US Midterm Elections 2026: ट्रंप की हार के क्या मायने, अब कैसे चलेगी अमेरिकी सरकार, भारत को फायदा या नुकसान?
अमेरिका में 3 नवंबर को हुए मध्यावधि चुनाव ने वहां की राजनीति का समीकरण बदल दिया है। चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट में 54 और प्रतिनिधि सभा में 231 सीटें हासिल की हैं। यानी अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में अब डेमोक्रेट्स का बहुमत होगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के लिए यह बड़ा झटका है, क्योंकि अब उनकी सरकार के सामने विपक्ष की ताकत पहले से ज्यादा होगी।
लेकिन यहां एक दिलचस्प बात है। चुनाव में ट्रंप की पार्टी हारी है, ट्रंप खुद राष्ट्रपति पद का चुनाव नहीं हारे हैं। वह अभी भी अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और जनवरी 2029 तक उनका कार्यकाल निर्धारित है। फिर उनकी मुश्किलें क्यों बढ़ गई हैं? इसे समझने के लिए पहले अमेरिका की सरकार चलने का तरीका जानना जरूरी है।
सबसे पहले समझिए, अमेरिका में मिडटर्म चुनाव क्या होते हैं?
भारत में लोकसभा चुनाव के जरिए केंद्र की सरकार तय होती है। लोकसभा में जिस पार्टी या गठबंधन के पास बहुमत होता है, उसी के समर्थन से प्रधानमंत्री सरकार चलाते हैं। लेकिन अमेरिका में व्यवस्था अलग है। वहां राष्ट्रपति का चुनाव अलग होता है और संसद के सदस्यों का चुनाव अलग।
अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है। इस कार्यकाल के बीच में संसद के लिए जो चुनाव होते हैं, उन्हें मिडटर्म इलेक्शन यानी मध्यावधि चुनाव कहते हैं। ये चुनाव हर दो साल में होते हैं। अमेरिका की संसद को कांग्रेस कहा जाता है। इसके दो सदन हैं। पहला हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी प्रतिनिधि सभा और दूसरा सीनेट।
प्रतिनिधि सभा में कुल 435 सदस्य होते हैं। इन सभी सदस्यों का चुनाव हर दो साल में होता है। सीनेट में कुल 100 सदस्य होते हैं। यहां प्रत्येक राज्य से दो सीनेटर चुने जाते हैं। सीनेटर का कार्यकाल छह साल का होता है, लेकिन हर दो साल में लगभग एक-तिहाई सीटों पर चुनाव होता है।
इस बार मिडटर्म चुनाव ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बीच हुआ है। इसलिए इन परिणामों को उनकी सरकार के कामकाज के प्रति जनता के रुख का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है।
चुनाव में ट्रंप को कितना बड़ा झटका लगा?
उपलब्ध कराए गए चुनावी आंकड़ों के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट में 54 और प्रतिनिधि सभा में 231 सीटें हासिल की हैं। सीनेट में बहुमत के लिए 51 सीटों की जरूरत होती है, जबकि प्रतिनिधि सभा में 218 सीटें चाहिए होती हैं। इस हिसाब से डेमोक्रेट्स ने दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है।
इस बदलाव का सीधा मतलब है कि अब कांग्रेस के फैसलों में डेमोक्रेटिक पार्टी की भूमिका बढ़ जाएगी। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी पहले की तरह अपने दम पर विधेयक आगे नहीं बढ़ा सकेगी। हालांकि, चुनाव के बाद बनी नई कांग्रेस का कार्यकाल 3 जनवरी 2027 से शुरू होगा। यानी नए सदस्यों के पद संभालने के बाद ही सदनों के नेतृत्व और नियंत्रण में बदलाव प्रभावी होगा।
अमेरिकी राजनीति में इसे 'डिवाइडेड गवर्नमेंट' कहा जाता है। इसका मतलब ऐसी स्थिति से है, जिसमें राष्ट्रपति एक पार्टी का होता है, लेकिन कांग्रेस के एक या दोनों सदनों पर दूसरी पार्टी का नियंत्रण होता है।
ट्रंप राष्ट्रपति बने रहेंगे, फिर उनकी मुश्किल क्या है?
