इंजीनियरिंग कार्य या जल निकासी की योजनाएं शुरू करने की आजादी देता है।
अनुच्छेद XII (Article XII): यह साफ कहता है कि दोनों देश मिलकर समय-समय पर इस समझौते के प्रावधानों में संशोधन कर सकते हैं।
अगर हम दक्षिण-पूर्व एशिया की मेकांग नदी के 1995 के समझौते को देखें तो वह बेहद लचीला और आधुनिक है। हमारा सिंधु आयोग (PIC) सिर्फ एक चौकीदार जैसा काम करता है।
वह यह देखता है कि नियमों का उल्लंघन न हो। इसके विपरीत मेकांग नदी आयोग पूरे बेसिन का मिलकर प्रबंधन करता है। रणनीतियां बनाता है और पानी की गुणवत्ता तय करता है।
पुराना पड़ चुका समझौता
यह समझौता 1960 में हुआ था। यह उस समय की परिस्थितियों के अनुरूप था। इसलिए आज के दौर की कई बड़ी जरूरतें इसमें नहीं हैं:
ग्लोबल वॉर्मिंग का ज़िक्र नहीं: 1990 से पहले के किसी कानून में जलवायु परिवर्तन की बात नहीं थी, इसमें भी नहीं है।
भूजल पर सन्नाटा: ज़मीन के नीचे का पानी भी सीमाओं के पार जुड़ा है। लेकिन समझौते में इसका कोई नियम नहीं है।
पानी की क्वालिटी की अनदेखी: नदियों के स्वास्थ्य और पानी की शुद्धता को लेकर कोई नियम नहीं।
बंटवारा नहीं, विभाजन का सौदा
सिंधु जल समझौते की सबसे बड़ी खामी इसका बुनियादी नजरिया है। दुनिया के बाकी समझौते पानी के प्रतिशत या हिस्सेदारी को तय करते हैं।
यह समझौता नदियों के विभाजन पर टिका है। यही वजह है कि दोनों देश कभी मिलकर किसी प्रोजेक्ट पर काम नहीं कर पाए।
इसीलिए इसे साझाकरण व्यवस्था नहीं, बल्कि एक विभाजन समझौता कहा जाता है। इसी बंटवारे ने दोनों देशों को कभी एक संयुक्त नदी बेसिन कार्यक्रम बनाने ही नहीं दिया।
सिंधु जल समझौते में बदलाव की जरूरत
इस समझौते में नए सिरे से बातचीत करने की बात व्यावहारिक भी है और जरूरी भी। हाल ही में आईआईटी गांधीनगर के भारतीय शोधकर्ताओं विमल मिश्रा और उरमिन वेगड़ की स्टडी आई है।
इसमें यह दिखाया है कि कैसे जलवायु परिवर्तन सिंधु बेसिन में पानी की उपलब्धता पर अलग-अलग तरह से असर डाल रहा है।
उदाहरण के लिए पूर्वी नदियों के बेसिन में 70 साल में सालाना बारिश में 20 प्रतिशत की कमी देखी गई है, जबकि पश्चिमी नदियों के बेसिन में होने वाली बारिश में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है।
विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा स्थिति में यह समझौता सिंधु नदी के पानी के बेहद अप्रभावी और बेअसर इस्तेमाल की वजह बन रहा है। साथ ही यह समय के साथ बदलती जरूरतों और मांगों से पूरी तरह बेखबर है।
समझौते पर दोबारा बातचीत करने की भारत की मांग को ठंडे बस्ते में डालने के बजाय उसके फैसले से अलग करके देखा जाना चाहिए। यही पाकिस्तान के लिए सबसे भरोसेमंद रास्ता हो सकता है, जिससे वह यह पक्का कर सके कि इस समझौते को आगे और रोक कर न रखा जाए।
FAQ
- सिंधु जल समझौता कब और किनके बीच हुआ था?
सिंधु जल समझौता 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ था। यह समझौता पूर्वी (सतलज, ब्यास, रावी) और पश्चिमी (सिंधु, जेहलम, चिनाब) नदियों का पानी बांटता है, जिसमें पूर्वी नदियों का पानी भारत को और पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान को मिलता है। - भारत ने सिंधु जल समझौते पर पुनर्विचार की मांग क्यों की है?
भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सुरक्षा चिंताओं और बदलती जरूरतों के चलते समझौते को स्थगित कर पुनर्विचार की मांग की है। इसके अलावा, 1960 का यह समझौता जलवायु परिवर्तन, भूजल, पानी की गुणवत्ता और बदलती जनसंख्या जैसे आधुनिक मुद्दों पर पूरी तरह से खामोश है। - सिंधु जल समझौते में बदलाव के लिए क्या कानूनी रास्ते हैं?
समझौते में ही अनुच्छेद VII और XII दिए गए हैं, जो दोनों देशों को आपसी सहमति से नए प्रोजेक्ट बनाने और समझौते में संशोधन करने की अनुमति देते हैं। भारत ने इन्हीं प्रावधानों का हवाला देते हुए पाकिस्तान को आधिकारिक नोटिस भेजा है।
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