बोल हरि बोल : भाईसाहब ने बोल दिया पूरा सच, खाकी पर लगे दाग और कलेक्टरों ने क्यों बदले इंटरकॉम और कर्मचारी?
BHOPAL. सत्ता के गलियारों में जो फुसफुसाया जाता है, उसे हम चिल्ला-चिल्लाकर बताते हैं। अब देखिए ना, एक प्रमुख सचिव की घनी बेइज्जती हो गई। एक कलेक्टर ने गोबर से ढकी नंबर प्लेट की आड़ लेकर सिस्टम की खामियों को ढकने की कोशिश की।
हनी ट्रैप 2.0 ने कई नेताओं की धड़कनें बढ़ा रखी हैं। कलेक्टरों के दफ्तरों में जासूस का डर बना हुआ है। उधर, माननीय की सच्चाई ने सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है।
खैर, देश-प्रदेश में खबरें तो और भी बहुत हैं, आप तो सीधे नीचे उतर आईए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
कलेक्टरों के दफ्तर में जासूस का डर!
मध्यप्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक अदृश्य जासूस चर्चा का विषय है। हालात ऐसे हैं कि कुछ कलेक्टर अब अपने दफ्तर में होने वाली बातचीत को लेकर पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हैं। वजह भी कम दिलचस्प नहीं है।
दरअसल, बुंदेलखंड के एक जिले में कलेक्टर साहब को अचानक एहसास हुआ कि उनके दफ्तर की गोपनीय बातें बाहर तक पहुंच रही हैं। मामला गंभीर था, इसलिए उन्होंने खुद तह तक जाने का फैसला किया। पड़ताल आगे बढ़ी तो ऐसा किरदार सामने आया, जिसने महकमे में हलचल मचा दी।
इस घटना की खबर जैसे-जैसे दूसरे जिलों तक पहुंची, कई कलेक्टरों ने भी अपने दफ्तरों की व्यवस्था पर नजर डालनी शुरू कर दी। अब खबर है कि कहीं इंटरकॉम सिस्टम बदले गए हैं तो कहीं वर्षों से एक ही जगह जमे कर्मचारियों की जिम्मेदारियां बदल दी गई हैं।
अब सचिवालय से लेकर जिला मुख्यालयों तक यही कानाफूसी है कि मामला सचमुच उतना बड़ा है या फिर सतर्कता जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है। इतना जरूर है कि इन दिनों कई कलेक्टर अपने दफ्तर में बैठकर यह मानकर चल रहे हैं कि दीवारों के भी कान होते हैं।
अरे भाईसाहब, इतना सच क्यों बोल दिया?
सूबे की सियासत में इन दिनों एक माननीय के तेवर सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। आमतौर पर मंचों पर नेता विरोधियों पर निशाना साधते हैं, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग निकला। माननीय ने अपने ही कुनबे के बड़े चेहरों की खबर ले डाली। पहले अपने क्षेत्र के मंत्री पर तंज कसा, फिर जिले के प्रभारी मंत्री को भी नहीं बख्शा। सुनने वाले समझ ही नहीं पाए कि यह भाषण है या अंदरखाने की नाराजगी का सार्वजनिक प्रसारण।
दिलचस्प बात यह है कि माननीय यहीं नहीं रुके। उन्होंने महाराज पर भी टिप्पणी कर दी, जिसने कई लोगों की भौंहें चढ़ा दीं। मौके पर मौजूद लोग मुस्कराते रहे, लेकिन बाद में बयान की गूंज राजधानी तक सुनाई देने लगी।
उधर, सोशल मीडिया के शौकीनों को जैसे खजाना मिल गया। भाषण का वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया और क्लिप्स एक-दूसरे को भेजी जाने लगीं। अब पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि माननीय ने दिल की बात कह दी। उनके समर्थक अब कह रहे हैं कि भाईसाहब को इतना सच नहीं बोलना था।
साहब की घनी बेइज्जती हो गई
बड़े साहब की वीसी में एक अजब नजारा देखने को मिला। एक प्रमुख सचिव जी बड़े जोश के साथ एक कलेक्टर साहब को टारगेट करने पर आमादा थे, लेकिन बड़े साहब हर बार उन्हें चुप कराकर कलेक्टर की बात सुनते रहे। आखिरकार जब प्रमुख सचिव ने लापरवाही का मुद्दा तीसरी बार पूरे दमखम से उठाया तो बड़े साहब ने बस इतना कहा कि भाई, कलेक्टर की तो सुन लो। बस, इतनी सी प्यार भरी झिड़की काफी थी।
प्रमुख सचिव जी सिकुड़कर बैठ गए। असल बात ये है कि मुद्दा गलत नहीं था, लेकिन नीयत? वो शायद व्यवस्था सुधारने की कम, कलेक्टर को जलील करने की ज्यादा थी। और बड़े साहब ने ये बात भांप ली। नतीजा लापरवाही के बावजूद कलेक्टर साहब बच निकले और प्रमुख सचिव जी को मिली… घनी बेइज्जती।
साहब, नंबर प्लेट पर गोबर लगा है...
