क्या नई पीढ़ी शराब से कर रही तौबा, जानिए अब वो क्या चाह रही?
मुंबई, दिल्ली या बेंगलुरु के किसी भी बार में शुक्रवार की रात कदम रखिए। वहां आपको अपनी उम्र के बीसवें पड़ाव (20-29 वर्ष) में कदम रख चुके युवा हाथों में पलोमा (Paloma) या पिकांते (Picante) थामे मिल जाएंगे।
वे किसी सिंगल माल्ट की विरासत (provenance) पर बहस कर रहे होंगे, या फिर बड़े ध्यान से बारटेंडर की वह बात सुन रहे होंगे कि कॉकटेल की कोई खास सामग्री कहां से मंगवाई गई है या उसे कैसे छाना (clarified) गया है।
दुनिया भर में चल रहे इस ढोल के विपरीत कि नई पीढ़ी शराब से तौबा कर रही है। असलियत यह है कि वे परहेज नहीं कर रहे हैं। वे पी रहे हैं, बस उनके पीने का तरीका उनके माता-पिता के जमाने जैसा नहीं है।
सिर्फ टल्ली होना मकसद नहीं
इम्प्रेसारियो एंटरटेनमेंट हॉस्पिटैलिटी (Impresario Entertainment Hospitality) के मैनेजिंग डायरेक्टर रियाज अमलानी कहते हैं, लोग निश्चित रूप से पी रहे हैं। बल्कि सच कहें तो वे पहले से बेहतर पी रहे हैं।
अब उनका मकसद सिर्फ टल्ली होना या नशा करना नहीं रह गया है। अब रुझान संयम और जिम्मेदारी से पीने की तरफ है। अमलानी के रेस्टोरेंट और बार्स मुख्य रूप से युवा उपभोक्ताओं की पसंद को ध्यान में रखकर ही चलाए जाते हैं।
पूरी की पूरी पीढ़ी ने अल्कोहल से मुंह मोड़ लिया है-यह विचार कई वर्षों से अंतरराष्ट्रीय मीडिया में तैर रहा है। हाल ही में भारत में भी इसकी गूंज सुनाई दी है। इसे पश्चिम के कुछ अध्ययनों, बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता और सोबर-क्यूरियस (शराब से दूरी बनाने की जीवनशैली) की लोकप्रियता से भी हवा मिली। लेकिन अगर आंकड़ों को देखें, तो वैश्विक स्तर पर भी तस्वीर काफी अलग है।
जेन जी में अल्कोहल की भागीदारी बढ़ी
इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार आईडब्ल्यूएसआर (IWSR) के बेवट्रेक (Bevtrac) सर्वे ने भारत सहित 15 वैश्विक बाजारों के 26,000 से अधिक लोगों पर नजर रखी। इसके मुताबिक जेन जी (जेन-Z - नई पीढ़ी) में अल्कोहल की भागीदारी अप्रैल 2023 के 60 प्रतिशत से बढ़कर मार्च 2025 में 70 प्रतिशत हो गई।
भारत के मामले में विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि कहानी इस बात की नहीं है कि वे पी रहे हैं या नहीं, बल्कि कहानी इस बात की है कि वे कैसे पी रहे हैं।
नई पीढ़ी जाम कम नहीं छलका रही है, वे बस इस बात को लेकर बहुत चूजी (pickier) हो गए हैं कि उनके ग्लास में क्या जा रहा है।
टकीला और जिन (Gin) सबसे आगे
मुंबई की पीआर प्रोफेशनल पूजा भाटिया बताती हैं कि जब उन्होंने पीना शुरू किया था, तब दौर जैगरमिसर बॉम्ब्स (Jägermeister bombs) और टकीला शॉट्स का था। वे कहती हैं, अब मुझे पलोमा, पिकांते या टकीला ऑन द रॉक्स पसंद है।