इस सवाल को एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए ट्रंप अमेरिका में कोई नया टैक्स कानून लागू करना चाहते हैं। इसके लिए सामान्य तौर पर उनकी सरकार को विधेयक कांग्रेस से पारित कराना होगा। यदि कांग्रेस के दोनों सदनों में विपक्ष का बहुमत है, तो वह विधेयक रोक सकता है या उसमें बदलाव की मांग कर सकता है।
अब ट्रंप के सामने यही चुनौती होगी। राष्ट्रपति होने के नाते वह सरकार के प्रमुख रहेंगे, लेकिन नए कानून बनाने के लिए उन्हें डेमोक्रेट्स के साथ समझौता करना पड़ सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रंप के सारे अधिकार खत्म हो जाएंगे। वह कार्यकारी आदेश जारी कर सकते हैं। विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी प्रशासन से जुड़े कई फैसले भी उनके अधिकार क्षेत्र में बने रहेंगे।
फर्क सिर्फ इतना होगा कि जहां कांग्रेस की मंजूरी जरूरी है, वहां ट्रंप के लिए काम पहले से मुश्किल हो सकता है।
अमेरिकी सरकार में अब क्या-क्या बदल जाएगा?
कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से सबसे पहले दोनों सदनों के नेतृत्व में बदलाव आएगा। प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स अपना स्पीकर चुन सकेंगे, जबकि सीनेट में उनका मेजॉरिटी लीडर होगा। इसके बाद संसदीय समितियों के नेतृत्व में भी बदलाव होगा। ये समितियां सरकारी विभागों, बजट, रक्षा, व्यापार और विदेश नीति से जुड़े मामलों की निगरानी करती हैं।
इसका मतलब है कि अब डेमोक्रेट्स यह तय करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे कि किन मुद्दों पर संसद में चर्चा होगी, किन प्रस्तावों को आगे बढ़ाया जाएगा और किन सरकारी फैसलों की जांच की जाएगी।
लेकिन यह समझना जरूरी है कि अमेरिकी कांग्रेस सिर्फ राष्ट्रपति के फैसलों पर मुहर लगाने वाली संस्था नहीं है। उसके अपने संवैधानिक अधिकार हैं। इसलिए दोनों सदनों पर विपक्ष का नियंत्रण राष्ट्रपति के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
क्या ट्रंप के नए कानूनों पर ब्रेक लग जाएगा?
ट्रंप प्रशासन के लिए यह सबसे बड़ी परेशानी हो सकती है। अगर राष्ट्रपति कोई नया कानून बनाना चाहते हैं, तो सामान्य तौर पर उसे प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों से पारित होना पड़ता है।
मान लीजिए ट्रंप आव्रजन नियमों को और सख्त बनाने के लिए नया कानून लाना चाहते हैं। डेमोक्रेट्स उस कानून का विरोध कर सकते हैं। अगर उनके सदस्य प्रस्ताव के पक्ष में मतदान नहीं करते, तो विधेयक पारित नहीं हो पाएगा।
यही स्थिति टैक्स, सरकारी खर्च और दूसरी नीतियों पर भी बन सकती है। हालांकि, हर मामले में डेमोक्रेट्स का विरोध तय नहीं है। जिन मुद्दों पर दोनों पार्टियों की राय मिलती है, वहां कानून पारित हो सकते हैं।
अमेरिकी सीनेट में एक और व्यवस्था है। अधिकांश सामान्य विधेयकों पर बहस समाप्त कर मतदान तक पहुंचने के लिए 60 सीनेटरों का समर्थन जरूरी हो सकता है। इसलिए 54 सीटें होने के बावजूद डेमोक्रेट्स भी हर विधेयक आसानी से पारित नहीं करा पाएंगे। यानी नए राजनीतिक समीकरण में दोनों पार्टियों को एक-दूसरे के सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।
राष्ट्रपति के पास वीटो पावर, आखिर यह क्या होती है?
अमेरिकी राष्ट्रपति के पास वीटो का अधिकार होता है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि कांग्रेस कोई विधेयक पारित करके राष्ट्रपति के पास भेजती है और राष्ट्रपति उसे मंजूरी देने से इनकार कर सकता है।
मान लीजिए डेमोक्रेट्स अपने बहुमत के आधार पर कोई कानून पारित कराते हैं, लेकिन ट्रंप उससे सहमत नहीं हैं। ऐसी स्थिति में वह उस विधेयक पर वीटो लगा सकते हैं।
हालांकि, कांग्रेस भी राष्ट्रपति के वीटो को खारिज कर सकती है। इसके लिए प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। इसलिए सिर्फ साधारण बहुमत के आधार पर राष्ट्रपति के वीटो को नहीं हटाया जा सकता।
इससे साफ है कि कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने के बावजूद ट्रंप पूरी तरह कमजोर नहीं होंगे। उनके पास कई फैसलों को रोकने और विपक्ष के साथ समझौते की शर्तें तय करने की ताकत बनी रहेगी।
सीनेट में बहुमत खोने से ट्रंप को क्या नुकसान होगा?
