प्यार, राशियां और डिजिटल दौर का अकेलापन, क्यों फिर ज्योतिष में साथी तलाश रही है नई पीढ़ी?

Rajesh Lahoti | May 27, 2026, 17:21 IST
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भारत में आधुनिक रिश्तों और डिजिटल डेटिंग के दौर में राशियों और ज्योतिष की वापसी तेजी से बढ़ रही है। कभी पुरानी सोच मानी जाने वाली कुंडली और राशियां अब इंस्टाग्राम, डेटिंग ऐप्स और सोशल मीडिया संस्कृति का हिस्सा बन चुकी हैं।

भारत में एक समय ऐसा था जब ज्योतिष सिर्फ घर के बुजुर्गों की दुनिया माना जाता था। शादी तय होने से पहले पंडित के पास कुंडली जाती थी। ग्रह-नक्षत्र देखे जाते थे। गुण मिलाए जाते थे और फिर तय होता था कि रिश्ता आगे बढ़ेगा या नहीं। लड़का-लड़की कई बार एक-दूसरे को ठीक से जानते भी नहीं थे, लेकिन परिवारों को भरोसा रहता था कि अगर सितारे साथ हैं, तो शादी भी चल जाएगी। उस दौर में प्यार से ज्यादा विश्वास ग्रहों की चाल पर था। फिर धीरे-धीरे समय बदल गया। शहर बड़े हुए। इंटरनेट आया। मोबाइल हाथों में पहुंचा और रिश्तों की परिभाषा भी बदलने लगी। नई पीढ़ी ने कहा कि अब जिंदगी कुंडली से नहीं चलेगी। अब लोग अपने साथी खुद चुनेंगे। भावनाएं, बातचीत, समझ और आकर्षण ही रिश्तों की असली नींव होंगे। ऐसा लगा कि आधुनिकता ने ज्योतिष को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।



सबसे दिलचस्प बात यह हुई कि जिस पीढ़ी ने सबसे ज्यादा आधुनिक होने का दावा किया, वही पीढ़ी धीरे-धीरे फिर से राशियों और सितारों की तरफ लौटने लगी। फर्क सिर्फ इतना था कि अब यह वापसी मंदिरों या पंडितों के जरिए नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन के जरिए हो रही थी। इंस्टाग्राम पर राशियों से जुड़े मजाक वायरल होने लगे। देर रात की बातचीत में लोग पूछने लगे-तुम्हारी राशि क्या है? डेटिंग ऐप्स पर लोग अपनी राशि लिखकर प्रोफाइल बनाने लगे। और धीरे-धीरे प्यार की दुनिया में सितारों की वापसी हो गई। आज की पीढ़ी खुलकर कहती है-वह वृश्चिक राशि का है, इसलिए थोड़ा अधिकार जताता होगा। मैं तुला राशि की हूं, इसलिए मुझे संतुलन पसंद है। मिथुन राशि वालों पर जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए। यह सब कई बार मजाक की तरह शुरू होता है, लेकिन धीरे-धीरे लोगों की सोच का हिस्सा बन जाता है। यानी आधुनिक प्रेम की दुनिया में भी अब ग्रह और राशियां अपनी जगह बना चुके हैं।



जब कुंडली को पुरानी सोच माना जाने लगा था

करीब दो दशक पहले तक शहरी युवाओं में यह धारणा बहुत मजबूत हो गई थी कि कुंडली मिलाना पुरानी पीढ़ी की आदत है। कॉलेजों में दोस्ती हो रही थी। प्रेम विवाह बढ़ रहे थे और लोग अपने फैसले खुद लेने लगे थे। उस दौर में ज्योतिष को कई लोग अंधविश्वास की तरह देखने लगे थे। युवाओं को लगता था कि अगर दो लोग एक-दूसरे को समझते हैं, एक-दूसरे के साथ सहज महसूस करते हैं, तो ग्रहों की क्या जरूरत है। रिश्ते दिल से बनते हैं, सितारों से नहीं, लेकिन धीरे-धीरे यह आत्मविश्वास कमजोर होने लगा। डिजिटल दौर में रिश्ते जितनी तेजी से बनने लगे, उतनी ही तेजी से टूटने भी लगे। लोगों के पास विकल्प बहुत बढ़ गए, लेकिन भरोसा कम होता गया। पहले जहां लोग वर्षों तक एक रिश्ते को निभाने की कोशिश करते थे, वहीं अब कुछ दिनों की बातचीत के बाद ही लोग अचानक गायब हो जाते हैं। नई पीढ़ी ने रिश्तों के लिए कई नए शब्द गढ़ लिए। अचानक बातचीत बंद कर देना। सामने वाले को भ्रम में रखना। सिर्फ समय बिताने के लिए रिश्ते बनाना। यह सब सामान्य होने लगा। यहीं से लोगों के भीतर एक डर पैदा हुआ। उन्हें लगा कि शायद इंसानों को समझना उतना आसान नहीं है जितना उन्होंने सोचा था। और इसी असुरक्षा ने उन्हें फिर से ज्योतिष की तरफ धकेलना शुरू किया।



