क्या देश में खत्म हो रहा ग्रेजुएशन का इंटरेस्ट, AISHE ने खोली भारत के शिक्षा की पोल

Kaushiki | Jul 24, 2026, 17:01 IST
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भारत में पहली बार ग्रेजुएशन कोर्सेज में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या कम हुई है। शिक्षा मंत्रालय की AISHE रिपोर्ट के अनुसार यह गिरावट मुख्य रूप से लड़कों के दाखिले में देखी गई है। महाराष्ट्र और यूपी जैसे बड़े राज्यों में यह रुझान सबसे ज्यादा दिखा है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • भारत में इतिहास में पहली बार यूजी दाखिलों में गिरावट आई है।
  • यह गिरावट मुख्य रूप से मेल स्टूडेंट्स की संख्या कम होने से हुई है।
  • महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में दाखिले सबसे ज्यादा घटे हैं।
  • आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स तीनों बड़े स्ट्रीम्स में छात्र कम हुए हैं।
  • छात्र अब डिप्लोमा और अन्य जॉब ओरिएंटेड कोर्सेज चुन रहे हैं।

कॉलेज में घटते दाखिलों का सच

AISHE Report on Higher Education: सोचिए, सुबह-सुबह कॉलेज का गेट खुलता है, लेक्चर हॉल सजते हैं, लेकिन बेंच पर बैठने वाले यंगस्टर्स गायब हैं! जी हां, इंडियन एजुकेशन सिस्टम में कुछ ऐसा ही साइलेंट लेकिन बड़ा ट्विस्ट देखने को मिला है। एजुकेशन मिनिस्ट्री की लेटेस्ट AISHE रिपोर्ट के नए आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है। इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि भारत में अंडरग्रेजुएट (UG) यानी ग्रेजुएशन कोर्सेज में एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स की ओवरऑल संख्या बढ़ने की जगह घट गई है।



हैरानी की बात यह है कि देश में यूथ पॉपुलेशन बढ़ रही है। नए-नए कॉलेज खुल रहे हैं, फिर भी यूजी डिग्री का क्रेज अचानक नीचे कैसे गिर गया? अगर डेटा की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि लड़के कॉलेज की लंबी डिग्रियों से दूरी बना रहे हैं। जबकि लड़कियां एडमिशन (Higher Education Institutes)के मामले में लगातार आगे निकल रही हैं। आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स जैसे ट्रेडिशनल कोर्सेज में यह ड्रॉप सबसे ज्यादा देखा गया है।



आखिर क्या है इस अचानक आई गिरावट की असली वजह? क्या आज के स्टूडेंट्स तीन साल की थ्योरी पढ़ाई छोड़कर स्किल्स और शॉर्ट-टर्म डिप्लोमा कोर्सेज को ज्यादा वैल्यू दे रहे हैं? आइए, इस पूरी खबर के एक-एक पहलू को डिटेल में समझते हैं। जानते हैं कि इस नए एजुकेशन ट्रेंड का हमारे और आपके फ्यूचर पर क्या असर पड़ने वाला है।



India’s Education Lie EXPOSED!


आखिर आंकड़े क्या इशारा करते हैं

देश में हर साल 18 से 23 साल के युवाओं की आबादी बढ़ रही है। नए-नए कॉलेज और यूनिवर्सिटीज(Higher education struggle) की इमारतें खड़ी हो रही हैं। फिर भी क्लासरूम में कुर्सियां खाली रह जाएं? पहली नजर में यह एक मिस्ट्री लगती है। लेकिन जब आप उच्च शिक्षाशिक्षा मंत्रालय के ताजा AISHE (All India Survey on Higher Education) डेटा के पन्नों को पलटते हैं, तो इसके पीछे का असली खेल समझ आता है।



आंकड़ों के मुताबिक, साल 2022-23 की तुलना में 2023-24 में अंडरग्रेजुएट (UG) दाखिलों में लगभग 93 हजार छात्रों की कमी दर्ज की गई है। भले ही यह गिरावट प्रतिशत में केवल 0.27% दिखती हो। लेकिन भारतीय शिक्षा इतिहास में यह एक बहुत बड़ा अलार्म बेल है। यह गिरावट किसी एक राज्य की कहानी नहीं है, बल्कि देश भर का एक नया ट्रेंड बयां कर रही है।