सीनेट का नियंत्रण बदलना ट्रंप के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। अमेरिका में कई बड़े सरकारी पदों पर नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति उम्मीदवार का नाम प्रस्तावित करते हैं, लेकिन अंतिम पुष्टि सीनेट करती है। इन पदों में कैबिनेट के कई वरिष्ठ अधिकारी, संघीय न्यायाधीश और अन्य महत्वपूर्ण अधिकारी शामिल हैं। अगर डेमोक्रेट्स किसी उम्मीदवार से सहमत नहीं हैं, तो वे उसकी नियुक्ति का विरोध कर सकते हैं।
मान लीजिए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में किसी न्यायाधीश का पद खाली होता है। राष्ट्रपति ट्रंप किसी व्यक्ति को उस पद के लिए नामित करते हैं। लेकिन नियुक्ति के लिए सीनेट का समर्थन जरूरी होगा। ऐसी स्थिति में डेमोक्रेट्स के पास नामांकन रोकने की ताकत हो सकती है।
इसका असर ट्रंप की प्रशासनिक टीम बनाने और न्यायिक नियुक्तियां कराने की रणनीति पर पड़ेगा। हालांकि, सभी सरकारी पदों के लिए सीनेट की मंजूरी जरूरी नहीं होती।
क्या डेमोक्रेट्स ट्रंप प्रशासन की जांच शुरू कर सकते हैं?
हां, कांग्रेस की समितियों को सरकार के कामकाज की निगरानी करने का अधिकार है। प्रतिनिधि सभा और सीनेट में बहुमत मिलने के बाद डेमोक्रेट्स विभिन्न सरकारी फैसलों की समीक्षा और जांच के लिए सुनवाई कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, अगर किसी सरकारी योजना में धन खर्च करने के तरीके पर सवाल उठते हैं, तो संबंधित समिति अधिकारियों से जवाब मांग सकती है। दस्तावेजों की मांग की जा सकती है और अधिकारियों को सुनवाई में बुलाया जा सकता है।
इससे ट्रंप प्रशासन पर राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, संसदीय जांच का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध साबित हो गया है। जांच और कानूनी कार्रवाई की प्रक्रियाएं अलग होती हैं।
क्या ट्रंप के खिलाफ महाभियोग भी आ सकता है?
अमेरिका में राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए महाभियोग की संवैधानिक व्यवस्था है। हालांकि, इसकी प्रक्रिया सामान्य राजनीतिक विरोध से अलग है।
सबसे पहले प्रतिनिधि सभा में साधारण बहुमत से महाभियोग के आरोप पारित किए जा सकते हैं। इसके बाद मामला सीनेट में जाता है। राष्ट्रपति को दोषी ठहराने और पद से हटाने के लिए सीनेट में उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई वोट जरूरी होते हैं।
यदि सभी 100 सीनेटर मतदान में शामिल हों, तो इसके लिए कम से कम 67 वोट चाहिए होंगे। इसीलिए डेमोक्रेट्स के पास सीनेट में 54 सीटें होने के बावजूद राष्ट्रपति को हटाना आसान नहीं होगा।
इसके अलावा महाभियोग के लिए गंभीर संवैधानिक आधार होना चाहिए। केवल चुनाव में पार्टी की हार या राष्ट्रपति की नीतियों से असहमति पर्याप्त नहीं है। यानी डेमोक्रेट्स के बहुमत से ट्रंप पर राजनीतिक निगरानी बढ़ सकती है, लेकिन उन्हें राष्ट्रपति पद से हटाना अलग और कहीं ज्यादा कठिन प्रक्रिया है।
क्या अमेरिका में सरकारी कामकाज ठप हो सकता है?