डेटिंग अनुप्रयोगों में राशियों की वापसी

आज अगर कोई युवा डेटिंग अनुप्रयोग खोलता है, तो वहां सिर्फ तस्वीरें और परिचय नहीं दिखते। अब राशियां भी दिखाई देती हैं। लोग खुलकर अपनी राशि लिखते हैं और कई बार तो अपनी पूरी पहचान उसी से जोड़ लेते हैं। कोई कहता है कि वह कन्या राशि का है इसलिए उसे हर चीज व्यवस्थित पसंद है। कोई खुद को धनु राशि का बताकर कहता है कि उसे आजादी पसंद है। कोई खुद को कर्क राशि का बताकर अपनी भावुकता समझाता है। धीरे-धीरे राशियां बातचीत का हिस्सा बन गईं। पहले लोग पूछते थे-कहां रहते हो? अब कई बार पहला सवाल होता है-तुम्हारी राशि क्या है? यह सिर्फ जिज्ञासा नहीं है। यह सामने वाले को जल्दी समझ लेने की कोशिश भी है। लोग मान लेते हैं कि राशि देखकर इंसान के स्वभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। अगर कोई सिंह राशि का है, तो लोग सोच लेते हैं कि उसे ध्यान आकर्षित करना पसंद होगा। अगर कोई वृश्चिक राशि का है, तो माना जाता है कि वह गहरा और रहस्यमय स्वभाव का होगा। वैज्ञानिक रूप से यह कितना सही है, इस पर बहस हो सकती है। लेकिन सामाजिक व्यवहार में इसका असर साफ दिखाई देने लगा है।



Astrology and the new generation


राशियों को फैशन बना दिया

कुछ साल पहले तक राशिफल अखबार के एक छोटे से कोने में छपता था। लोग उसे मनोरंजन की तरह पढ़ते थे और आगे बढ़ जाते थे। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। सामाजिक माध्यमों ने राशियों को एक नए तरह का फैशन बना दिया है। हर राशि पर मजाक बन रहे हैं। हर राशि के स्वभाव पर वीडियो बन रहे हैं। लोग अपने प्रेम संबंधों को राशियों के आधार पर समझाने लगे हैं। वृश्चिक राशि वाले बहुत अधिकार जताते हैं। तुला राशि वाले जल्दी प्रेम में पड़ जाते हैं। मिथुन राशि वालों का मन जल्दी बदल जाता है। ऐसी बातें अब सामान्य बातचीत का हिस्सा बन चुकी हैं। धीरे-धीरे यह मजाक लोगों की सोच में घुसने लगा। अब कई लोग किसी इंसान को समझने से पहले उसकी राशि देखकर राय बना लेते हैं। यानी ज्योतिष अब सिर्फ धार्मिक विश्वास नहीं रहा। वह आधुनिक सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन गया है। आखिर युवा फिर सितारों में जवाब क्यों ढूंढ रहे हैं? इसका जवाब सिर्फ परंपरा में नहीं, मनोविज्ञान में भी छिपा हुआ है।



आज की पीढ़ी बाहर से जितनी आत्मविश्वासी दिखाई देती है, अंदर से उतनी ही उलझी हुई भी है। उनके पास हजारों विकल्प हैं, लेकिन स्थिरता कम है। वे लगातार लोगों से जुड़े रहते हैं, लेकिन भावनात्मक सुरक्षा कम महसूस करते हैं। ऐसे समय में राशियां उन्हें एक आसान ढांचा देती हैं। उन्हें लगता है कि शायद ग्रहों की भाषा में इंसानों को समझना थोड़ा आसान होगा। अगर कोई व्यक्ति बहुत भावुक निकला, तो लोग कहते हैं-यह उसकी राशि की वजह से है। अगर कोई बहुत गुस्सैल है, तो लोग उसकी राशि को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं। यानी राशियां लोगों को रिश्तों को समझने की एक कहानी देती हैं। दिलचस्प बात यह है कि बहुत से युवा खुद को पूरी तरह ज्योतिष में विश्वास करने वाला नहीं मानते। लेकिन फिर भी वे राशियों को मजेदार फिल्टर की तरह इस्तेमाल करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे बातचीत शुरू करना आसान हो जाता है।