यह डेटा साफ इशारा कर रहा है कि भारत के युवाओं की प्राथमिकताएं अब तेजी से बदल रही हैं। आज का युवा सिर्फ डिग्री का ठप्पा लगाने के लिए कॉलेज में तीन या चार साल इन्वेस्ट करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। अगर पढ़ाई के अंत में गारंटीड जॉब या प्रैक्टिकल स्किल न मिले। तो युवा अब पारंपरिक ग्रेजुएशन को स्किप करके सीधे टेक्निकल कोर्सेज, डिप्लोमा या कमाई के नए जरियों की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं।



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लड़कों और लड़कियों में अलग ट्रेंड

अब ऐसे में अगर आप आज के किसी कॉलेज कैंपस में वॉक करें, तो आपको एक बहुत ही दिलचस्प सीन देखने को मिलेगा। क्लासरूम्स की फ्रंट बेंच से लेकर लाइब्रेरी की कुर्सियों तक। हर जगह फीमेल स्टूडेंट्स का दबदबा साफ नजर आ रहा है। यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि डेटा का वो कड़वा-मीठा सच है जिसने पूरे एजुकेशन सिस्टम को हिलाकर रख दिया है।



AISHE रिपोर्ट के आंकड़ों को डिकोड करें, तो पता चलता है कि जहां यूजी कोर्सेज में लड़कों के एडमिशन 2.2% गिर गए हैं। वहीं लड़कियों के दाखिलों में 1.8% की शानदार उछाल देखी गई है। अब सवाल यह उठता है कि ऐसा जेंडर स्वैप क्यों हो रहा है? दरअसल, आज का मेल यूथ फैमिली रिस्पॉन्सिबिलिटी और फाइनेंशियल प्रेशर के कारण 3-4 साल लंबी थ्योरेटिकल डिग्रियों से दूरी बना रहा है।



उनका माइंडसेट अब क्विक अर्निंग यानी फ्रीलांसिंग, गिग इकोनॉमी, शॉर्ट-टर्म डिप्लोमा और डायरेक्ट जॉब्स की तरफ ज्यादा शिफ्ट हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ, इंडियन फैमिलीज अब बेटियों की पढ़ाई में इनवेस्ट करने को लेकर काफी सीरियस हो चुकी हैं।



लड़कियां हायर एजुकेशन को अपनी इंडिपेंडेंस और करियर सक्सेस का सबसे पावरफुल जरिया मान रही हैं। यह बदलता ट्रेंड साफ बता रहा है कि फ्यूचर में हमारा वर्कफोर्स पूरी तरह बदलने वाला है।



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किन राज्यों में पड़ा सबसे ज्यादा असर

कल्पना कीजिए, देश के सबसे बड़े राज्यों के बड़े-बड़े डिग्री कॉलेजों में नए सेशन की घंटियां बज रही हैं। लेकिन प्रोफेसर साहब क्लास में कदम रखते हैं तो आधी सीटें खाली मिलती हैं। यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं, बल्कि भारत के प्रमुख राज्यों का नया एजुकेशन रियलिटी चेक है।



जब हम AISHE रिपोर्ट के स्टेट-वाइज डेटा का मैप देखते हैं, तो सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से लगता है। महाराष्ट्र में ग्रेजुएशन के दाखिलों में 6% की सीधी गिरावट आई है। वहीं आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में 3% की कमी दर्ज की गई है। सिर्फ यही नहीं, भारत की कैपिटल दिल्ली में भी 6% यूजी स्टूडेंट्स कम हुए हैं।



सबसे चौंकाने वाले आंकड़े जम्मू-कश्मीर और पश्चिम बंगाल से आए हैं। जम्मू-कश्मीर में रिकॉर्ड 13% और पश्चिम बंगाल में 8% दाखिले अचानक घट गए हैं। अगर इन सभी राज्यों का डेटा मिलाएं, तो करीब छह लाख छात्रों ने पारंपरिक तीन साल की डिग्री से किनारा कर लिया है।



इस गिरावट का सीधा मतलब है कि बड़े एजुकेशनल हब्स में स्टूडेंट्स अब थ्योरेटिकल डिग्री पर टाइम और पैसा इन्वेस्ट करने से हिचकिचा रहे हैं। किसी नए प्रैक्टिकल रास्ते की तलाश में हैं।



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तमिलनाडु और बिहार ने संभाला मोर्चा

जहां एक तरफ यूपी और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में कॉलेज एडमिशन का ग्राफ नीचे गिर रहा था। वहीं दूसरी तरफ कुछ राज्यों ने एजुकेशन सेक्टर को पूरी तरह डूबने से बचा लिया। इसे कहते हैं South vs. North का एक दिलचस्प एजुकेशनल ट्विस्ट। इस पूरी रिपोर्ट में सबसे हीरो वाला रोल तमिलनाडु ने निभाया है।



