बोल हरि बोल: खाकी वाले अकबर पर भारी बीरबल की बुद्धि, मुश्किल में माननीय और रीलबाज कलेक्टर!
Harish Divekar | May 10, 2026, 11:30 IST
bol hari bol journalist harish divekar bhopal
मध्य प्रदेश की सियासत और अफसरशाही के गलियारों में इन दिनों रीलबाज कलेक्टरों की होड़, खाकी में अकबर-बीरबल की जंग और होम डिपार्टमेंट की बेताल कथा चर्चा का केंद्र बनी हुई है। वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के कॉलम बोल हरि बोल में पढ़िए इन घटनाओं के बारे में विस्तार से...
BHOPAL. सत्ता और सिस्टम में बहुत कुछ ऐसा होता है, जो फाइलों में दर्ज नहीं होता, पर चर्चाओं में आगे रहता है। अब देखिए ना, मध्यप्रदेश में इन दिनों रीलबाज कलेक्टर खूब सुर्खियां बटोर रहे हैं। पांवड़े बनकर एक शादी में पहुंचे पटवारी साहब की चर्चा भी कम नहीं है। खाकी में अकबर और बीरबल की कहानी तैर रही है। होम डिपार्टमेंट बेताल कथा बन गया है।
खैर, देश-प्रदेश में खबरें तो और भी बहुत हैं, आप तो सीधे नीचे उतर आईए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
मध्यप्रदेश की अफसरशाही में इन दिनों नया ट्रेंड जोर पकड़ रहा है। फाइलों और मीटिंगों से ज्यादा चर्चा अब रील्स की हो रही है। आधा दर्जन से भी कम, लेकिन बेहद चर्चित तीन-चार कलेक्टरों के बीच मानो रियल लाइफ को रील लाइफ में बदलने की होड़ मची हुई है। कोई सड़क पर निरीक्षण करते दिख रहा है, कोई बच्चों के बीच तो कोई खेत-खलिहानों में कैमरे के सामने एक्टिव मोड में नजर आ रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ वीडियो सोशल मीडिया के एल्गोरिदम की मेहरबानी से वायरल हो जाते हैं, जबकि कुछ को वायरल कराने के लिए कलेक्टर साहब की गुप्त डिजिटल सेना ताकत झोंक देती है। अफसरशाही के गलियारों में इसे लेकर खूब कानाफूसी है।
समर्थक कहते हैं कि यदि कलेक्टर काम भी कर रहे हैं और जनता तक अपनी एक्टिविटी पहुंचा भी रहे हैं, तो दिक्कत क्या है? वहीं दूसरी तरफ कई अफसर तंज कस रहे हैं कि दिनभर शूटिंग, एडिटिंग और पोस्टिंग में व्यस्त रहने वाले साहब आखिर असली कलेक्टरी कब करते होंगे? क्योंकि बाकी अफसरों को तो सरकारी काम से ही फुर्सत ही नहीं मिल पाती है।
मध्यप्रदेश की ऊर्जाधानी से ऐसी शादी की कहानी सामने आई है, जिसकी चर्चा अब सरकारी गलियारों से लेकर चाय की टपरी तक हो रही है। किस्सा पटवारी साहब का है, जो ठाठ से साहब की शादी में पांवड़े बनकर पहुंचे थे। माहौल रंगीन था, डीजे बज रहा था और मेहमान खाने-पीने में व्यस्त थे। तभी पटवारी साहब के भीतर का फोटोग्राफर जाग उठा। उन्होंने बिना सोचे-समझे शादी में एक लड़की के फोटो खींच लिए। फिर क्या था... मामला मिनटों में गर्म हो गया।
लड़की के घरवालों ने पहले सवाल पूछे और जवाब पसंद नहीं आया तो वहीं पटवारी साहब की खातिरदारी कर दी। हंगामा बढ़ता देख दूल्हे राजा यानी साहब भी नाराज हो गए। उन्होंने साफ कह दिया कि उनकी शादी में यह तमाशा कैसे हो गया। नतीजा यह निकला कि बारात की रस्में पूरी होने से पहले ही पटवारी साहब की विदाई हो गई।
सत्ता और सियासत के गलियारों में इन दिनों राजा साहब और डॉक्टर साहब की मुलाकात चर्चा बटोर रही है। यह भेंट कोई राजनीतिक रणनीति नहीं थी, यह तो सोमरस के मसले पर हुई थी। मामला रस बनाने वाली कंपनी का है, जिसे सरकार ने बोरिया-बिस्तर समेटने के आदेश दे दिए हैं। कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब कंपनी की तरफ से पैरवी करने खुद राजा साहब मैदान में उतर गए। बड़ी उम्मीदों के साथ वे डॉक्टर साहब से मिलने पहुंचे।
सूत्र बताते हैं कि मुलाकात लंबी चली। तर्क दिए गए और माहौल को हल्का बनाने की कोशिश भी हुई, पर डॉक्टर साहब सख्त नजर आए। अंदरखाने चर्चा है कि राजा साहब को उम्मीद थी कि उनकी बात टल नहीं पाएगी, पर मामला उल्टा पड़ गया। डॉक्टर साहब ने नियमों का हवाला देते हुए राहत देने से इनकार कर दिया।
सूबे की खाकी पुराने दरबार की कहानी जैसी नजर आ रही है। फर्क इतना है कि यहां ताज, सिंहासन और दरबार की जगह फाइलें, आदेश और वायरलेस हैं। विभाग के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा अकबर और बीरबल की जोड़ी को लेकर हो रही है।
कहते हैं कि यहां के अकबर साहब नियम-कायदे बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ते। मीटिंग होती है, निर्देश जारी होते हैं और अनुशासन पर लंबी-लंबी बातें होती हैं, लेकिन असली मजा उसके बाद आता है। सेना यानी मातहतों पर इन आदेशों का असर वैसा नहीं दिखता, जैसा होना चाहिए। उनके आदेश को हलके में निपटा दिया जाता है।
उधर, छोटे साहब यानी विभाग के बीरबल जैसे ही कोई इशारा कर दें, पूरा अमला तुरंत हरकत में आ जाता है। फाइलें चलने लगती हैं। फोन घनघनाने लगते हैं और आदेश जमीन पर उतरते नजर आते हैं। अब विभाग में यही कानाफूसी है कि आखिर असली ताकत किसके पास है? नियम बनाने वाले अकबर के पास या बिना शोर किए काम करा लेने वाले बीरबल के पास।
मध्यप्रदेश का होम डिपार्टमेंट इन दिनों अफसरशाही में किसी बेताल कथा से कम चर्चा में नहीं है। हालत यह है कि यहां पोस्टिंग का नाम सुनते ही अफसर किनारा करने लगते हैं। यदि किसी की तैनाती हो भी जाए तो फिर कोशिश यही रहती है कि किसी तरह कार्यकाल कट जाए।
ताजा किस्सा दो पंडित जी को लेकर है। कुछ महीने पहले भरोसे के साथ एक पंडित जी को होम की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। माना जा रहा था कि वे व्यवस्था को पटरी पर ले आएंगे, लेकिन मामला ज्यादा दिन चला नहीं। आखिरकार उनसे यह जिम्मेदारी वापस ले ली गई।
अब विभाग की कमान दूसरे पंडित जी को सौंप दी गई है। इसके बाद मंत्रालय के गलियारों में एक ही चर्चा है कि होम डिपार्टमेंट का बेताल पहली पीठ छोड़कर अब दूसरी पीठ पर सवार हो गया है। गृह विभाग में लंबे समय से यही हाल है। यहां कुर्सी तो बड़ी है, लेकिन सुकून छोटा। शायद यही वजह है कि अफसर इस विभाग में जाने से पहले सोचते हैं।
सेना पर टिप्पणी कर सुर्खियों में आए माननीय की मुश्किलें अब बढ़ती नजर आ रही हैं। शीर्ष अदालत की सख्त फटकार के बाद सत्ता के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सरकार ने मामले का परीक्षण शुरू कर दिया है। मामला चूंकि मंत्री से जुड़ा है, इसलिए हर कदम बेहद सावधानी से रखा जा रहा है।
अदालत का आदेश आते ही सामान्य प्रशासन विभाग सक्रिय होगा और उसके बाद गृह विभाग अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा। यही वजह है कि मंत्रालय से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस केस को लेकर लगातार कानाफूसी जारी है। अगली सुनवाई 15 दिन बाद मुकर्रर की गई है।
जानकारों की मानें तो सरकार के सामने दो रास्ते हैं। पहला, अदालत के आदेश का सीधा पालन किया जाए। दूसरा, फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दायर कर कानूनी राहत तलाशने की कोशिश की जाए। दिलचस्प बात यह है कि पहले भी सरकार के पास रिव्यू में जाने का विकल्प था, पर तब ऐसा नहीं किया गया। अब देखना होगा कि सरकार मंत्री जी को बचाने के लिए कदम उठाएगी या...? बाकी आप सोच लीजिए।
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खैर, देश-प्रदेश में खबरें तो और भी बहुत हैं, आप तो सीधे नीचे उतर आईए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
रीलबाज कलेक्टरों में कंपटीशन!