आधुनिक प्रेम और बढ़ती थकान

डिजिटल दौर ने रिश्तों को आसान जरूर बनाया, लेकिन बेहद थका देने वाला भी बना दिया। अब लोग एक अनुप्रयोग पर सैकड़ों लोगों को देख सकते हैं। एक तस्वीर देखकर पसंद या नापसंद तय कर सकते हैं। बातचीत शुरू होती है और कुछ दिनों बाद अचानक खत्म हो जाती है। इस पूरी प्रक्रिया ने रिश्तों को एक तरह का खेल बना दिया है। लोग भावनात्मक रूप से थकने लगे हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं सामने वाला अचानक गायब न हो जाए। कहीं रिश्ता सिर्फ समय बिताने के लिए न हो। ऐसे माहौल में राशियां लोगों को नियंत्रण का एहसास देती हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे पहले से किसी इंसान की राशि जान लेंगे, तो शायद उसके स्वभाव का अंदाजा लगा पाएंगे और गलत रिश्तों से बच सकेंगे। यह पूरी तरह सच हो या नहीं, लेकिन इससे लोगों को मानसिक सुकून जरूर मिलता है।



दूसरा पहलू खतरनाक

ज्योतिष का यह नया चलन जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही खतरनाक भी हो सकता है। कई लोग अब सामने वाले को समझने की बजाय उसकी राशि देखकर राय बनाने लगे हैं। अगर किसी की राशि मिथुन है, तो लोग पहले से सोच लेते हैं कि वह भरोसेमंद नहीं होगा। अगर कोई वृश्चिक राशि का है, तो उसे बहुत ज्यादा जटिल मान लिया जाता है। इससे इंसानों को व्यक्ति की तरह नहीं, बल्कि राशियों की तरह देखा जाने लगता है। यानी जिस चीज को लोग मजाक और मनोरंजन मानकर इस्तेमाल कर रहे हैं, वही धीरे-धीरे रिश्तों में पूर्वाग्रह भी पैदा कर रही है।



यह चलन इतना तेजी से क्यों बढ़ा

भारत में ज्योतिष पहले से सांस्कृतिक रूप से मौजूद था। इसलिए जब सामाजिक माध्यमों ने उसे नया रूप दिया, तो वह बहुत तेजी से लोकप्रिय हो गया। पश्चिमी देशों में राशियों का चलन आधुनिक फैशन की तरह उभरा होगा, लेकिन भारत में इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। यहां लोग पहले से ग्रह, नक्षत्र और कुंडली की भाषा समझते थे। अब बस वही चीज आधुनिक रूप में लौट आई है। पहले परिवार पंडित के पास जाकर कुंडली मिलाते थे। अब युवा अपने मोबाइल पर राशियां देखकर अनुकूलता समझने की कोशिश करते हैं। पहले जन्मपत्री मिलती थी। अब परिचय में राशि लिखी जाती है। यानी परंपरा खत्म नहीं हुई। उसने सिर्फ डिजिटल रूप ले लिया है।



प्यार, अकेलापन और पहचान की तलाश

अगर इस पूरे चलन को गहराई से समझा जाए, तो यह सिर्फ ज्योतिष की कहानी नहीं है। यह आधुनिक समाज के अकेलेपन की कहानी भी है। आज लोग पहले से ज्यादा जुड़े हुए हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से पहले से ज्यादा असुरक्षित भी हैं। उनके पास बातचीत बहुत है, लेकिन भरोसा कम है। विकल्प बहुत हैं, लेकिन स्थिरता कम है। ऐसे समय में राशियां उन्हें एक पहचान देती हैं। एक कहानी देती हैं। एक ऐसा ढांचा देती हैं जिसमें वे रिश्तों को समझ सकें। हो सकता है सितारे सचमुच प्यार तय न करते हों, लेकिन वे लोगों को रिश्तों के बारे में सोचने का एक तरीका जरूर दे रहे हैं। आज की पीढ़ी शायद पूरी तरह ज्योतिष पर विश्वास नहीं करती, लेकिन वह उसे नजरअंदाज भी नहीं कर रही। अब राशियां सिर्फ अखबार के राशिफल तक सीमित नहीं हैं। वे प्रेम संबंधों की भाषा बन चुकी हैं। लोग उन्हें धर्म की तरह नहीं, बल्कि व्यक्तित्व समझने के एक तरीके की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। डिजिटल दुनिया में प्यार जितना आधुनिक हुआ है, उतना ही उलझा हुआ भी। शायद इसी उलझन में लोग फिर से सितारों की तरफ देखने लगे हैं। क्योंकि जब रिश्ते समझ नहीं आते, तब इंसान अक्सर आसमान की तरफ देखने लगता है।



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