वह हफ्ते में दो-तीन बार पीती हैं। हालांकि अब इसे घटाकर हफ्ते में एक बार करने की कोशिश कर रही हैं। इसकी वजह? पूजा कहती हैं, मुझे हैंगओवर से नफरत है। मुझे अपनी प्रोडक्टिविटी का घटना पसंद नहीं। इससे मेरे फिटनेस गोल्स बिगड़ते हैं।
और हां, अगर मैं एक ड्रिंक पर 1,500 रुपए खर्च कर रही हूं तो उसके पीछे कोई कहानी, बेहतरीन सामग्रियां और टॉप-क्वालिटी की शराब होनी चाहिए।
शराब और वाइन के आयात व्यवसाय से जुड़े देश के अग्रणी विशेषज्ञ निखिल अग्रवाल ने इस बदलाव को पेशेवर दिलचस्पी और एक पीढ़ीगत नजरिए से देखा है। अग्रवाल कहते हैं, जेन जी के बीच वाइन एक बेहद लोकप्रिय कैटेगरी बन चुकी है।
व्हाइट स्पिरिट्स में टकीला और जिन (Gin) सबसे आगे चल रहे हैं। लोग टकीला की एक बोतल के लिए 7,000 से 9,000 रुपए, एक कॉकटेल के लिए लगभग 1,000 रुपए और वाइन की एक बोतल के लिए 2,000 रुपए से अधिक खुशी-खुशी देने को तैयार हैं।
भारत में इस सेगमेंट की ग्रोथ को लेकर वे काफी उत्साहित हैं। उनके पास इसकी वाजिब वजह भी है। वे आगे जोड़ते हैं, अगर भारत की आबादी का सिर्फ 3 फीसदी हिस्सा भी प्रीमियम अल्कोहल का सेवन कर रहा है, तो वह संख्या लगभग 4.3 करोड़ होती है-जो ऑस्ट्रेलिया की कुल आबादी से भी ज्यादा है।
भारत से स्पिरिट उद्योग को बड़ी उम्मीदें
अधिकतर आकलनों के अनुसार भारतीय बाजार वह जगह है जहां वैश्विक स्पिरिट उद्योग अब अपनी बड़ी उम्मीदें टिकाए हुए है। यही वजह है कि हमें वैश्विक लीडर्स के साथ-साथ देश के भीतर उभरते नामों द्वारा नए-नए लॉन्च देखने को मिल रहे हैं।
आईडब्ल्यूएसआर की रिपोर्ट में कंज्यूमर इनसाइट्स के सीओओ रिचर्ड हालस्टेड के हवाले से कहा गया, भारत एकमात्र ऐसा बाजार बना हुआ है जहां तीनों संकेतक-उपभोक्ता भावना, रिकॉल वॉल्यूम और रिकॉल स्पेंड-सकारात्मक दायरे में हैं, क्योंकि उच्च-मध्यम वर्ग के उपभोक्ता लगातार बेहतर पी रहे हैं और अधिक खर्च कर रहे हैं।
डियाजियो (Diageo) ने 2013 में यूनाइटेड स्पिरिट्स का अधिग्रहण किया था। आज देश में सबसे बड़े पोर्टफोलियो में से एक का संचालन करता है। उनके पास हर साल पीने की वैध कानूनी उम्र (LDA) वाले 10 करोड़ नए उपभोक्ता जुड़ रहे हैं।
डियाजियो इंडिया की चीफ मार्केटिंग ऑफिसर रुचिरा जैतली कहती हैं, भारत पैमाने (scale) और दीर्घकालिक अवसर का एक अनूठा संयोजन पेश करता है। यही कारण है कि हम अक्सर इसे अगले दशक का उपभोक्ता बाजार कहते हैं।
वे इस विकास के ढांचे में आए बदलाव की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, सबसे महत्वपूर्ण बदलाव जो हमने देखा है, वह विशुद्ध रूप से वॉल्यूम-संचालित (ज्यादा मात्रा) से हटकर वैल्यू और एक्सपीरियंस-संचालित (अनुभव और गुणवत्ता) मॉडल की ओर बढ़ना है।
होश खो बैठना या नाली में गिरना मकसद नहीं
बेंगलुरु की 20 वर्षीय ब्रांड मार्केटिंग प्रोफेशनल सत्यवरपु निकिता की पहली ड्रिंक एक कॉकटेल थी। आज वह महीने में करीब एक बार पीती हैं। वह कहती हैं, जब मैं बाहर जाती हूं तो मुझे नए कॉकटेल आजमाना पसंद है, लेकिन आमतौर पर मैं सिर्फ एक या दो घूंट ही लेती हूं।
