बोल हरि बोल: दीवारों के कान, अफसरों की जुबान और मंत्रालय की मुस्कान...चाय से ज्यादा केतली भी गर्म है!
BHOPAL. मध्य प्रदेश के मंत्रालय और सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक ही डर सबसे ज्यादा घूम रहा है। कहीं कुछ बोल दिया तो कहीं मीडिया में सुर्खियां न बन जाएं। हालात ऐसे हैं कि बड़े-बड़े अफसर अब बैठकों में शब्दों को ऐसे तौल रहे हैं, जैसे सुनार सोना तौलता है। कोई फाइल से ज्यादा मीडिया से डर रहा है तो कोई अपने ही स्टाफ से परेशान है।
उधर, होम डिपार्टमेंट में नरम-गरम मिजाज की मैडम की चर्चा है, तो इधर बायपास की जमीन ने अफसर बिरादरी में नई बहस छेड़ दी है। कुल मिलाकर सत्ता के गलियारों में सब कुछ शांत दिख जरूर रहा है, लेकिन भीतर बहुत कुछ धीरे-धीरे बोल रहा है… ताकि कोई सुन न ले।
खैर, देश-प्रदेश में खबरें तो और भी बहुत हैं, आप तो सीधे नीचे उतर आईए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
चाय से ज्यादा केतली गर्म है भाई!
खाकी के सिखाने वाले विभाग में आए नए साहब इन दिनों कम, उनके शागिर्द ज्यादा चर्चा में हैं। साहब तो सरल स्वभाव के हैं, लेकिन उनके साथ आए दो खास मातहतों ने आते ही ऐसा माहौल बना दिया है कि दफ्तर में हर कोई कदम फूंक-फूंककर रख रहा है। हाल यह है कि जहां साहब का नाम बाद में आता है, वहां पहले उनके चहेतों की चर्चा शुरू हो जाती है।
कहा जा रहा है कि दोनों मातहत खुद को विभाग का अनौपचारिक दरबान मान बैठे हैं। कौन साहब से मिलेगा, कौन कितनी देर बैठेगा यह सब अब उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमता है। कई लोग तो मजाक में कह रहे हैं कि यहां चाय से ज्यादा केतली गर्म है। दफ्तर के गलियारों में फुसफुसाहट है कि असली सतर्कता अब साहब से नहीं, बल्कि उनके इन शागिर्दों से बरतनी पड़ रही है। क्योंकि उनका रौब ऐसा है कि बड़े-बड़े लोग भी सामने पड़ते ही आवाज धीमी कर लेते हैं।
सिंह साहब द ग्रेट हैं जी...
वर्दी वाले महकमे के सिंह साहब द ग्रेट इन दिनों फिर सुर्खियों में हैं। जहां भी उनकी पोस्टिंग होती है, वहां सिर्फ कुर्सी नहीं बदलती, पूरा माहौल बदल जाता है। पहले वाले विभाग में वे सनातन की अलख जगाने में जुटे थे, अब नए विभाग में पहुंचते ही जवानों को गीता पाठ का संदेश देने लगे हैं। साहब का अंदाज भी ऐसा कि आदेश कम, प्रवचन ज्यादा लगता है। महकमे में चर्चा है कि सिंह साहब अपनी अलग पहचान बनाने में माहिर हैं।
यही वजह है कि उनके हर निर्देश पर लोग कान खड़े करके नजर रखते हैं। कुछ लोग इसे अनुशासन और संस्कार से जोड़ रहे हैं, तो कुछ इसे साहब की विशेष कार्यशैली बता रहे हैं। वैसे, यह पहली बार नहीं है जब सिंह साहब चर्चा में आए हों। इससे पहले भी उनके एक अतरंगी आदेश ने ऐसा बवाल मचाया था कि मामला प्रदेश से निकलकर देशभर की बहस बन गया था। अब नए विभाग में उनका नया अध्याय शुरू हो चुका है और गलियारों में चर्चा भी।
धीरे-धीरे बोल… कोई सुन न ले!
