बोल हरि बोल: साहब और सिंघल की जोड़ी हिट, इधर मैडम को चाहिए चमाट मार असिस्टेंट!
मध्यप्रदेश की सियासत और अफसरशाही अंदरखाने की हलचल से गर्म है। कहीं जुगलबंदी सुर्खियां बटोर रही है तो कहीं फैसलों के पीछे छिपी कहानियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं। अफसरों की कार्यशैली, नेताओं की नजदीकियां और सिस्टम के भीतर चल रही हलचल मिलकर ऐसा माहौल बना रही हैं, जहां हर छोटी-बड़ी बात पूरी भैरंट कहानी बनकर सामने आ रही है।
चलिए, आप तो सीधे मुद्दे पर आइए और पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के वो किस्से, जो खुलकर नहीं बोले जाते, लेकिन फिजा में तैर रहे होते हैं।
नौशाद की विदाई, जावेद का नंबर कब?
दिल्ली से लेकर मध्यप्रदेश के पावर कॉरिडोर तक इन दिनों नौशाद की खूब चर्चा है। सरकारी सिस्टम में बड़े ठेकों की सेटिंग और मैनेजमेंट के लिए मशहूर नौशाद की अचानक रवानगी हो गई है। अंदरखाने की खबरों के अनुसार यह फैसला लोकल स्तर का नहीं, बल्कि सीधे दिल्ली से तय हुआ है।
खास बात यह कि नौशाद एक ताकतवर मंत्री का बेहद भरोसेमंद चेहरा रहा है। जब मंत्री ने पाला बदला और कांग्रेस से बीजेपी में एंट्री ली तो नौशाद भी उसी राह पर चल पड़ा था। यानी नौशाद कमलनाथ सरकार से लेकर अब तक वह कई बड़े प्रोजेक्ट्स में अहम रोल निभाता रहा। अब वह सिस्टम से बाहर हो गया है।
लिहाजा, अब निशाना जावेद पर आ टिका है। जावेद भी एक मंत्री का खासमखास है। विभाग के ज्यादातर काम उसी के इशारों पर होते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अगला नंबर जावेद का है या फिर वह अपनी पकड़ बचाने में कामयाब रहेगा?
क्या स्टील फ्रेम से रबर फ्रेम हो गए आईएएस?
क्या अब IAS स्टील फ्रेम से रबर फ्रेम हो गए हैं? ये सवाल हम नहीं पूछ रहे, बल्कि ये सवाल मध्यप्रदेश कैडर के युवा आईएएस अपने बैचमेट के ग्रुप्स में उठा रहे हैं। वे मध्य प्रदेश आईएएस एसोसिएशन के रवैए को लेकर हताश और निराश हैं।
दरअसल, पहले भिंड कलेक्टर के साथ बीजेपी विधायक ने झगड़ा किया। फिर जबलपुर स्मार्ट सिटी सीईओ के साथ मंत्री ने बदसलूकी की। इसके बाद भी आईएएस एसोसिएशन आईएएस अफसरों के पक्ष में ताकत से खड़ा नहीं हुआ। अब युवा आईएएस अपनी ही एसोसिएशन के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं।
आपको बता दें कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने 21 अप्रैल 1947 को नई दिल्ली में IAS (भारतीय प्रशासनिक सेवा) को स्टील फ्रेम (Steel Frame of India) कहा था। पटेल ने यह बात मेटकाफ हाउस (Metcalf House) में प्रशासनिक अफसरों को संबोधित करते हुए कही थी।
माना भी जाता है कि आईएएस जो चाहें वो कर सकते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश में जिस तरह से हालिया घटनाक्रमों पर अफसरों का संगठन दूसरी करवट बैठा है, उसके कई मायने निकाले जा रहे हैं।
साहब और सिंघल की जोड़ी बेमिसाल...
इन दिनों सिस्टम में सचिव स्तर के एक अफसर और उनके ऑल-इन-वन कंसल्टेंट का काम खूब सुर्खियां बटोर रहा है। विभाग के बड़े ठेके, सप्लाई टेंडर से लेकर सेटिंग तक का पूरा खेल सीधे सिंघल नाम के कंसल्टेंट के दरबार में तय हो रहा है। अब तो ठेकेदारों ने भी रास्ता बदल लिया है। पहले फाइल लेकर साहब के कमरे के बाहर खड़ा होना पड़ता था, अब सीधे कंसल्टेंट के पास दस्तक होती है। आप यकीन मानिए, सिंघल ने हरी झंडी दे दी तो साहब की मुहर भी अपने आप लग जाती है।
बताया जा रहा है कि लंबे समय तक साइड लाइन रहे साहब जब से मुख्यधारा में लौटे हैं तो उनकी प्राथमिकताएं बदल गईं हैं। अब वे हर फाइल में स्कोप तलाशते हैं। ऊपर से साहब के कुछ निजी शौक भी हैं, जिनका ख्याल रखने की जिम्मेदारी भी कंसल्टेंट ने ही उठा रखी है। बदले में साहब भी कंसल्टेंट को खुला मैदान दे रहे हैं। अब सिस्टम में यह जोड़ी नई पावर डुओ के तौर पर देखी जा रही है और हर सौदे का रास्ता उसी दरवाजे से होकर गुजर रहा है।
मैडम को चाहिए चमाटमार असिस्टेंट!
