मलबे में सिमट रहीं नेहरू युगीन इमारतें, आकार ले रहा नया सेंट्रल विस्टा
दिल्ली में मई के महीने में सबसे पहले निर्माण भवन गिराया गया। इसके बाद हथौड़ा चला उद्योग भवन पर। अब बहुत जल्द शास्त्री भवन और कृषि भवन भी अतीत के पन्नों में दफन होने वाले हैं।
इसके साथ ही देश की राजधानी में खड़े नेहरू युग के वे भवन हमेशा के लिए विदा हो जाएंगे, जिन्होंने दशकों तक आज़ाद भारत के बैक-ऑफिस के रूप में काम किया।
इन्हीं दीवारों के पीछे से कई महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्रालयों और हज़ारों कर्मचारियों ने देश की तकदीर लिखी थी। अब ये सब मिलकर एक नए भव्य सेंट्रल विस्टा यानी कर्तव्य भवन के लिए रास्ता साफ कर रहे हैं।
सरकारी दस्तावेज़ और उस दौर की पत्रिकाएं एक बेहद दिलचस्प कहानी बयां करती हैं। यह कहानी है एक नव-स्वतंत्र राष्ट्र की। यह बेहद सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी तेज़ी से फैलती शासन व्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए जुटा था।
लुटियंस की दिल्ली और युद्ध काल की बैरकें
साल 1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, तब केंद्र सरकार मुख्य रूप से नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक से चलती थी। इन्हें हर्बर्ट बेकर और एडविन लुटियंस ने डिजाइन किया था।
'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार जगह की इतनी कमी थी कि इन भव्य ब्लॉकों के पीछे दूसरे विश्व युद्ध के ज़माने की अस्थायी बैरकें बनी हुई थीं। इनमें अफसरों को बैठकर काम करना पड़ता था।
इस सचिवालय को विस्तार देने की बड़ी जिम्मेदारी मिली केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) को। यह उस वक्त निर्माण, आवास और आपूर्ति मंत्रालय के तहत आता था। साल 1952 से 1968 के बीच श्रीधर कृष्ण जोगलेकर सीपीवीडी के चीफ आर्किटेक्ट थे।
वह जीबी देवलीकर के बाद इस पद पर बैठने वाले महज़ दूसरे भारतीय थे। जोगलेकर के इसी कार्यकाल के दौरान इन चारों ऐतिहासिक भवनों का निर्माण पूरा हुआ था।
2015 की किताब 'इंडिया: मॉडर्न आर्किटेक्चर इन हिस्ट्री' में लेखक पीटर स्क्रिवर और अमित श्रीवास्तव लिखते हैं कि आज़ाद भारत के आधुनिक नियोजन में ये आर्किटेक्ट बहुत ताकतवर थे। लेकिन उनकी एक मजबूरी थी- उन्हें हमेशा बजट संभालने वाले इंजीनियरों के के नीचे रहकर काम करना पड़ता था।
वे लिखते हैं, विभाजन के बाद के केंद्र सरकार की हर इमारत और बुनियादी ढांचे को बनाने की जिम्मेदारी सीपीवीडी की ही थी। चूंकि विभाग पर बजट को लेकर बेहद सख्त रहने वाले इंजीनियरों का दबदबा था, इसलिए कुछ नया की उनकी ताकत अक्सर सरकारी ढर्रे की भेंट चढ़ जाती थी।
10 करोड़ का कृषि भवन और 11 फीट की छतें
दिल्ली में जो पहली सरकारी इमारत बनकर तैयार हुई, वह थी कृषि भवन। यहां आज भी कृषि मंत्रालय है। उस दौर की एक मशहूर पत्रिका इंडियन बिल्डर ने मार्च 1957 के अंक में इस प्रोजेक्ट की खूब तारीफ की थी।
मशहूर फोटोग्राफर राम रहमान ने इस पत्रिका की एक दुर्लभ प्रति साझा की। उनके पिता हबीब रहमान 1970 के दशक में सीपीवीडी के चीफ आर्किटेक्ट थे।
इसमें भारत सरकार की इस नई बहुमंजिला इमारत की तस्वीरें थीं। साथ ही उन ठेकेदारों के विज्ञापन भी, जिन्होंने इसे बनाने में पसीना बहाया था।
पत्रिका के मुताबिक 16 जून 1952 को तत्कालीन निर्माण मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह ने इसकी नींव रखी थी। इस पूरे प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 10 करोड़ रुपए थी।
इंडियन बिल्डर ने विशेष रूप से इसके किफायती डिजाइन की चर्चा की थी। पैसे बचाने के लिए मंजिलों की ऊंचाई को घटाकर महज़ 11 फीट कर दिया गया था।
पत्रिका लिखती है, यह कानूनी तौर पर मुमकिन सबसे कम ऊंचाई थी। गलियारों की छतों के ऊपर से एयर कंडीशनिंग की भारी-भरकम डक्ट्स गुजारनी थीं।
पैसों की तंगी का आलम यह था कि उस वक्त सभी लिफ्ट लगाना मुमकिन नहीं था। इसलिए सिर्फ लिफ्ट के लिए खाली शाफ्ट छोड़ दिए गए, ताकि भविष्य में लिफ्ट लगाई जा सकें।
