टाइगर स्कूल: जहां पढ़कर 20 अनाथ बाघ शावक जंगल में लौटे, कई बने राजा
Tiger School: झाड़ी में एक बाघ शावक दुबका बैठा है। कुछ मीटर दूर एक चीतल घास चर रहा है, बेखबर। पीछे छिपे वॉचटावर से वन विभाग के गार्ड दूरबीन से सब देख रहे हैं। कोई हिलता नहीं। कोई आवाज नहीं करता, क्योंकि शावक को कभी पता नहीं चलना चाहिए कि इंसान वहां मौजूद है। दरअसल, मध्यप्रदेश में मां खो चुके बाघ शावकों के लिए गुप्त टाइगर स्कूल चलते हैं।
यह कोई चिड़ियाघर या सफारी नहीं है। कान्हा, बांधवगढ़ और सतपुड़ा में ऐसे बाड़े बनाए गए हैं। यहां शावकों को बिना इंसानी संपर्क के शिकार करना सिखाया जाता है।
पिछले दो दशक में 20 से ज्यादा अनाथ शावक इस तरीके से जंगल में वापस भेजे जा चुके हैं। इनमें से कई ने अपना इलाका बना लिया है और खुद के बच्चे भी पैदा किए हैं।
यह आपसे क्यों जुड़ा है
मध्यप्रदेश देश का सबसे ज्यादा बाघों वाला राज्य है। राज्य में करीब 785 बाघ हैं, जो देश के कुल आंकड़े के पांचवे हिस्से से ज्यादा है। लेकिन यही सफलता अब समस्या बन रही है। जंगल छोटा पड़ रहा है। टेरिटरी के लिए लड़ाई बढ़ रही है। इसका सीधा असर पर्यटन और स्थानीय रोजगार पर पड़ता है। कान्हा, बांधवगढ़ जैसे रिजर्व से जुड़े हजारों परिवारों की रोजी रोटी इसी बाघ अर्थव्यवस्था पर टिकी है।
पहले क्या था
बीस साल पहले तक मध्यप्रदेश वन विभाग के पास एक ही रास्ता था। मां खो चुके शावकों को भोपाल के वन विहार जैसी जगह भेज दिया जाता था। वहां वे जिंदा तो रहते थे, लेकिन हमेशा के लिए पिंजरे के पीछे।
वे कभी जंगली नहीं रह पाते थे। साल 2005 में कान्हा में तीन हफ्ते के तीन शावक मिले। उनकी मां को एक नर बाघ ने मार डाला था। तब वन विभाग ने पहली बार सोचा- क्या इन्हें वापस जंगल में भेजा जा सकता है?
कहां मिलेगा इसका जवाब
जवाब खोजने के लिए 2007-08 में कान्हा के मुक्की रेंज में घोरेला नाम की जगह पर एक खास बाड़ा बनाया गया। करीब 36 हेक्टेयर के इस इलाके में पेड़, घास के मैदान और बहता पानी था। बिल्कुल जंगल जैसा माहौल। 2.5 मीटर ऊंची फेंसिंग, चार वॉचटावर, दो गेट। मकसद एक ही था- शावक को लगे कि वह जंगल में है, किसी बाड़े में नहीं।
यहीं से मामला दिलचस्प होता है। शावकों को खाना देने वाला इंसान उन्हें कभी दिखता ही नहीं। पहले दूध और मांस मिलता है। फिर पूरे शव। फिर जिंदा मुर्गियां, जिनसे शावक पहला शिकार सीखता है। बकरियां ताकत परखती हैं। और आखिरी परीक्षा होती है चीतल और जंगली सुअर के साथ, जहां शावक को असली शिकार करना पड़ता है।
जरूरी नियम- दूरी बनाए रखना
सोचिए एक बार- एक जानवर जिसे कभी पता ही नहीं चला कि उसे इंसान ने पाला, वह खुद को पूरी तरह जंगली मानता है। पूर्व वन अधिकारी पुनीत गोयल के अनुसार सबसे जरूरी नियम है- दूरी बनाए रखना। जिस पल शावक इंसान के आसपास सहज महसूस करने लगता है, उसके जंगल में लौटने की उम्मीद कम होने लगती है।
2007 में इस प्रयोग के पहले नतीजे सामने आए। पन्ना टाइगर रिजर्व में शिकार के कारण बाघ खत्म हो चुके थे। वहां दो पुनर्वासित बाघिनें छोड़ी गईं। दोनों ने अपना इलाका बनाया, बच्चे पैदा किए। यही मॉडल बाद में बांधवगढ़ और सतपुड़ा तक फैलाया गया।
एक और उदाहरण, 2016 में पेंच में एक बाघिन को जहर देकर मार दिया गया था। उसका बचा हुआ शावक कान्हा के इसी बाड़े में पला और बाद में नौरादेही अभयारण्य में छोड़ा गया। आज वहां करीब 20 बाघ हैं, ज्यादातर उसी की संतान। लेकिन हर कोशिश सफल नहीं रही।
सैलानियों को खींचती है बाघों की मौजूदगी