सूबे की एक अपर कलेक्टर मैडम की पोस्ट सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है। अंदरखाने की चर्चा यही है कि इस पोस्ट को खुद मैडम ने वायरल करवाया है। पोस्ट में लिखा है कि उन्हें एक ऐसे असिस्टेंट की तलाश है, जो उनके इशारे पर सामने वाले को दो चमाट रसीद कर सके।
अब मामला क्या है, मैडम किससे परेशान हैं और आखिर उन्हें ऐसे असिस्टेंट की जरूरत क्यों पड़ रही है… ये सवाल हर किसी के मन में घूम रहे हैं। इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं, सिवाय मैडम के, लेकिन इतना तय है कि मैडम की यह पोस्ट अफसरशाही के गलियारों में सुर्खियां बटोर रही है। लोग मुस्कुरा भी रहे हैं और इशारों में इस पोस्ट के मायने भी निकाल रहे हैं। अब देखना है कि वरिष्ठ अधिकारियों की मैडम पर नजर पड़ती है या मैडम अपने चमाटमार असिस्टेंट को खोजने में सफल हो पाती हैं।
मैडम की निडरता तो कमाल है...
राज्य प्रशासनिक सेवा की एक महिला अफसर इन दिनों अपने निडर अंदाज को लेकर चर्चाओं में हैं। मैडम जिलों के उपार्जन केंद्रों पर औचक निरीक्षण के नाम पर पहुंच रही हैं और वहीं गेहूं के बोरों में नोट भरने की कहानी सुर्खियां बटोर रही हैं। उनके साथ एक भरोसेमंद सहायक भी रहता है, जो पूरा लेन-देन संभालता है।
दिलचस्प यह है कि यह सब उस वक्त हो रहा बताया जा रहा है, जब सूबे के मुखिया खुद गेहूं उपार्जन व्यवस्था पर नजर रखने के लिए निरीक्षण कर रहे हैं। इसके बावजूद मैडम का अंदाज जरा भी डगमगाता नहीं दिख रहा। न कोई हिचक, न कोई डर… बस अपने तरीके से काम जारी है।
अब सवाल यही है कि इतनी खुली चर्चा के बावजूद मैडम बेखौफ कैसे हैं? क्या सिस्टम में सबकुछ जानकर भी अनदेखा किया जा रहा है या फिर मामला कहीं और सेट है? फिलहाल अफसरशाही के गलियारों में यह किस्सा तेजी से तैर रहा है और उपार्जन केंद्र अब सिर्फ अनाज नहीं, चर्चाओं का भी केंद्र बन गए हैं।
ये जुगलबंदी भी खूब जमेगी?
सूबे में गेहूं खरीदी को लेकर मचे घमासान के बीच अब नई सियासी जुगलबंदी चर्चा में है। जी हां, मामा और भैया की जोड़ी कुछ बड़ा करने वाली है। खबर है कि शिवराज मामा और मोहन भैया इंदौर में साथ बैठकर खेती से जुड़े मुद्दों और ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन की तैयारियों पर मंथन करेंगे।
दिलचस्प यह है कि दोनों ही नेता इन दिनों किसानों के हित में बड़े फैसलों की बात कर रहे हैं। बयान अलग-अलग मंचों से आ रहे हैं, लेकिन सुर एक जैसे हैं। ऐसे में खेत-खलिहान से लेकर मंडियों तक एक ही सवाल तैर रहा है कि आखिर किसानों का असली मसीहा कौन है?
अब राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को ताकत के संतुलन के तौर पर देखा जा रहा है। साथ-साथ वाली यह तस्वीर क्या संदेश देगी, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं। फिलहाल, मामा-भैया की इस जुगलबंदी ने माहौल में नई उत्सुकता घोल दी है।
सरकारी आवास और कम्फर्ट कॉलोनी?
ऊर्जाधानी जिले में इन दिनों सरकारी आवास को लेकर दो तस्वीरें आमने-सामने हैं। एक तरफ कलेक्टर साहब हैं, जिन्होंने आते ही कॉर्पोरेशन का आरामदायक ठिकाना छोड़कर सरकारी बंगले में शिफ्ट होने का फैसला किया है। पद संभालते ही उन्होंने सालों से खाली पड़े बंगले का निरीक्षण किया और साफ कहा कि मरम्मत कराइए, मैं यहीं रहूंगा।
दूसरी तरफ कमिश्नर मैडम हैं, जो कॉलोनी के आलीशान आवास में ठहरी हैं। हालांकि यह कोई नियम विरुद्ध नहीं है, लेकिन इसे लेकर शहर में हल्की-फुल्की चर्चा तैर रही है। स्थानीय कर्मचारी और आमजन कह रहे हैं कि यदि अफसर शहर के बीच सरकारी आवास में रहें, तो काम की मॉनिटरिंग और जनता से संवाद दोनों आसान हो जाते हैं। इस तरह कलेक्टर साहब के फैसले को सराहा जा रहा है।
अब एक ही जिले में दो अलग-अलग अंदाज सामने हैं। एक सरकारी बंगला अपनाने का और दूसरा कॉलोनी कंफर्ट बनाए रखने का। किसका तरीका बेहतर है, इसका फैसला तो वक्त करेगा, लेकिन फिलहाल यह फर्क गॉसिप बना हुआ है।
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