बोल हरि बोल: मंत्री जी से तेज कलेक्टर साहब, टोकन लेकर सैर पर निकले माननीय और कौन जाएगा लूप लाइन में?

Harish Divekar | Jun 14, 2026, 14:05 IST
बोल हरि बोल
वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के कॉलम बोल हरि बोल में पढ़िए क्यों बंद हैं विधायकों के फोन, किस कलेक्टर ने बढ़ाई डिप्टी सीएम की टेंशन और कौन से अफसर जा रहे हैं लूप लाइन में इन घटनाओं के बारे में विस्तार से...

BHOPAL. साहब, सरकार चले या न चले...सिस्टम की अपनी लय कभी नहीं रुकती। अब देखिए ना, तबादलों का मौसम चरम पर है। मंत्री-अफसरों की जोड़ी रातों को भी फाइलें पलट रही है। दूसरी तरफ कलेक्टर बड़े साहब के मैसेज देखकर माथा पकड़ रहे हैं। उधर, माननीय फोन बंद करके टूर पर निकल लिए हैं। कुल मिलाकर कहें तो मौसमी बौछारों के बीच भी इस हफ्ते सियासी और प्रशासनिक रसोई में आंच खूब तेज रही है।



खैर, देश-प्रदेश में खबरें तो और भी बहुत हैं, आप तो सीधे नीचे उतर आईए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।



तबादलों के मौसम में गड़गड़ाहट

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सूबे में तबादलों का मौसम पूरे शबाब पर है और उसकी गड़गड़ाहट सत्ता के गलियारों में सुनाई दे रही है। हाल यह है कि कई अफसर इन दिनों नियमित कामकाज से ज्यादा तबादला गणित में व्यस्त हैं। मंत्रीजी के साथ बैठकों का दौर चल रहा है और नामों के जोड़-घटाव ऐसे हो रहे हैं, मानो कोई बड़ा रणनीतिक अभियान चल रहा हो। छुट्टी के दिन भी कई दफ्तरों और बंगलों में तबादला सूचियों पर काट-छांट जारी है। पीए और ओएसडी लिस्ट पर निशान लगाकर बता रहे हैं कि किस अफसर या कर्मचारी ने समय रहते नमस्ते कर ली है और किसकी फाइल अभी इंतजार में है।



जल्दी इसलिए भी है, क्योंकि 15 जून को तबादलों की समय-सीमा खत्म होनी है। ऐसे में हर कोई चाहता है कि इस मौसम की बारिश का पानी अगले साल तक के लिए टंकी में भर लिया जाए। ऊपर से मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाएं भी तेज हैं। कौन मंत्री कब तक कुर्सी पर रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। इसलिए जो करना है, अभी करना है।



आपको बता दें कि इस बार ई-फाइलिंग ने भी खेल थोड़ा मुश्किल कर दिया है। पुराने दिनों की तरह बैक डेट में आदेश निकालना आसान नहीं रहा। लेकिन अनुभवी खिलाड़ियों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। चर्चा है कि 15 जून से पहले जितनी सूचियां संभव हों, उन्हें ई-फाइल पर अनुमोदित करा लिया जाए। इसके बाद हालात और नमस्ते के हिसाब से आदेश धीरे-धीरे जारी होते रहें।



टोकन लेने वाले माननीय फोन नहीं उठा रहे?

राजनीतिक गलियारों में खबर है कि कुछ माननीय अचानक फोन से दूरी बना चुके हैं। किसी का मोबाइल लगातार व्यस्त मिल रहा है तो कोई परिवार के साथ सैर-सपाटे पर निकल गया है। कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने पुराने समर्थकों और शुभचिंतकों से मिलने-जुलने से बच रहे हैं।



इसकी वजह बड़ी दिलचस्प है। दरअसल, चर्चा है कि इन माननीयों ने राज्यसभा चुनाव के दौरान अपनी पार्टी की लाइन से हटकर विरोधी खेमे के एक बड़े ऑपरेशन में सहयोग का भरोसा दिया था। भरोसे के साथ कथित तौर पर अच्छा-खासा टोकन भी ले लिया गया, लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।



पूरा ऑपरेशन थिएटर तक पहुंचने की तैयारी में था, पर उससे पहले ही डॉक्टर साहब ने ऐसा इलाज कर दिया कि मरीज का मर्ज ही खत्म हो गया। न ऑपरेशन की जरूरत पड़ी और न ही सर्जरी का मौका आया। अब जिन लोगों ने भरोसे और टोकन के बीच संतुलन बनाया था, वे असमंजस में हैं। उन्हें डर इस बात का है कि कहीं ऑपरेशन के प्रायोजक अब हिसाब-किताब मांगने न पहुंच जाएं। यही कारण है कि कुछ माननीयों के फोन साइलेंट मोड पर हैं और मुलाकातों का कैलेंडर भी फिलहाल खाली रखा गया है।



अजीब फरमान और कलेक्टर साहब हैरान!