उनके सभी दोस्त जेन जी हैं। हल्का सुरूर (high) पसंद करते हैं, लेकिन होश खो बैठना या नाली में गिर जाना उनका मकसद नहीं होता। यह हमारा गोल नहीं है।
यह एक ऐसा जुमला है जो इस पीढ़ी के युवाओं से लगातार सुनने को मिलता है। मुंबई में एक क्रिएटर एजेंसी चलाने वाले चिराग कजले के लिए पीना उनके पूरे हफ्ते के सामाजिक ताने-बाने में बुना हुआ है, लेकिन उस तरह नहीं जिसे पिछली पीढ़ियां पहचानती थीं।
मेरे और मेरे दोस्तों का एक नियम है। हम हर सोमवार को मिलते हैं, ड्रिंक करते हैं और बस बातें करते हैं। जिन दिनों उन्हें और उनके दोस्तों को बाहर जाना होता है, वे डूलाली टैपरूम (Doolally Taproom) जैसे टैप बार का रुख करते हैं।
उनके लिए अहमियत संबंध बनाने (connection) की है, न कि शराब गटकने (consumption) की। अल्कोहल एक बेहतरीन सोशल एजेंट है, यह बातचीत के दरवाजे खोलता है। मैंने ड्रिंक्स पर कुछ बहुत ही सार्थक रिश्ते बनाए हैं और उन संपर्कों ने मुझे प्रोफेशनली भी मदद की है।
जेन जी कहीं अधिक प्रयोगधर्मी
माया पिस्टोला अगावेपुरा और पीसीओ के संस्थापक व मैनेजिंग डायरेक्टर रक्षय धारीवाल इस बात को सिरे से खारिज करते हैं कि वैश्विक ट्रेंड्स भारत पर हूबहू लागू होते हैं। वे कहते हैं, जेन जी कहीं अधिक प्रयोगधर्मी (experimental) है।
मिलेनियल्स (पुरानी पीढ़ी) के लिए मिलना-जुलना मतलब अमूमन पीना ही होता था। लेकिन जेन जी और भी बहुत कुछ करती है। वे कॉफी के लिए मिलेंगे, पिकलबॉल जैसे खेल खेलेंगे या बस घूमने निकल जाएंगे। पीना उनके सोशल मिक्स का महज एक हिस्सा है।
सिंगल माल्ट द्रम बेल (Dram Bell) बनाने वाली कंपनी आर्डेंट अल्कोबेव के को-फाउंडर देबाशीष श्याम इसी अंतर को एक बेहतरीन जुमले के साथ बयां करते हैं जो इस पीढ़ी के लोकाचार को सटीक रूप से कैद करता है, वे अल्कोहल-विरोधी (anti-alcohol) नहीं हैं। वे अति-विरोधी (anti-excess) हैं।
पीने के अंदाज में आया बदलाव
पीने के फॉर्मेट में भी बदलाव आया है। मुंबई की 24 वर्षीय पब्लिसिस्ट साक्षी भाटिया अगर परिवार के साथ पी रही हों तो सेक्टर हिबिस्कस एंड पीच जैसी जिन (Gin) या ब्लैक लेबल व्हिस्की पसंद करती हैं।
दोस्तों के साथ भी वे बाहर जाने के बजाय घर पर ही महफिल जमाना पसंद करती हैं। वह कहती हैं, यह अधिक सुरक्षित महसूस होता है। किसी को ड्राइव करने की चिंता नहीं होती और हर कोई एक ही जगह होता है।
अपनी पीढ़ी को लेकर चल रही चर्चाओं पर मुस्कुराते हुए वे कहती हैं, मुझे हंसी आती है जब लोग कहते हैं कि जेन जी नहीं पी रही है। मैं ऐसे लोगों को जानती हूं जो नहीं पीते, लेकिन मैं ऐसे ढेरों लोगों को भी जानती हूं जो जमकर पी रहे हैं। बाकी न पीने वालों का कोटा भी अकेले ही संभाल रहे हैं।
दूसरी ओर, केरल के 25 वर्षीय डेटा एनालिस्ट श्रीहरि टी के ने कॉलेज में व्हिस्की से शुरुआत की थी। अब सचेत रूप से पीछे हट गए हैं। श्रीहरि कहते हैं, मेरा पूरा ध्यान एक अच्छी फिजीक बनाने पर है। मैं जिम जाता हूँ और सख्त डाइट फॉलो करता हूँ।