अमेरिका में सरकारी विभागों के खर्च के लिए कांग्रेस से बजट की मंजूरी जरूरी होती है। यदि कांग्रेस और राष्ट्रपति के बीच फंडिंग को लेकर समझौता नहीं होता, तो कुछ संघीय विभागों के कामकाज पर असर पड़ सकता है। इसे गवर्नमेंट शटडाउन कहा जाता है। हालांकि, इसका मतलब पूरे अमेरिका का बंद हो जाना नहीं है। फंडिंग से प्रभावित कुछ सरकारी सेवाएं बंद या सीमित हो सकती हैं, जबकि जरूरी सेवाएं संबंधित नियमों के अनुसार जारी रह सकती हैं।
अब कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने से बजट और सरकारी खर्च की प्राथमिकताओं पर दोनों पार्टियों के बीच मतभेद सामने आ सकते हैं। हालांकि, ऐसा होना तय नहीं है। दोनों पक्ष आपसी सहमति से बजट पारित कर सकते हैं। इसलिए यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ट्रंप और डेमोक्रेट्स बातचीत के जरिए किस हद तक समझौता कर पाते हैं।
अब भारत पर आते हैं, ट्रंप की हार से हमें क्या फर्क पड़ेगा?
अमेरिका में सरकार चलाने का राजनीतिक समीकरण बदलना भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसकी वजह दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक, रक्षा और आर्थिक संबंध हैं।
अमेरिका भारतीय सामानों और सेवाओं का बड़ा बाजार है। भारतीय आईटी कंपनियों का अमेरिकी ग्राहकों से गहरा संबंध है। बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अमेरिका में काम करते हैं। इसके अलावा अमेरिका की विदेश नीति और वैश्विक तेल बाजार में होने वाले बदलाव भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए। डेमोक्रेट्स की जीत का मतलब यह नहीं है कि भारत को तुरंत फायदा होगा या ट्रंप की सभी नीतियां बदल जाएंगी।
असल असर इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति और कांग्रेस व्यापार, वीजा, रक्षा तथा विदेश नीति पर आगे क्या फैसले लेते हैं।
भारत के लिए पहला सवाल, क्या अमेरिकी टैरिफ कम होंगे?
टैरिफ का मतलब किसी दूसरे देश से आयात किए गए सामान पर लगाया जाने वाला शुल्क होता है। मान लीजिए भारत की कोई कंपनी अमेरिका में 100 डॉलर का सामान बेचती है। यदि अमेरिका उस पर 25 फीसदी आयात शुल्क लगाता है, तो अमेरिकी आयातक को 25 डॉलर अतिरिक्त शुल्क चुकाना पड़ सकता है। इससे अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान महंगा हो सकता है। इसका असर उसकी मांग और भारतीय निर्यातकों की कमाई पर पड़ सकता है।
ट्रंप की टैरिफ नीति को लेकर अमेरिका में राजनीतिक बहस रही है। अब कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने से इस नीति पर संसदीय निगरानी बढ़ सकती है। डेमोक्रेट्स व्यापारिक शुल्कों के असर पर सवाल उठा सकते हैं और कानूनों में बदलाव की कोशिश कर सकते हैं।
हालांकि, टैरिफ लगाने के कुछ अधिकार राष्ट्रपति को मौजूदा कानूनों के तहत मिले हैं। इसलिए कांग्रेस का नियंत्रण बदलने से पहले से लागू शुल्क अपने आप खत्म नहीं होंगे। भारत को वास्तविक राहत तभी मिलेगी, जब अमेरिका शुल्क घटाने या व्यापारिक नियमों में बदलाव का फैसला करेगा।
क्या भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर असर पड़ेगा?
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर होने वाली बातचीत दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत चाहता है कि उसके सामान को अमेरिकी बाजार में बेहतर अवसर मिलें। वहीं अमेरिका अपने उत्पादों और कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में अधिक पहुंच चाहता है।
डेमोक्रेट्स का कांग्रेस में बहुमत होने से व्यापार नीति को लेकर नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं। कुछ प्रस्तावों पर ज्यादा सवाल पूछे जा सकते हैं, जबकि कुछ मामलों में समझौते की संभावना भी बन सकती है। हालांकि, व्यापार समझौते पर बातचीत करने में अमेरिकी प्रशासन की प्रमुख भूमिका रहती है। कांग्रेस की मंजूरी की जरूरत समझौते के कानूनी स्वरूप पर निर्भर करती है।
इसलिए यह मान लेना सही नहीं होगा कि डेमोक्रेट्स के आने से भारत-अमेरिका व्यापार समझौता तुरंत हो जाएगा या रुक जाएगा। भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात होगी कि समझौते में भारतीय निर्यातकों को कितनी राहत मिलती है और दोनों देशों के व्यापारिक विवाद किस हद तक कम होते हैं।
H-1B वीजा पर क्या असर होगा, क्या भारतीयों को राहत मिलेगी?