धीरे-धीरे बोल कोई सुन न ले… वाला गाना इन दिनों मंत्रालय की बैठकों का अनऑफिशियल थीम सॉन्ग बन गया है। खासकर एक आईएएस मैडम तो इतनी सतर्क हो गई हैं कि बोलने से पहले चारों तरफ ऐसे देखती हैं जैसे कमरे में कैमरे नहीं, रिपोर्टर बैठे हों।
हाल ही में मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में पीएचई के रीऑर्गेनाइजेशन पर मैडम कुछ परेशानियां बताना चाहती थीं, लेकिन डर इतना था कि आखिर में सिर्फ इतना ही बोलीं, मैं कुछ नहीं बोलूंगी… नहीं तो मीडिया में छप जाएगा।
बड़े साहब ने भी दर्द साझा किया और बोले कि कैबिनेट की बातें तो बाहर आने से रोक दी गईं, लेकिन अफसरों की बैठकों की खबरें लगातार बाहर आ रही हैं। इस पर सूबे के मुखिया ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली। जो हम छपवाना चाहते हैं वो छपता नहीं… और जो नहीं छपना चाहिए, वही छप जाता है। अब कौन समझाए साहब लोगों को कि मंत्रालय की दीवारें सिर्फ रंगी-पुती नहीं होतीं… उनके कान भी होते हैं।
होम में नरम-गरम मैडम
होम डिपार्टमेंट हमेशा किसी न किसी वजह से चर्चा में रहता. है। इस बार वजह बनी हैं दो खास सहेली मैडम- एक नरम, दूसरी गरम। हालात ये हैं कि विभाग का छोटा कर्मचारी हो या बड़ा अफसर, सब नरम मैडम के कमरे तक तो आराम से पहुंच जाते हैं, लेकिन गरम मैडम के आसपास फटकने से भी बचते हैं।
वैसे भी होम की हॉट सीट लंबे समय से लोगों को डरा रही थी। जिसका नाम आया, वो या तो लंबी छुट्टी पर चला गया या दूरी बना गया। बड़ी मुश्किल से पंडितजी ने कमान संभाली है, लेकिन अब उन्हें विभागीय फाइलों से ज्यादा इन दोनों मैडमों के मिजाज का बैलेंस बैठाना पड़ रहा है। अब देखना दिलचस्प होगा कि साहब होम डिपार्टमेंट संभालते हैं या होम डिपार्टमेंट साहब को संभालता है।
हमें भी बता देना… कहां जमीन खरीदना है!
भोपाल बायपास के आसपास एक साथ करीब 50 आईएएस-आईपीएस अफसरों की जमीन खरीद का मामला इन दिनों अफसरों के व्हाट्सएप ग्रुपों में सबसे हॉट टॉपिक बना हुआ है। रिटायर अफसर सबसे ज्यादा एक्टिव हैं। कोई कह रहा है कि भाई, सस्ती जमीन खरीदकर महंगी करना कोई गुनाह थोड़ी है तो कोई मजे लेते हुए लिख रहा है कि अगली बार जहां बायपास आने वाला हो, हमें भी बता देना… हम भी निवेश कर लेंगे।
असल परेशानी जमीन खरीदने से ज्यादा एक साथ खरीदने में हो गई है। वरना सीनियर अफसरों की जमीनों की कहानियां तो सालों से फुसफुसाहट में घूमती रही हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने खिलाड़ी अकेले-अकेले और चुपचाप खेलते थे… नए अफसरों ने लाइक-माइंडेड होकर सामूहिक निवेश कर लिया और चर्चा में आ गए। अब बेचारे जूनियर अफसर सिर झुकाए घूम रहे हैं… जबकि उनके कई सीनियर अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहे हैं।
मंत्रीजी अपने ही स्टाफ से परेशान
मंत्रीजी इन दिनों विपक्ष से कम और अपने स्टाफ से ज्यादा परेशान हैं। पहले समधीजी की आवभगत में कमी का मामला सामने आया, फिर खबर आई कि ओएसडी साहब बंगले के खर्चों में लाखों का बिल बना रहे हैं। अब नया किस्सा और भी मजेदार निकला। हुआ यूं कि मंत्रीजी के कुछ रिश्तेदार मिलने आए थे।
जाते समय स्टाफ का एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी उन्हें कार तक छोड़ने गया। लेकिन विदाई के साथ उसने चाय-पानी का खर्चा भी मांग लिया। जब बात मंत्रीजी तक पहुंची तो वे शर्मिंदा भी हुए और नाराज भी। गुस्से में पूरा स्टाफ बुलाया और बोले, समझ नहीं आता… पूरा स्टाफ बदल दूं या फिर अपना मंत्रालय ही बदलवा लूं। अब मंत्रीजी को कौन समझाए कि मंत्रालय बदलने से किस्मत बदल जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं होती।
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