अब वे महीने में सिर्फ एक या दो बार ही पीते हैं। उनकी कहानी उन लोगों के तर्क को मजबूत करती है जो कहते हैं कि जेन जी संयम बरत रही है-और वे बरत भी रहे हैं। लेकिन यहां भी उनके ड्रिंक का स्तर चुपके से ऊपर उठ चुका है। आम दिनों में उनकी पसंद सिग्नेचर रेयर एज्ड व्हिस्की होती है। किसी खास मौके पर वे सीधे जैक डैनियल्स (Jack Daniel’s) तक जाते हैं।
बदल गए पीने के मायने
निखिल अग्रवाल इस बदलाव का श्रेय युवाओं के आसपास विकसित हुए इंफ्रास्ट्रक्चर को देते हैं-जैसे क्राफ्ट कॉकटेल बार, वाइन की लंबी लिस्ट और वह बारटेंडर जो ड्रिंक की बारीकियां समझाता है।
इन सबने इस पीढ़ी के लिए पीने के मायने बदल दिए हैं। लोग अब वाइन और कॉकटेल को एक्सप्लोर कर रहे हैं। और यह सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं है-मुंबई-दिल्ली से बाहर निकलिए, आपको नागपुर, जयपुर और इंदौर जैसे शहरों में भी युवा कॉकटेल का लुत्फ उठाते दिख जाएंगे।
धारीवाल भी व्यवहार में आए एक स्पष्ट बदलाव की ओर इशारा करते हैं, पहले लोग ड्रिंकिंग गेम्स खेलते थे, फटाफट ड्रिंक्स खत्म करते थे। आज के युवा बस उस हल्के सुरूर (tipsy) वाले जोन में बने रहना चाहते हैं।
पी रहे अपनी शर्तों पर
खुद को वक्त देते हैं और उस एक्सपीरियंस को लंबा खींचते हैं। आप देख सकते हैं कि एक शाम में कुल कंजम्पशन शायद ज्यादा हो, लेकिन वह कड़े शॉट्स के बजाय कम अल्कोहल वाले कॉकटेल के जरिए होता है।
पूजा भाटिया इस बदलते दौर का सबसे सटीक चेहरा हैं-जो एक शाम में तीन कॉकटेल पर 4,000 से 5,000 रुपए खर्च कर देती हैं। किसी कॉन्सर्ट में जाते समय लिक्विड आईवी पार्टी इलेक्ट्रोलाइट्स साथ रखती हैं ताकि बिना अल्कोहल के एनर्जी बनी रहे।
किसी लाउड क्लब के बजाय बेयर (Bare) या बॉम्बे कैंटीन जाना पसंद करती हैं, ताकि वहां का शोर उन्हें उनकी मर्जी से ज्यादा पीने पर मजबूर न कर दे। वह कम नहीं पी रही हैं। वह बस अपनी शर्तों पर पी रही हैं।
FAQ
- क्या भारत में नई पीढ़ी छोड़ रही शराब?
असलियत यह है कि वे परहेज नहीं कर रहे हैं। वे पी रहे हैं, बस उनके पीने का तरीका उनके माता-पिता के जमाने जैसा नहीं है। - विदेशी शराब कंपनियों का भारत को लेकर क्या रुख है?
अधिकतर आकलनों के अनुसार वैश्विक शराब इंडस्ट्री अब भारतीय बाजार से बड़ी उम्मीदें टिकाए हुए हुए हैं। यही वजह है कि वैश्विक लीडर्स के साथ-साथ भारत के भीतर नामी ब्रांड द्वारा नए-नए लॉन्च देखने को मिल रहे हैं। - क्या सिर्फ मेट्रो सिटी में ही युवा शराब अधिक पी रहे हैं?
भारत में नई पीढ़ी अब वाइन और कॉकटेल को एक्सप्लोर कर रही है। यह सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं है—मुंबई-दिल्ली से बाहर देखिए, आपको नागपुर, जयपुर और इंदौर जैसे शहरों में भी युवा कॉकटेल का लुत्फ उठाते दिख जाएंगे।
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