अमेरिका में नौकरी करने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए H-1B वीजा महत्वपूर्ण है। इसके जरिए अमेरिकी कंपनियां विशेष योग्यता वाले विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर सकती हैं।
भारतीय आईटी और तकनीकी पेशेवर इस व्यवस्था का बड़े स्तर पर इस्तेमाल करते हैं। इसलिए अमेरिकी आव्रजन नियमों में बदलाव का असर भारतीय कर्मचारियों और कंपनियों दोनों पर पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन की आव्रजन नीति को लेकर अलग-अलग प्रस्ताव और फैसले चर्चा में रहे हैं। अब कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के बहुमत से कुछ नए आव्रजन कानूनों की दिशा प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, वीजा से जुड़े सभी नियम कांग्रेस के जरिए तय नहीं होते। कुछ फैसले कार्यकारी अधिकारों और संबंधित सरकारी एजेंसियों के तहत भी लिए जाते हैं।
इसलिए केवल मिडटर्म चुनाव के नतीजों से H-1B वीजा नियम अपने आप आसान नहीं होंगे। लेकिन यदि भविष्य में फीस, पात्रता या दूसरी शर्तों में राहत मिलती है, तो भारतीय पेशेवरों और कंपनियों को फायदा हो सकता है।
भारतीय आईटी कंपनियों को फायदा होगा या नुकसान?
भारत की कई बड़ी आईटी कंपनियों की कमाई का महत्वपूर्ण हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है। अमेरिका की कंपनियां सॉफ्टवेयर, तकनीकी सहायता, डेटा प्रबंधन और अन्य सेवाओं के लिए भारतीय कंपनियों की मदद लेती हैं।
अगर अमेरिका में वीजा नियम आसान होते हैं, तो भारतीय कंपनियों के लिए कर्मचारियों को अमेरिकी प्रोजेक्ट पर भेजना सुविधाजनक हो सकता है। लेकिन अगर विदेशी कर्मचारियों पर सख्ती बनी रहती है या नियुक्ति से जुड़ी लागत बढ़ती है, तो कंपनियों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है।
इसके अलावा अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी। यदि अमेरिकी कंपनियां तकनीक पर खर्च बढ़ाती हैं, तो भारतीय आईटी क्षेत्र को कारोबार के नए अवसर मिल सकते हैं। यानी आईटी कंपनियों के लिए डेमोक्रेट्स की जीत अपने आप फायदे की गारंटी नहीं है। उन्हें वास्तविक लाभ अमेरिकी व्यापारिक मांग और आव्रजन नीति में होने वाले बदलावों से मिलेगा।
क्या ईरान से तनाव कम होगा और भारत को सस्ता तेल मिलेगा?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव या तेल की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक कीमतों पर असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में अमेरिका की विदेश नीति भारत के लिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के बहुमत से अमेरिकी सैन्य खर्च और विदेश नीति पर निगरानी बढ़ सकती है। वे किसी सैन्य कार्रवाई के उद्देश्य, खर्च और परिणामों पर सवाल उठा सकते हैं। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति सेना के कमांडर-इन-चीफ होते हैं। विदेश नीति और सैन्य संचालन में उनके पास महत्वपूर्ण शक्तियां होती हैं। इसलिए कांग्रेस में डेमोक्रेट्स के आने से ईरान के साथ तनाव तुरंत खत्म हो जाएगा, ऐसा कहना सही नहीं होगा।
अगर पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है और तेल की आपूर्ति सामान्य रहती है, तो कीमतों पर दबाव घट सकता है। इससे भारत को राहत मिल सकती है। हालांकि, कीमतें वैश्विक मांग और उत्पादन जैसे दूसरे कारणों पर भी निर्भर करती हैं।
भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?
भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग कई वर्षों से बढ़ रहा है। दोनों देश सैन्य अभ्यास, रक्षा तकनीक, समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग करते हैं। अमेरिकी कांग्रेस रक्षा बजट और कुछ रक्षा सौदों की निगरानी में भूमिका निभाती है। इसलिए कांग्रेस में नियंत्रण बदलने से कुछ प्रस्तावों की समीक्षा और मंजूरी की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, भारत-अमेरिका रक्षा संबंध केवल किसी एक राष्ट्रपति या पार्टी पर निर्भर नहीं हैं। दोनों देशों के बीच हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा, चीन से जुड़ी रणनीतिक चुनौतियों और तकनीकी सहयोग जैसे साझा हित हैं।
इसी वजह से अमेरिका में राजनीतिक बदलाव के बावजूद भारत के साथ रक्षा साझेदारी जारी रहने के महत्वपूर्ण आधार मौजूद हैं। हालांकि, किसी विशेष रक्षा सौदे की मंजूरी, फंडिंग या तकनीकी हस्तांतरण की शर्तों पर नए राजनीतिक समीकरणों का असर पड़ सकता है।
क्या भारतीय शेयर बाजार और रुपए पर भी असर होगा?
