बोल हरि बोल: जब खाकी वाले साहब इंदौरी, मैडम फाइल वूमेन और उपमुख्यमंत्री पोस्टमैन बनें…
BHOPAL. मंत्रालय की पांचवीं मंजिल से लेकर पुलिस मुख्यालय तक सत्ता का खेल कभी थकता नहीं। यहां हर गलियारे में एक कहानी है, हर फाइल के नीचे एक राज है और हर तबादले के पीछे एक दास्तान।
इस हफ्ते के बोल हरि बोल में मिलिए एक ऐसे खाकी वाले साहब से जिनका दिल भोपाल में नहीं लगता, एक उपमुख्यमंत्री से जो पोस्टमैन बनते-बनते बचे, दो महिला आईएएस की जंग, जिसने पूरे महकमे के अधिकारियों को हलकान किया हुआ है। साथ ही, एक ऐसी नोटशीट वाली मैडम से जहां रहती हैं वहां के साहब की नींद उड़ जाती है।
सत्ता के इस रंगमंच पर पर्दा उठता है वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol!
खाकी का दिल इंदौर में, तन भोपाल में
कहते हैं जहां मन लगे वहीं घर होता है। और एक सोशल डीजी साहब ने तो इसे अक्षरशः सच कर दिखाया है। भोपाल में बड़े पद पर हैं, बड़ी जिम्मेदारी है, बड़ा महकमा है, लेकिन दिल ? वो तो साहब का इंदौरी प्रेम में कहीं अटका पड़ा है।
साहब का इंदौर प्रेम इतना गहरा है कि सरकारी बंगला वहीं, परिवार वहीं, और किसी न किसी बहाने टूर प्रोग्राम बनाकर साहब का काफिला भी वहीं। भोपाल में रहते हैं तो पुलिस मेस में। बिल्कुल किसी मेहमान की तरह, जैसे अपने ही शहर में पेइंग गेस्ट हों।
सोशल मीडिया पर भी साहब की मौजूदगी जबरदस्त है। शायद इंदौर के चक्कर काटते-काटते डिजिटल दुनिया में भी छाप छोड़ने का शौक जाग उठा है। वैसे नियम कहता है मुख्यालय छोड़ने से पहले अनुमति लेनी होती है। लेकिन जैसा तुलसीदास जी कह गए, समरथ को नहिं दोष गुसाई।
क्या मैं पोस्टमैन हूं? उपमुख्यमंत्री का गुस्सा फूटा
डॉ साहब के कुनबे के सीनियर उपमुख्यमंत्री इन दिनों आग-बबूला हैं। और वजह है उनके अपने प्रमुख सचिव। उनका मनमाना अंदाज अब उनके सब्र की सीमा तोड़ चुका है।
हुआ यूं कि तबादलों के आखिरी दिन पीएस महोदय ने तबादला सूची भेजी। ठीक वैसे जैसे परीक्षा की रात पाठ्यक्रम खोला जाए। बस फिर क्या था, उपमुख्यमंत्री का फोन गया और शब्द सीधे निकले, इतने दिन सूची दबाए बैठे रहे, अब आखिरी घड़ी में भेज रहे हो। क्या मैं पोस्टमैन हूं?
शिकायत डॉ साहब तक पहुंची। और भला हो डॉ साहब का उन्होंने तबादले की तारीख एक दिन के लिए बढ़ा दी। वरना मलाई वाले महकमे के मंत्री होते हुए भी तबादले की बारिश में साहब सूखे ही रह जाते।
दो मैडम, एक महकमा और रोज की खींचतान
अब बात करें उस जंग की जो फाइलों के बीच नहीं, अहंकार के बीच लड़ी जा रही है। सरकार के आला अफसर इन दिनों दो वरिष्ठ महिला IAS अधिकारियों की तू-तू मैं-मैं से हलाकान हैं।
आए दिन एक-दूसरे की चुगली, अपनी-अपनी ढपली और अपना-अपना राग और इस सबके बीच एक बड़ा नीतिगत फैसला लटका पड़ा है। ऊपर से कड़े निर्देश आ चुके हैं कि ईगो साइड में रखकर काम करें। अब देखना यह है कि निर्देशों का असर मैडमों की जिद पर पड़ता है या नहीं।
मैडम गईं- पीएस साहब ने चैन की सांस ली
कुछ राहतें बिना मांगे नहीं मिलतीं और कुछ तबादले बिना दुआ किए नहीं होते। एक प्रमुख सचिव साहब कई महीनों से एक अड़ियल मैडम की फाइलबाज़ी से इतने परेशान थे कि उन्होंने चौथी-पांचवीं मंजिल तक गुहार लगा दी।
डर यह था कि मैडम किसी फाइल पर ऐसी नोटशीट न लिख दें जो अगले दिन अखबार की सुर्खी बन जाए और यह डर बेबुनियाद भी नहीं था। यही वो मैडम हैं जिनकी एक नोटशीट ने पूर्व मुख्य सचिव और एक रिटायर्ड IFS अधिकारी को मुश्किल में डाल दिया था- रिटायर्ड IFS पर तो EOW में FIR तक दर्ज हो गई।
अब मैडम का तबादला हो गया है। पीएस साहब ने राहत की सांस ली है। मंत्रालय के गलियारों में फिलहाल एक अजीब सी शांति है। वो शांति जो किसी तूफान के जाने के बाद आती है।
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