इस इमारत के आर्किटेक्ट बीएस गोडबोले थे और चीफ आर्किटेक्ट जोगलेकर। इसके ठीक बाद 1957 में उद्योग भवन बनकर तैयार हुआ, जिसे आरआई गहलोत ने डिजाइन किया था।
जब लुटियंस के विज़न के लिए अड़ गए अधिकारी
असली ड्रामा तब शुरू हुआ जब 1, राजेंद्र प्रसाद रोड पर एक और बहुमंजिला इमारत बनाने का प्रस्ताव आया। इसे लेकर सरकार और योजनाकारों के बीच एक बड़ी बहस छिड़ गई।
राष्ट्रीय अभिलेखागार की फाइलें बताती हैं कि सीपीवीडी ने यह प्रस्ताव 1957 में ही बना लिया था, लेकिन कैबिनेट ने इसे 1960 तक लटकाए रखा।
वजह यह थी कि टाउन प्लानिंग ऑर्गनाइजेशन चाहता था कि विजय चौक के खुले मैदान के चारों तरफ 20 मंजिला गगनचुंबी ऑफिस टावर खड़े कर दिए जाएं। लेकिन सीपीवीडी इसके सख्त खिलाफ था।
11 अप्रैल 1960 को सीपीवीडी के चीफ इंजीनियर के कमरे में एक बैठक हुई। चीफ आर्किटेक्ट जोगलेकर ने टीपीओ की इस सिफारिश को सिरे से खारिज कर दिया। उनका तर्क था कि यह लुटियंस के मूल विज़न का अपमान होगा।
बैठक के मिनट्स में दर्ज है, जोगलेकर ने दोटूक कहा कि सेंट्रल विस्टा में प्रस्तावित ये नई ऊंची इमारतें नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के भव्य और शानदार नजारे को पूरी तरह बर्बाद कर देंगी।
ये मिस्टर लुटियंस की मूल परिकल्पना के बिल्कुल खिलाफ हैं। इसलिए यह तय किया कि खूबसूरती और उपयोगिता के लिहाज से सेंट्रल विस्टा की सीमाओं के बाहर किसी भी नए निर्माण की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।
नेहरू कैबिनेट का फैसला: हम खर्च नहीं उठा सकते
आखिरकार, 22 दिसंबर 1960 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक हुई। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी- पैसा और देश की जनता को जाने वाला संदेश।
सचिव टी. शिवशंकर द्वारा तैयार किए गए कैबिनेट नोट में लिखा था, 6 मंजिल से ऊंची इमारतों के लिए प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट, स्टील फ्रेम, हाई-स्पीड लिफ्ट और एस्केलेटर की जरूरत होगी। इन सबके लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा चाहिए। इसे सरकार फिलहाल वहन नहीं कर सकती।
इसके अलावा, दिल्ली के जमीनी पानी के स्तर को देखते हुए भी 6 मंजिल से ऊंची इमारतें बनाना सुरक्षित नहीं है। एक नैतिक दुविधा भी थी। देश नया-नया आज़ाद हुआ था और गरीबी से जूझ रहा था।
नोट में आगे लिखा था, भले ही सीपीवीडी ने अब तक केवल छह मंजिला और बेहद किफायती इमारतें बनाई हैं, फिर भी संसद में सरकार पर फिजूलखर्ची करने के आरोप लगते रहे हैं।
अगर हम टीपीओ के कहने पर गगनचुंबी इमारतें बनाने लगे, तो जनता के इस आरोप का जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।
नेहरू, गृह मंत्री जीबी पंत, वित्त मंत्री मोरारजी देसाई, श्रम मंत्री गुलजारीलाल नंदा और वाणिज्य मंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौजूदगी में कैबिनेट ने सीपीवीडी की बात मान ली।
तय हुआ कि इमारतें आमतौर पर 6 मंजिल की होंगी। स्काईलाइन को सुंदर बनाने के लिए कुछ इमारतों को अधिकतम 7, 8 या 9 मंजिल तक ले जाया जा सकता है।
लेकिन 9 मंजिल से ऊपर कोई इमारत नहीं बनेगी, और विजय चौक के आसपास का खुला मैदान बिल्कुल नहीं छुआ जाएगा।
वो योजनाएं जो अधूरी रह गईं...जहां बना सेवा तीर्थ
इस बैठक के बाद कृषि भवन के ठीक बगल में एक इमारत बनी। इसका नाम 1966 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद शास्त्री भवन रखा गया। इसी दौरान निर्माण भवन भी वजूद में आया।
उस दौर के कई दिलचस्प प्लान फाइलों से बाहर ही नहीं आ सके। उदाहरण के लिए सेंट्रल विस्टा के प्लॉट नंबर 36 पर मौजूदा संसद भवन जैसी ही एक हूबहू गोलाकार इमारत बनाने का प्रस्ताव था। इसे लेकर अधिकारियों में काफी मतभेद था। अंततः उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
समय का चक्र देखिए, दशकों बाद उसी प्लॉट नंबर 36 और उसके पास के प्लॉट 38 को मिलाकर देश का सबसे शक्तिशाली दफ्तर तैयार किया गया। यानी नया प्रधानमंत्री कार्यालय, जिसे सेवा तीर्थ नाम दिया गया है। इसका उद्घाटन इसी साल फरवरी (2026) में हुआ है।
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