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। वहां की ब्याज दरें, सरकारी खर्च और आर्थिक नीतियां अंतरराष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित करती हैं। यदि ट्रंप और कांग्रेस के बीच बड़े आर्थिक फैसलों को लेकर गतिरोध बढ़ता है, तो निवेशकों के बीच अनिश्चितता पैदा हो सकती है। इसका असर डॉलर, अमेरिकी शेयर बाजार और दूसरे देशों के बाजारों पर भी दिखाई दे सकता है।
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश की बड़ी भूमिका है। अमेरिकी आर्थिक परिस्थितियों के कारण विदेशी निवेशक अपने निवेश में बदलाव करते हैं, तो भारतीय बाजार और रुपए की विनिमय दर प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, शेयर बाजार में किसी एक घटना के कारण तेजी या गिरावट तय नहीं होती। कंपनियों के नतीजे, ब्याज दरें, महंगाई और घरेलू आर्थिक स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए अमेरिकी चुनाव भारत के वित्तीय बाजारों के लिए महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन इससे बाजार की दिशा का निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
आखिर अगले दो साल ट्रंप सरकार कैसे चलाएंगे?
डेमोक्रेट्स के कांग्रेस में बहुमत होने के बाद ट्रंप के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती विपक्ष के साथ काम करने की होगी। उन्हें कई बड़े कानूनों और बजट प्रस्तावों के लिए डेमोक्रेट्स का समर्थन जुटाना पड़ सकता है। हालांकि, ट्रंप के पास राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियां बनी रहेंगी। वह मौजूदा कानूनों के तहत प्रशासनिक फैसले ले सकते हैं और कांग्रेस से पारित कुछ विधेयकों पर वीटो भी लगा सकते हैं।
इसलिए अगले दो साल अमेरिकी राजनीति में दो तरह की स्थितियां देखने को मिल सकती हैं। पहली, दोनों पार्टियां समझौते के जरिए कानून और बजट पारित करें। दूसरी, राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच टकराव बढ़े, जिससे महत्वपूर्ण फैसलों में देरी हो।
इसका असर अमेरिका की घरेलू राजनीति के साथ उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ सकता है।
कुल मिलाकर ट्रंप की हार के क्या मायने हैं, भारत को क्या मिलेगा?
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मिली हार का सबसे बड़ा मतलब कांग्रेस में राजनीतिक शक्ति का बदलना है। राष्ट्रपति ट्रंप पद पर बने रहेंगे, लेकिन अब उनकी सरकार के सामने ऐसा विपक्ष होगा, जिसके पास दोनों सदनों में बहुमत है।
इससे नए कानूनों, महत्वपूर्ण नियुक्तियों और सरकारी बजट के मामलों में डेमोक्रेट्स की भूमिका बढ़ जाएगी। प्रशासन की संसदीय जांच और निगरानी भी बढ़ सकती है। हालांकि, राष्ट्रपति के कार्यकारी अधिकार और वीटो की शक्ति बनी रहेगी।
भारत के लिए इस बदलाव का परिणाम अभी सीधे तौर पर फायदा या नुकसान नहीं कहा जा सकता। यदि टैरिफ कम होते हैं, तो भारतीय निर्यातकों को राहत मिल सकती है। एच-1बी वीजा नियम (H-1B Visa Rule) आसान होते हैं, तो भारतीय पेशेवरों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं। वहीं पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से तेल की कीमतें घटती हैं, तो भारत का आयात बिल कम हो सकता है। लेकिन इन सभी संभावनाओं का वास्तविक असर भविष्य के फैसलों पर निर्भर करेगा।
सबसे अहम बात यह है कि अमेरिका में राष्ट्रपति नहीं बदला है, बल्कि उसे कानून बनाने और सरकार चलाने में मिलने वाले राजनीतिक समर्थन का समीकरण बदल गया है। अब ट्रंप के अगले दो साल इस बात से तय होंगे कि वह डेमोक्रेट्स के साथ समझौता करते हैं या दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ता है। भारत के लिए भी इसी दौरान होने वाले व्यापारिक, आर्थिक और विदेश नीति के फैसले सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे।