तो क्या अब खत्म हो गया ट्रंप का डर? अमेरिकी चुनाव के बाद भारतीय शेयर बाजार में क्यों आई बंपर तेजी, जानिए 5 वजहें
पहले समझिए, शेयर बाजार में कितनी बड़ी तेजी आई?
गुरुवार, 5 नवंबर को भारतीय शेयर बाजार में जोरदार तेजी देखने को मिली और निवेशकों का उत्साह बढ़ा। सेंसेक्स 2,008 अंक यानी 2.60 फीसदी चढ़कर 79,310 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी में 576 अंकों की बढ़त दर्ज हुई और यह 24,536 के स्तर पर बंद हुआ।
इस तेजी के पीछे अमेरिकी चुनाव परिणामों और सस्ते कच्चे तेल को अहम वजह माना गया। विदेशी निवेशकों की खरीदारी और भारतीय कंपनियों के तिमाही नतीजों ने भी बाजार को सहारा दिया। हालांकि, बाजार में एक दिन की जोरदार तेजी का मतलब आगे लगातार बढ़त होना बिल्कुल नहीं है।
अमेरिका में क्या हुआ, ट्रंप की पार्टी को कितना बड़ा झटका लगा?
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस के दोनों सदनों में मजबूत बढ़त हासिल की। दिए गए चुनावी आंकड़ों में डेमोक्रेट्स को सीनेट की 54 और रिपब्लिकन को 44 सीटें मिली हैं। सीनेट में बहुमत के लिए 51 सीटें जरूरी हैं, इसलिए डेमोक्रेट्स बहुमत के आंकड़े से आगे हैं।
वहीं हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में डेमोक्रेट्स को 242 और रिपब्लिकन पार्टी को 151 सीटें दिखाई गई हैं। यहां बहुमत के लिए 218 सीटें जरूरी हैं, जबकि डेमोक्रेट्स इससे काफी आगे निकल चुके हैं। हालांकि, उपलब्ध ग्राफिक में दोनों सदनों की सभी सीटों का पूरा हिसाब अभी नहीं दिखाया गया है।
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव क्या होते हैं और ट्रंप पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल होता है, लेकिन कांग्रेस के चुनाव हर दो साल में होते हैं। राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच होने वाले इन्हीं चुनावों को अमेरिका में मिडटर्म चुनाव कहा जाता है। इनमें मतदाता राष्ट्रपति के कामकाज और उनकी पार्टी की नीतियों पर भी अपनी प्रतिक्रिया देते हैं।
अमेरिकी कांग्रेस में सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स नाम के दो सदन होते हैं, जिनकी भूमिकाएं महत्वपूर्ण हैं। ये दोनों सदन कानून बनाने, सरकारी खर्च और राष्ट्रपति प्रशासन की नीतियों की निगरानी में भाग लेते हैं। विरोधी पार्टी मजबूत होने से ट्रंप प्रशासन के लिए कुछ बड़े फैसले लेना ज्यादा मुश्किल हो सकता है।
लेकिन इन चुनावों से डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) राष्ट्रपति पद से नहीं हटेंगे और उनके संवैधानिक अधिकार बने रहेंगे। विदेश नीति और सैन्य कार्रवाई से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों में अमेरिकी राष्ट्रपति की सीधी भूमिका रहती है। हालांकि, कांग्रेस में विरोध बढ़ने से प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है और नीतियां प्रभावित हो सकती हैं।
अब जानिए भारतीय शेयर बाजार में तेजी की पांच बड़ी वजहें
1. कच्चा तेल सस्ता हुआ, भारत को राहत की उम्मीद
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई को लेकर चिंता थी। निवेशकों को आशंका थी कि युद्ध बढ़ने पर तेल की आवाजाही और उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन अमेरिकी चुनाव के बाद तनाव कम होने की उम्मीद ने कच्चे तेल की कीमतों (Crude Oil Prices) पर दबाव बनाया।
दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 4 नवंबर को ब्रेंट क्रूड करीब 8.7 फीसदी गिरकर 94.62 डॉलर पर आया। इसके अगले दिन भी कीमतों में नरमी रही और ब्रेंट क्रूड करीब 93.50 डॉलर के आसपास कारोबार करता दिखा। बाजार को उम्मीद है कि राजनीतिक दबाव बढ़ने से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव घट सकता है।
अब समझिए कि भारत के लिए कच्चे तेल का सस्ता होना इतना ज्यादा महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है और भुगतान डॉलर में करता है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में देश की तेल आयात निर्भरता करीब 88.7 फीसदी रही।
मान लीजिए भारत पहले जितनी मात्रा में तेल खरीदता है, लेकिन अब उसकी कीमत कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में तेल खरीदने के लिए पहले के मुकाबले कम डॉलर खर्च करने की जरूरत पड़ सकती है। इससे देश का आयात बिल घट सकता है और अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिलने की संभावना बनती है।
2. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड गिरी, शेयरों में निवेश की उम्मीद बढ़ी
तेल की कीमतों में गिरावट के साथ अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड में भी नरमी देखने को मिली। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका के दस साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड करीब 4.8 फीसदी रही। वहीं दो साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड घटकर लगभग 4.5 फीसदी के आसपास पहुंच गई थी।
आसान भाषा में बॉन्ड सरकार को दिया जाने वाला कर्ज है, जिसके बदले निवेशक को ब्याज मिलता है। बॉन्ड की बाजार कीमत के मुकाबले मिलने वाले रिटर्न को वित्तीय बाजार में यील्ड कहा जाता है। आमतौर पर बॉन्ड की कीमत बढ़ने पर यील्ड घटती है और कीमत गिरने पर बढ़ जाती है।
जब सुरक्षित माने जाने वाले बॉन्ड पर रिटर्न घटता है, तो कुछ निवेशक शेयरों में पैसा लगाते हैं। ऐसे माहौल में भारत जैसे उभरते बाजारों को विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी का फायदा मिल सकता है। हालांकि, निवेशक केवल बॉन्ड यील्ड नहीं देखते, बल्कि ब्याज दरों और वैश्विक जोखिम का भी आकलन करते हैं।
3. विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में बढ़ाई खरीदारी
भारतीय शेयर बाजार (Share Market) की तेजी में विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने 4 नवंबर को करीब 7,284 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीदारी की। यह लगातार चौथा कारोबारी सत्र था, जब विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में खरीदारी जारी रखी।
अब सवाल उठता है कि विदेशी निवेशकों की खरीदारी से भारतीय शेयर बाजार में तेजी क्यों आती है। दरअसल, बड़ी निवेश संस्थाएं जब किसी कंपनी के शेयर खरीदती हैं, तो बाजार में मांग बढ़ सकती है। खरीदारों की संख्या और निवेश बढ़ने से संबंधित शेयरों की कीमतों को भी सहारा मिल सकता है।
सेंसेक्स और निफ्टी में शामिल बड़ी कंपनियों के शेयर चढ़ने से प्रमुख सूचकांक भी ऊपर जाते हैं। लेकिन विदेशी निवेशक वैश्विक परिस्थितियां बदलने पर भारत से अपना पैसा निकालने का फैसला भी कर सकते हैं। इसलिए विदेशी निवेशकों की लगातार खरीदारी सकारात्मक संकेत है, लेकिन बाजार में स्थायी तेजी की गारंटी नहीं है।
4. रुपये को मिली मजबूती, डॉलर की मांग घटने की उम्मीद
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बीच भारतीय रुपये को भी विदेशी मुद्रा बाजार में सहारा मिला। दिए गए विवरण के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 0.3 फीसदी मजबूत होकर 94.35 पर पहुंचा। रुपये की मजबूती के पीछे तेल की कीमतों में गिरावट को भी एक वजह माना गया है।
इसे समझने के लिए भारत के तेल आयात और डॉलर में होने वाले भुगतान का संबंध जानना होगा। भारत जब विदेश से कच्चा तेल खरीदता है, तो उसे अधिकांश भुगतान अमेरिकी डॉलर में करना पड़ता है। तेल महंगा होने पर ज्यादा डॉलर चाहिए होते हैं, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