अकेले तमिलनाडु ने रिकॉर्ड 1.6 लाख नए यूजी दाखिले दर्ज किए, जिसने नेशनल लेवल पर ओवरऑल आंकड़ों का संतुलन बनाए रखा। इसके साथ ही बिहार, कर्नाटक और ओडिशा में भी ग्रेजुएशन करने वाले स्टूडेंट्स का क्रेज बरकरार रहा। वहां ग्राफ ऊपर चढ़ता दिखा।लेकिन सबसे माइंड-ब्लोइंग बदलाव तो उत्तर प्रदेश में देखा गया।



यूपी में भले ही 1.53 लाख छात्रों ने पारंपरिक बीए, बीएससी या बीकॉम की डिग्रियों को बाय-बाय कह दिया। लेकिन वहीं दूसरी ओर पॉलिटेक्निक और जॉब-ओरिएंटेड डिप्लोमा कोर्सेज में जबरदस्त उछाल देखा गया। यानी यूपी का यूथ अब पढ़ाई छोड़ नहीं रहा है, बल्कि वह तीन साल की लंबी डिग्रियों को बायपास करके 1-2 साल वाले प्रैक्टिकल और स्किल-बेस्ड डिप्लोमा को तरजीह दे रहा है, ताकि उसे जल्द से जल्द मार्केट में जॉब मिल सके!



इसका हमारे समाज पर क्या असर पड़ेगा

अब जरा इमेजिन कीजिए, अगर आने वाले कुछ सालों में डिग्री होना सिर्फ एक कागज का टुकड़ा बन जाए और हाथों का हुनर ही असली 'पावर' बन जाए, तो हमारा समाज कैसा दिखेगा? ग्रेजुएशन के घटते आंकड़े इसी बड़े सोशल शिफ्ट की ओर इशारा कर रहे हैं।



जब लड़के ट्रेडिशनल 3-4 साल की डिग्रियों को छोड़कर प्रैक्टिकल डिप्लोमा और जॉब-ओरिएंटेड स्किल्स चुन रहे हैं। तो इसका सीधा मतलब है कि आज की यंग जनरेशन वेट-एंड-वॉच के मूड में बिल्कुल नहीं है। उन्हें थ्योरी से ज्यादा तुरंत मिलने वाली फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस चाहिए।



दूसरा बड़ा और पॉजिटिव बदलाव यह है कि कॉलेज परिसरों में लड़कियों का दबदबा बढ़ रहा है। समाज में वुमन एम्पावरमेंट अब सिर्फ नारों में नहीं, बल्कि डेटा में दिख रहा है। लड़कियां हायर एजुकेशन को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही हैं, जो आने वाले समय में वर्कफोर्स और लीडरशिप रोल्स में जेंडर बैलेंस को पूरी तरह बदल देगा।



वहीं दूसरी ओर, अगर बिना किसी खास स्किल वाली केवल थ्योरी की डिग्रियां चलती रहीं, तो यूथ में फ्रस्ट्रेशन बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, यह बदलाव हमारे समाज को डिग्री-ड्रिवन से हटाकर स्किल्ड और प्रैक्टिकल बनाने का काम कर रहा है, जहां सर्वाइव वही करेगा जिसके पास असली हुनर होगा।



Reference Links:



  • All India Survey on Higher Education (AISHE) Report
  • Ministry of Education, Government of India.
  • The Hindu Data

FAQ

  1. AISHE की ताजा रिपोर्ट में दाखिलों को लेकर क्या खुलासा हुआ है?
    रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पहली बार यूजी यानी ग्रेजुएशन कोर्सेज में कुल दाखिलों की संख्या घटी है। यह गिरावट मुख्य रूप से लड़कों के दाखिलों में कमी आने के कारण दर्ज की गई है।
  2. किन राज्यों में ग्रेजुएशन के छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा घटी है?
    महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा छात्र कम हुए हैं। इसके अलावा दिल्ली, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर में भी ग्रेजुएशन के दाखिलों में काफी ज्यादा गिरावट देखी गई है।
  3. क्या सभी विषयों में छात्रों की संख्या में कमी आई है?
    हां, आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स जैसे सभी मुख्य स्ट्रीम्स में दाखिले कम हुए हैं। छात्र अब पारंपरिक डिग्री की जगह प्रैक्टिकल और डिप्लोमा कोर्सेज की तरफ अधिक आकर्षित हो रहे हैं।

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