बांधवगढ़ (Tiger Reserve) में एक बार वन कर्मी शावकों के साथ फोटो खिंचवाने लगे थे। परिवार वालों को भी पास आने दिया गया। नतीजा, शावक इंसानों से नहीं डरते थे। वे कभी जंगल में नहीं भेजे जा सके। तमिलनाडु में भी एक ऐसा ही मामला हुआ, जहां वन कर्मियों ने गंदे कपड़े पहने, जानवरों के मुखौटे तक लगाए, फिर भी शावक इंसान को पहचानने लगा।
आखिरकार उसे स्थायी रूप से चिड़ियाघर भेजना पड़ा। दरअसल, मध्यप्रदेश वन विभाग इस पूरे कार्यक्रम की रीढ़ है। कान्हा, बांधवगढ़ और सतपुड़ा के फील्ड स्टाफ रोज की निगरानी करते हैं। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) दिशा-निर्देश तय करती है। स्थानीय पर्यटन व्यवसाय इस पूरे इकोसिस्टम पर निर्भर है, क्योंकि बाघ की मौजूदगी ही सैलानी खींचती है।
दोनों तरफ की बातें
पुनर्वास कार्यक्रम को सफलता की मिसाल माना जाता है और आंकड़े इसका समर्थन भी करते हैं। लेकिन एक सवाल हमेशा बना रहता है- क्या इतने बाघों के लिए जंगल में जगह बची है?
MP, RJ, CG कनेक्शन
यह कहानी सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रही। राजस्थान ने हाल ही में इसी मॉडल पर पहला सफल प्रयोग किया। बूंदी के रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में एक अनाथ शावक को 22 महीने की तैयारी के बाद जंगल में छोड़ा गया। यह राजस्थान के लिए पहली बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
दूसरी तरफ राजस्थान के ही रणथंभौर में तस्वीर उलटी है। पिछले नौ साल में टेरिटरी की लड़ाई में नौ से ज्यादा बाघों की जान जा चुकी है। यानी जहां मध्यप्रदेश का मॉडल कॉपी हो रहा है, वहीं जगह की कमी की वही समस्या राजस्थान में भी सिर उठा रही है।
आगे क्या होगा
कान्हा के एक विशेषज्ञ पैनल की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है। बढ़ती बाघ आबादी, सिकुड़ता जंगल और इंसानी दबाव आने वाले वर्षों में और ज्यादा अनाथ शावक पैदा कर सकते हैं। इसीलिए राज्य अब और रेस्क्यू सेंटर बनाने की तैयारी में है।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
पुनर्वास की सफलता सिर्फ शावक के जंगल में छूटने से नहीं मापी जाती। असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। शावक को इलाका बनाना है, बड़े बाघों से बचना है, लगातार शिकार करना है और आखिर में साथी ढूंढना है। इसी साल फरवरी में नौरादेही में एक पुनर्वासित युवा बाघ मृत मिला था। यानी जंगल में लौटना गारंटी नहीं, बस एक मौका है।
अब आप क्या करें
अगली बार एमपी टाइगर रिजर्व के कान्हा टाइगर रिजर्व या बांधवगढ़ (एमपी टाइगर स्टेट)जाएं तो गाइड से वहां के रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम के बारे में जरूर पूछें। दरअसल, राज्य नए रेस्क्यू सेंटर बनाने की योजना पर काम कर रहा है। यह मुद्दा (कान्हा नेशनल पार्क में टाइगर)जल्द और चर्चा में आएगा।
FAQ
- मध्यप्रदेश में अनाथ बाघ शावकों को कैसे बचाया जाता है?
उन्हें कान्हा, बांधवगढ़ और सतपुड़ा के गुप्त बाड़ों में रखा जाता है। यहां इंसानी संपर्क के बिना उन्हें शिकार करना सिखाया जाता है। - अब तक कितने बाघ शावक जंगल में वापस भेजे गए हैं?
पिछले दो दशक में 20 से ज्यादा शावक रिहा किए गए हैं। इनमें से कई ने अपना इलाका बनाकर बच्चे भी पैदा किए हैं। - मध्यप्रदेश में बाघों की मौत क्यों बढ़ रही है?
मुख्य वजह टेरिटरी की लड़ाई है, क्योंकि बाघों की संख्या जितनी तेजी से बढ़ी है, जंगल उतना नहीं बढ़ा।
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