सिर्फ एक लत है भारत और आपकी अमीरी में रोड़ा!
एक पुड़िया, एक जाल
मध्यप्रदेश के एक गांव में रामकिशन सुबह उठते हैं। पहला काम- गुटखा खाना, एक पुड़िया दस रुपए की। दिन में तीन बार यानी तीस रुपए रोज। महीने में नौ सौ। साल में दस हजार आठ सौ रुपए…
घर में पत्नी जानती है यह खर्च होता है। पर कुछ कहती नहीं। कारण सामाजिक दबाव, चुप्पी, लाचारी। इधर रामकिशन की बेटी इस साल सरकारी स्कूल की फीस नहीं भर पाई।
यह कोई एक घर की कहानी नहीं है। यह भारत के करोड़ों घरों की कहानी है।
ICMR और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के शोधकर्ताओं ने पाया है कि देश के दो करोड़ से ज्यादा परिवार सिर्फ तंबाकू छोड़कर अपनी गरीबी को दूर कर सकते हैं। यह अध्ययन BMJ Global Health में प्रकाशित हुआ है और पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा सामने आया है।
आज यह एक्सप्लेनर इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह शोध गरीबी उन्मूलन की नीतियों को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर रहा है।
भारत दुनिया में तंबाकू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता (consumer) देश है। देश में 26.7 करोड़ से अधिक तंबाकू उपयोगकर्ता हैं, यानी हर चौथा वयस्क। इनमें से अधिकांश धुआं रहित तंबाकू (smokeless tobacco) - जैसे गुटखा, खैनी और जर्दा का सेवन करते हैं। दुनिया में कुल धुआं रहित तंबाकू का 70% उपयोग भारत में होता है।
सरकार ने वर्षों से तंबाकू को स्वास्थ्य मुद्दे के रूप में देखा है। COTPA 2003 (सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम), पैकेट पर चेतावनी और राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम जैसी पहलें इसी सोच की उपज हैं। लेकिन गरीबी और तंबाकू के बीच आर्थिक संबंध को अब तक राष्ट्रीय नीति में जगह नहीं मिली। यह शोध पहली बार इस खाई को पाटने की कोशिश करता है।
शोध क्या कहता है?
ICMR-NICPR (नोएडा) और TISS (मुंबई) के शोधकर्ताओं ने 2022-23 के हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे (घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण) का उपयोग किया। जिसमें 2 लाख 61 हजार 746 प्रतिनिधि परिवारों के आंकड़े शामिल थे। यह भारत का सबसे बड़ा और प्रामाणिक सर्वे है।
निष्कर्ष चौंकाने वाला है- अगर कोई परिवार तंबाकू पर होने वाला खर्च बंद करे और उस पैसे को अन्य जरूरतों पर लगाए तो 10.6% परिवार अपनी मौजूदा आय श्रेणी (आर्थिक तरक्की) से ऊपर उठ सकते हैं।
कौन प्रभावित: ग्रामीण परिवारों पर सबसे बड़ी मार
शोध के अनुसार 1.7 करोड़ ग्रामीण परिवार तंबाकू छोड़कर अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकते हैं, जबकि शहरी परिवारों की संख्या केवल 35 लाख है। ग्रामीण परिवार मासिक आय का 6.6% तंबाकू पर खर्च करते हैं और शहरी परिवारों के 5.6% से अधिक।
इसके अलावा 71.2 लाख निम्न-मध्यम आय (lower-middle income) वाले परिवार, जो अपनी आय श्रेणी में 16.8% हिस्सा रखते हैं, वे अगर तंबाकू छोड़ें तो अगली श्रेणी में जा सकते हैं।
सबसे गरीब (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) में 56.2 लाख परिवार (उस वर्ग के 12.4%) इस बदलाव से सीधे बाहर निकल सकते हैं।
विभिन्न दृष्टिकोण
सरकार का पक्ष: केंद्र सरकार पहले से COTPA, राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम और तंबाकू पर उच्च टैक्स जैसे कदम उठा रही है।
नीति आयोग भी तंबाकू को स्वास्थ्य बोझ के रूप में मानता है। लेकिन गरीबी उन्मूलन योजनाओं - जैसे MGNREGA, PM-JAY और राशन वितरण में तंबाकू नियंत्रण का कोई एकीकरण (integration) नहीं है।
विशेषज्ञों का पक्ष:
ICMR-NICPR के डॉ. प्रशांत कुमार सिंह कहते हैं, "तंबाकू छोड़ना केवल स्वास्थ्य संदेश नहीं, बल्कि गरीबी उन्मूलन की रणनीति बननी चाहिए।"
ICMR-NICPR की निदेशक डॉ. शालिनी सिंह का कहना है कि "जब कोई परिवार तंबाकू छोड़ता है, तो वह न केवल कैंसर का खतरा कम करता है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और समय पर इलाज के लिए पैसा भी बचाता है।"
आम नागरिक का अनुभव: ग्रामीण भारत में खैनी और बीड़ी की लत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है। बहुत से परिवारों में पुरुष सदस्य तंबाकू पर रोज 20-50 रुपए खर्च करते हैं, जो महीने में 600-1500 रुपए तक पहुंच जाता है।
गांव की महिलाएं अक्सर इस खर्च को घर की तंगी का कारण मानती हैं, लेकिन सामाजिक दबाव में आवाज उठाना मुश्किल होता है।
विपक्ष और सामाजिक संगठनों का पक्ष: कुछ जन स्वास्थ्य (public health) कार्यकर्ता मानते हैं कि सिर्फ "तंबाकू छोड़ो" कहने से काम नहीं चलेगा - सस्ती और सुलभ नशा मुक्ति सेवाएं (cessation services) जरूरी हैं, जो अभी बेहद सीमित हैं।
निष्कर्ष
ये रिसर्च एक साधारण लेकिन क्रांतिकारी विचार सामने रखती है। तंबाकू नियंत्रण को स्वास्थ्य विभाग की फाइल से निकालकर गरीबी उन्मूलन (Poverty Alleviation) की मुख्यधारा में लाना होगा। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसके लिए कोई नया खर्च नहीं चाहिए, बस मौजूदा योजनाओं में तंबाकू छोड़ने की सेवाएं जोड़नी हैं। चुनौती यह है कि लत तोड़ना आसान नहीं, और ग्रामीण भारत में नशा मुक्ति सेवाएं बेहद कमजोर हैं।
स्रोत / Sources
BMJ Global Health - "The economics of quitting: estimating the uplift potential of Indian households through tobacco cessation" (अप्रैल 2026)
ICMR-NICPR (नोएडा) - डॉ. प्रशांत कुमार सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक; डॉ. शालिनी सिंह, निदेशक
TISS मुंबई - डॉ. मोंटू बोस, स्कूल ऑफ हेल्थ सिस्टम्स स्टडीज
हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे 2022-23 - NSO, भारत सरकार
ग्लोबल यूथ टोबेको सर्वे 2019 - WHO / स्वास्थ्य मंत्रालय
COTPA 2003 - स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार
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