इसके उलट तेल सस्ता होने से डॉलर की जरूरत घट सकती है और रुपये को सहारा मिल सकता है। विदेशी निवेशकों की खरीदारी भी भारतीय मुद्रा के पक्ष में काम कर सकती है, हालांकि असर हमेशा समान नहीं होता। डॉलर की वैश्विक मजबूती, ब्याज दरें और रिजर्व बैंक की नीतियां भी रुपये की कीमत प्रभावित करती हैं।
5. भारतीय कंपनियों के नतीजों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया
वैश्विक घटनाओं के अलावा भारतीय कंपनियों के तिमाही नतीजों ने भी बाजार के माहौल को सहारा दिया। दिए गए बाजार विवरण में रिलायंस, इंफोसिस और टीसीएस जैसी बड़ी कंपनियों के शेयरों में तेजी का जिक्र है। मजबूत कारोबारी प्रदर्शन से निवेशकों को भविष्य में बेहतर कमाई की उम्मीद बन सकती है और खरीदारी बढ़ती है।
इसे एक उदाहरण से समझिए, किसी कंपनी की बिक्री बढ़ती है और उसके मुनाफे में भी सुधार होता है। ऐसी स्थिति में निवेशकों को उम्मीद हो सकती है कि आने वाले समय में कंपनी अच्छा प्रदर्शन करेगी। इसी उम्मीद में शेयरों की मांग बढ़ सकती है और कीमतों को भी ऊपर जाने का सहारा मिलता है।
सेंसेक्स में 30 और निफ्टी में 50 प्रमुख कंपनियों के शेयर शामिल हैं, जिनका वजन अलग होता है। इसलिए बड़ी कंपनियों के शेयरों में जोरदार तेजी आने पर पूरे सूचकांक में बड़ी बढ़त दिख सकती है। हालांकि, अच्छे नतीजों के बावजूद शेयर गिर सकते हैं, यदि कंपनी का प्रदर्शन निवेशकों की उम्मीदों से कमजोर हो।
ट्रंप की हार के बाद ईरान युद्ध खत्म होने की उम्मीद क्यों बढ़ी?
अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष का असर केवल दोनों देशों तक नहीं, बल्कि वैश्विक तेल बाजार तक पहुंचता है। पश्चिम एशिया में कई बड़े तेल उत्पादक देश मौजूद हैं, इसलिए यहां तनाव बढ़ने से कीमतें प्रभावित होती हैं। सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर रहती है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल की आवाजाही होती है।
यह समुद्री रास्ता फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और वैश्विक कारोबार के लिए महत्वपूर्ण है। अगर यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो तेल की सप्लाई में रुकावट आने की आशंका बढ़ती है। इसी वजह से क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने पर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतें ऊपर जा सकती हैं।
अमेरिकी चुनाव परिणामों के बाद निवेशकों को उम्मीद है कि ट्रंप प्रशासन पर संघर्ष कम करने का दबाव बढ़ेगा। कांग्रेस में डेमोक्रेट्स की मजबूत स्थिति से युद्ध संबंधी खर्च और नीतियों पर निगरानी भी बढ़ सकती है। हालांकि, इससे यह साबित नहीं होता कि युद्ध तुरंत खत्म होगा या दोनों देशों में समझौता हो जाएगा।
क्या अब ट्रंप का डर पूरी तरह खत्म हो गया है?
इस सवाल का सीधा जवाब है कि ट्रंप की नीतियों से जुड़ी अनिश्चितता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति की पार्टी को नुकसान होने से राजनीतिक समीकरण जरूर बदल सकते हैं। लेकिन राष्ट्रपति अपने पद पर बने रहते हैं और विदेश नीति से जुड़े कई अधिकार उनके पास रहते हैं।
बाजार को उम्मीद है कि राजनीतिक दबाव बढ़ने पर ट्रंप प्रशासन कुछ नीतियों में नरमी दिखा सकता है। खासकर ईरान के साथ तनाव कम होने से कच्चे तेल की कीमतों को राहत मिलने की संभावना है। लेकिन अगर संघर्ष दोबारा बढ़ता है, तो तेल की कीमतें फिर ऊपर जा सकती हैं और बाजार प्रभावित होगा।
इसलिए शेयर बाजार की मौजूदा तेजी को ट्रंप की नीतियों से जुड़ा डर खत्म होने का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। निवेशक फिलहाल संभावित राजनीतिक बदलाव और उसके आर्थिक असर को ध्यान में रखकर अपने फैसले कर रहे हैं। आगे बाजार की दिशा वास्तविक सरकारी फैसलों, तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों के रुख से तय होगी।
क्या अब भारत में पेट्रोल और डीजल भी सस्ता होगा?
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बाद आम लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल ईंधन की कीमतों का है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने का मतलब पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमत (Petrol Diesel Prices) तुरंत घटना नहीं होता है। भारत में ईंधन की कीमतें कच्चे तेल, रिफाइनिंग खर्च, परिवहन लागत और टैक्स से प्रभावित होती हैं।
तेल कंपनियों को पुराने महंगे सौदों और दूसरी लागतों का भी हिसाब रखना पड़ सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कुछ दिनों की गिरावट सीधे पेट्रोल पंप पर दिखाई देना जरूरी नहीं है। अगर तेल लंबे समय तक सस्ता रहता है, तो कंपनियों की लागत कम होने की संभावना बढ़ती है।
इसके बाद खुदरा कीमतों में राहत देने की गुंजाइश बन सकती है, लेकिन कटौती होना तय नहीं है। कीमतों में बदलाव तेल कंपनियों की नीति और केंद्र तथा राज्य सरकारों के टैक्स संबंधी फैसलों पर निर्भर करेगा। इसलिए अभी पेट्रोल और डीजल जल्द सस्ते होने का दावा करना आर्थिक रूप से सही नहीं होगा।
तेल सस्ता होने से महंगाई और आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
कच्चा तेल सस्ता होने का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कई क्षेत्रों में पहुंचता है। सामान की ढुलाई, खेती, उद्योग और दूसरी सेवाओं की लागत भी ईंधन की कीमतों से प्रभावित होती है। अगर डीजल सस्ता होता है, तो कुछ क्षेत्रों में परिवहन और उत्पादन का खर्च कम हो सकता है।
मान लीजिए किसी ट्रक को खेत से सब्जियां मंडी तक पहुंचाने में पहले ज्यादा ईंधन खर्च करना पड़ता था। डीजल की कीमत घटने पर उसका परिवहन खर्च कम हो सकता है और कारोबारियों को राहत मिल सकती है। इससे बाजार में कुछ सामान की कीमतों पर दबाव घटने की संभावना बन सकती है, हालांकि असर अलग होगा।
लेकिन महंगाई केवल कच्चे तेल की कीमतों से तय नहीं होती, बल्कि कई दूसरे कारण भी जिम्मेदार होते हैं। मौसम, फसल उत्पादन, बाजार की मांग और सप्लाई में रुकावट जैसे कारण खाद्य कीमतें प्रभावित करते हैं। इसलिए तेल सस्ता होने से राहत की उम्मीद जरूर है, लेकिन हर चीज तुरंत सस्ती होना तय नहीं है।
क्या शेयर बाजार में आगे भी ऐसी तेजी जारी रहेगी?
अमेरिकी चुनाव के बाद भारतीय शेयर बाजार में आई तेजी निवेशकों के भरोसे को दिखाती है। लेकिन केवल एक कारोबारी दिन की बढ़त देखकर आगे लगातार तेजी जारी रहने का अनुमान लगाना सही नहीं होगा। बाजार की दिशा अमेरिकी नीतियों, वैश्विक तनाव, कच्चे तेल और भारतीय कंपनियों की कमाई पर निर्भर करेगी।
अगर ईरान के साथ तनाव घटता है और तेल सस्ता रहता है, तो भारत को आर्थिक राहत मिल सकती है। विदेशी निवेशकों की खरीदारी जारी रहने और घरेलू कंपनियों के बेहतर नतीजों से भी बाजार को सहारा मिल सकता है। इसके उलट तेल महंगा होने, डॉलर मजबूत होने और विदेशी बिकवाली से बाजार में गिरावट भी आ सकती है।
आखिर अमेरिकी चुनाव से भारत को कितना फायदा हो सकता है?
भारत के लिए सबसे बड़ा संभावित फायदा कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक नरमी बने रहने से जुड़ा है। इससे देश का आयात बिल कम हो सकता है और रुपये पर पड़ने वाला दबाव भी घट सकता है। परिवहन तथा उत्पादन का खर्च कम होने से महंगाई को नियंत्रित करने में भी कुछ मदद मिल सकती है।
लेकिन अमेरिका में राजनीतिक बदलाव से भारत को मिलने वाला वास्तविक फायदा आने वाले आर्थिक फैसलों पर निर्भर करेगा। चुनाव के परिणाम अपने आप युद्ध खत्म नहीं कर सकते और न ही तेल की कीमतें स्थायी रूप से घटाते हैं। कुल मिलाकर बाजार को नई उम्मीद जरूर मिली है, लेकिन ट्रंप की नीतियों का डर खत्म मानना जल्दबाजी होगी।