दिलचस्प बात यह है कि कुछ वीडियो सोशल मीडिया के एल्गोरिदम की मेहरबानी से वायरल हो जाते हैं, जबकि कुछ को वायरल कराने के लिए कलेक्टर साहब की गुप्त डिजिटल सेना ताकत झोंक देती है। अफसरशाही के गलियारों में इसे लेकर खूब कानाफूसी है।
समर्थक कहते हैं कि यदि कलेक्टर काम भी कर रहे हैं और जनता तक अपनी एक्टिविटी पहुंचा भी रहे हैं, तो दिक्कत क्या है? वहीं दूसरी तरफ कई अफसर तंज कस रहे हैं कि दिनभर शूटिंग, एडिटिंग और पोस्टिंग में व्यस्त रहने वाले साहब आखिर असली कलेक्टरी कब करते होंगे? क्योंकि बाकी अफसरों को तो सरकारी काम से ही फुर्सत ही नहीं मिल पाती है।
पांवड़े बनकर आए, पिटकर लौटे पटवारी साहब!
लड़की के घरवालों ने पहले सवाल पूछे और जवाब पसंद नहीं आया तो वहीं पटवारी साहब की खातिरदारी कर दी। हंगामा बढ़ता देख दूल्हे राजा यानी साहब भी नाराज हो गए। उन्होंने साफ कह दिया कि उनकी शादी में यह तमाशा कैसे हो गया। नतीजा यह निकला कि बारात की रस्में पूरी होने से पहले ही पटवारी साहब की विदाई हो गई।
काम न आई विशेष वार्ता!
सूत्र बताते हैं कि मुलाकात लंबी चली। तर्क दिए गए और माहौल को हल्का बनाने की कोशिश भी हुई, पर डॉक्टर साहब सख्त नजर आए। अंदरखाने चर्चा है कि राजा साहब को उम्मीद थी कि उनकी बात टल नहीं पाएगी, पर मामला उल्टा पड़ गया। डॉक्टर साहब ने नियमों का हवाला देते हुए राहत देने से इनकार कर दिया।
खाकी में अकबर-बीरबल की कहानी!
कहते हैं कि यहां के अकबर साहब नियम-कायदे बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ते। मीटिंग होती है, निर्देश जारी होते हैं और अनुशासन पर लंबी-लंबी बातें होती हैं, लेकिन असली मजा उसके बाद आता है। सेना यानी मातहतों पर इन आदेशों का असर वैसा नहीं दिखता, जैसा होना चाहिए। उनके आदेश को हलके में निपटा दिया जाता है।
उधर, छोटे साहब यानी विभाग के बीरबल जैसे ही कोई इशारा कर दें, पूरा अमला तुरंत हरकत में आ जाता है। फाइलें चलने लगती हैं। फोन घनघनाने लगते हैं और आदेश जमीन पर उतरते नजर आते हैं। अब विभाग में यही कानाफूसी है कि आखिर असली ताकत किसके पास है? नियम बनाने वाले अकबर के पास या बिना शोर किए काम करा लेने वाले बीरबल के पास।
होम डिपार्टमेंट का बेताल और पंडित जी!
ताजा किस्सा दो पंडित जी को लेकर है। कुछ महीने पहले भरोसे के साथ एक पंडित जी को होम की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। माना जा रहा था कि वे व्यवस्था को पटरी पर ले आएंगे, लेकिन मामला ज्यादा दिन चला नहीं। आखिरकार उनसे यह जिम्मेदारी वापस ले ली गई।
अब विभाग की कमान दूसरे पंडित जी को सौंप दी गई है। इसके बाद मंत्रालय के गलियारों में एक ही चर्चा है कि होम डिपार्टमेंट का बेताल पहली पीठ छोड़कर अब दूसरी पीठ पर सवार हो गया है। गृह विभाग में लंबे समय से यही हाल है। यहां कुर्सी तो बड़ी है, लेकिन सुकून छोटा। शायद यही वजह है कि अफसर इस विभाग में जाने से पहले सोचते हैं।
माननीय पर कार्रवाई की तलवार!
अदालत का आदेश आते ही सामान्य प्रशासन विभाग सक्रिय होगा और उसके बाद गृह विभाग अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा। यही वजह है कि मंत्रालय से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस केस को लेकर लगातार कानाफूसी जारी है। अगली सुनवाई 15 दिन बाद मुकर्रर की गई है।
जानकारों की मानें तो सरकार के सामने दो रास्ते हैं। पहला, अदालत के आदेश का सीधा पालन किया जाए। दूसरा, फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दायर कर कानूनी राहत तलाशने की कोशिश की जाए। दिलचस्प बात यह है कि पहले भी सरकार के पास रिव्यू में जाने का विकल्प था, पर तब ऐसा नहीं किया गया। अब देखना होगा कि सरकार मंत्री जी को बचाने के लिए कदम उठाएगी या...? बाकी आप सोच लीजिए।
द सूत्र पर पढ़िए बोल हरि बोल के अन्य कॉलम...
बोल हरि बोल: सत्ता के गलियारों में रौब, रोष और रील का रियलिटी शो!
मैडम के तीखे तेवर, डॉक्टर साहब की फटकार और वो दिल्ली वाली मुलाकात!
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