प्रदेश में रेत माफिया इस कदर हावी है कि मामला मुख्य सचिव की व्यक्तिगत कोर्ट पेशी तक पहुंच गया। वीसी में जब सीहोर कलेक्टर साहब से जवाब मांगा गया तो उन्होंने बड़े इत्मीनान से फरमाया कि माफिया डंपर की नंबर प्लेट पर गोबर लगाकर चला रहे हैं।
अब इन्हें कौन समझाए कि माफिया की धरपकड़ दफ्तर में कंप्यूटर स्क्रीन ताकने से नहीं होती। इसके लिए कलेक्टर और एसपी को मिलकर जमीन पर इकबाल कायम करना पड़ता है। जब अफसर की धमक मैदानी अमले को दिखती है, तभी माफिया की कमर टूटती है। वरना? सेटिंग से काम चल ही रहा है और चलता रहेगा। गोबर तो बस बहाना है।
ऑपरेशन सफल, मरीज गायब!
भाई साहब, हनी ट्रैप वाला ऑपरेशन बड़ा कामयाब रहा। जो पकड़ा जाना था, उसका अता-पता नहीं। जो पकड़ने निकले थे, वो खुद फंसे नजर आ रहे हैं। जो सबूत निकलने थे, वो किसी अंधेरी सुरंग में समा गए। इतनी मुस्तैदी से धरपकड़ और जांच हुई कि निकला निल बटे सन्नाटा।
उधर, हनी ट्रैप में फंसाने वाले मगरमच्छ को बचाने के लिए अब खाकी वाले साहब नई तकनीक का सहारा ले रहे हैं। पूरी प्लानिंग और प्लॉटिंग के साथ ये नैरेटिव सर्कुलेट किया जा रहा है कि हनी तो AI से डीपफेक वीडियो बनाकर ट्रैप कर रही थीं। यानी जिनके वीडियो बने वो बेचारे तो निरे संत हैं। भई, जमाना बदल गया। पहले झूठ बोलने के लिए बस जुबान चाहिए थी, अब AI का लाइसेंस भी चाहिए।
राजा से फकीर... कुर्सी गई, दुनिया गई
IAS-IPS की नौकरी में जीवन किसी राजा से कम नहीं होता। यही ऐश-ओ-आराम एक भ्रम भी पाल देता है। दोस्त, रिश्तेदार, परिचित सब पीछे छूट जाते हैं। बचते हैं तो बस पॉवर कॉरिडोर के लोग। और वो? वो कुर्सी से रिश्ता रखते हैं, इंसान से नहीं।
ये सच्चाई रिटायरमेंट के बाद समझ आती है, जब ना जी-हुजूरी करने वाला सरकारी मुलाजिम बचता है, ना अपना कोई। IAS अफसरों के WhatsApp ग्रुप में इन दिनों यही बहस है। किसी रिटायर्ड मुख्य सचिव की पत्नी का नॉनवेज से गला चोक होना, किसी का AC फटने की वजह से मरने की घटना के बाद चिंतन और फिर सलाहें।
किसी ने लिखा कि 70 की उम्र के बाद कमरा अंदर से बंद मत करो। कोई कह रहा है कि बच्चे विदेश में हैं, कुछ हो जाए तो कौन आएगा? किसी ने सुझाया कि एक अलग ग्रुपबनाओ ताकि मैसेज पर तुरंत मदद मिले। सार सिर्फ इतना है कि जिन्होंने पूरी जिंदगी सत्ता का नशा किया, उन्हें अब अकेलेपन का डर खा रहा है। कुर्सी थी तो दुनिया थी। कुर्सी गई तो…सब खत्म।
खाकी वाले साहब की साख पर लगा बट्टा
भोपाल की खाकी में इन दिनों सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा। वजह हैं बड़े साहब, जिनका करियर अब तक तेज रफ्तार और शानदार उपलब्धियों के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने उनकी चमक पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
पहले चर्चित ट्विशा शर्मा केस में पुलिस की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल उठे। मामले में जिस तरह की लापरवाही सामने आई, उसने विभाग की किरकिरी कराई। मामला अभी पूरी तरह ठंडा भी नहीं पड़ा था कि एक और मामला आ गया। युवा आईपीएस अधिकारी मनीष भारद्वाज को अचानक जिम्मेदारी से हटाए जाने ने प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों घटनाओं का सीधा असर बड़े साहब की छवि पर पड़ता दिख रहा है। पुलिस महकमे में कानाफूसी है कि फैसले चाहे किसी भी स्तर पर हुए हों, लेकिन जवाबदेही का तीर आखिरकार शीर्ष तक ही पहुंचता है। यही वजह है कि इन दिनों भोपाल की खाकी से ज्यादा चर्चा उसके मुखिया की साख को लेकर हो रही है।
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