पिछले दिनों एक वीडियो कॉन्फ्रेंस से पहले बड़े साहब का एक मैसेज कलेक्टरों के मोबाइल पर टपका तो कई जिलों के कलेक्टर माथा पकड़कर बैठ गए। संदेश में आग्रह किया गया था कि सभी कलेक्टर अपना अभिमत यूसीसी पोर्टल पर दर्ज करें। बस यहीं से अफसरशाही के कान खड़े हो गए। कुछ कलेक्टरों ने आपस में चर्चा की कि भाई, जनता से राय लेना हमारा काम है, राय देना नहीं। हम प्रशासनिक मशीनरी का हिस्सा हैं। यूसीसी पर व्यक्तिगत अभिमत देने लगेंगे तो फिर निष्पक्षता का क्या होगा?



चर्चा यह भी रही कि कलेक्टरों की नौकरी जनता के विचार पोर्टल पर लिखने की नहीं, बल्कि जनता के विचार सरकार तक पहुंचाने की है। ऐसे में बड़े साहब का यह मैसेज कई अधिकारियों की समझ से परे रहा। हालांकि सरकारी सेवा का अनुशासन भी कोई छोटी चीज नहीं है। कुछ कलेक्टरों ने मजाक में कहा कि आदेश मुखिया का है, इसलिए सिर आंखों पर रहेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि यह सहमति दिल से कम और नौकरी के नियमों से ज्यादा प्रेरित होगी।



अब सवाल यह है कि बड़े साहब का आशय क्या था और कलेक्टरों ने संदेश का मतलब क्या निकाला? यह बहस तो अपनी जगह है। हमारा काम तो केवल कलेक्टरों के मन की बात बड़े साहब तक पहुंचाना था, सो पहुंचा दी। अब फैसला बड़े साहब और उनके कलेक्टरों के बीच ही होना है कि समझदारी किस तरफ ज्यादा है।



जय राम जी की!!!



उठापटक में लग गए अध्यक्ष जी!

निगम-मंडलों की कुर्सियां संभालते ही कई नवनियुक्त अध्यक्ष पूरे जोश के साथ मैदान में उतर गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि उनका ध्यान निगम-मंडल के नियमित कामकाज से ज्यादा बजट, फंड और वित्तीय व्यवस्थाओं की बारीकियां समझने पर दिखाई दे रहा है। आखिर असली ताकत कहां छिपी है, यह समझने में उन्हें ज्यादा वक्त नहीं लगा।



कुछ अध्यक्षों ने रिटायर्ड कर्मचारियों को सलाहकार बनाकर अनुभव का सहारा लिया है, तो कुछ जगहों पर दामाद, साले साहब और धर्मपत्नी पर्दे के पीछे से हिसाब-किताब संभालते नजर आ रहे हैं। एक अध्यक्ष महोदय तो एक कदम आगे निकल गए हैं। उन्होंने अपने बेटे को ही मैदान में उतार दिया है। चर्चा है कि साहबजादे निगम-मंडल की आंतरिक बैठकों से लेकर अफसरों के साथ कामकाज की समीक्षा तक में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।



अध्यक्षों की यह ताबड़तोड़ बल्लेबाजी शुरू होते ही कुछ मंत्रियों की बेचैनी भी बढ़ गई है। वजह साफ है कि अध्यक्षों की नियुक्ति से पहले निगम-मंडलों का अधिकांश हिसाब-किताब और प्रभाव सीधे मंत्रियों तक पहुंचता था। अब कई जगह नई सत्ता-केंद्रित व्यवस्थाएं बनती दिखाई दे रही हैं। ऐसे में कुछ मंत्री यह समझने में लगे हैं कि आखिर नई पिच पर खेला कैसे जाए।



उधर, उपाध्यक्ष और सदस्य फिलहाल संतोष के भाव में हैं। उन्हें मालूम है कि मुख्य थाली भले किसी और के सामने रखी हो, लेकिन खुरचन भी कम स्वादिष्ट नहीं होती। वैसे भी राजनीति में दान की बछिया के दांत कौन गिनता है। इतनी मारामारी के बीच कोई पद मिल जाए, यही अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। बाकी हिसाब-किताब और उठापटक का खेल तो अभी लंबा चलना है।



कलेक्टर साहब पड़े नेताजी पर भारी!

मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में इन दिनों नई किस्म की चर्चा है। कहीं-कहीं कलेक्टर साहब की लोकप्रियता स्थानीय नेताओं को भी टक्कर देने लगी है। अब विंध्य की राजनीति और प्रशासन के गलियारों में गूंज रही यह ताजा कहानी ही सुन लीजिए। रीवा के एक सज्जन ने फेसबुक पर डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला और कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी की तस्वीरें लगाकर एक सीधा-सा सवाल पूछ लिया कि "जनहित में सार्वजनिक रूप से किसका काम बेहतर दिखाई देता है?" फिर क्या था, पोस्ट देखते ही देखते चर्चा का विषय बन गई। कमेंट्स की बौछार हो गई। 400 लोगों ने अपनी राय दी और पोस्ट कई बार शेयर भी हुई। अधिकांश प्रतिक्रियाएं कलेक्टर साहब के पक्ष में दिखाई दीं। लोगों ने उनके कामकाज, सक्रियता और प्रशासनिक शैली की तारीफ की। इसके बाद सोशल मीडिया के जानकारों ने अपने-अपने निष्कर्ष निकालने शुरू कर दिए। किसी ने इसे जनता का मूड बताया तो किसी ने प्रशासन की बढ़ती स्वीकार्यता का प्रमाण मान लिया।



हालांकि नेताजी के समर्थक इस घटनाक्रम को ज्यादा महत्व देने के पक्ष में नहीं हैं। उनका तर्क है कि एक चुने हुए जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी की तुलना करना ही बेमानी है। जनप्रतिनिधि की भूमिका अलग होती है और अफसर की जिम्मेदारियां अलग। इसलिए फेसबुक के कमेंट बॉक्स को जनमत संग्रह मान लेने का कोई औचित्य ही नहीं है। फिर भी राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तो चर्चा होती है। फिलहाल विंध्य में यही किस्सा चल रहा है कि इस बार फेसबुक की अदालत में कलेक्टर साहब, नेताजी पर भारी पड़ते नजर आए। अब यह जनता का वास्तविक फीडबैक है, सोशल मीडिया का क्षणिक उत्साह है या फिर किसी अदृश्य रणनीतिकार की बारीक कारीगरी, इसका फैसला तो राम ही जानें।



परफॉर्मेंस नहीं तो लूप लाइन तय

मैदानी अफसरों के लिए डॉक्टर साहब का संदेश साफ है कि अगले ढाई साल फील्ड में वही टिकेगा, जिसकी परफॉर्मेंस दमदार होगी। बाकी लोगों के लिए मंत्रालय की आरामदायक, लेकिन प्रभावहीन कुर्सियां तैयार हैं। दरअसल, हाल ही में चले जल गंगा संवर्धन अभियान, मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रमों और स्वच्छ सर्वेक्षण जैसे अहम अभियानों में कुछ जिलों से सरकार को उम्मीद के मुताबिक फीडबैक नहीं मिला है। रिपोर्ट कार्ड सामने आया तो कई वरिष्ठ अफसरों के नंबर उम्मीद से कम निकले हैं। बताया जा रहा है कि सरकार ने ऐसे अधिकारियों की सूची पर गंभीरता से मंथन शुरू कर दिया है।



जल्द ही प्रशासनिक गलियारों में एक और बड़ी सर्जरी देखने को मिलेगी। खासकर ग्वालियर-चंबल अंचल के कई अधिकारियों की कुर्सियां हिलने लगी हैं। कुछ को इधर भेजा जाएगा, कुछ को उधर। जिनकी परफॉर्मेंस कमजोर होगी, उन्हें मंत्रालय की उस लूप लाइन में खड़ा कर दिया जाएगा, जहां फाइलें तो खूब चलती हैं, लेकिन चर्चा कम होती है।



कहते हैं कि डॉक्टर साहब ने हाल ही में मैदानी अधिकारियों के साथ हुई बैठक में बिना लाग-लपेट के यह बात साफ शब्दों में कह भी दी है। संदेश इतना ही था कि अब फील्ड पोस्टिंग अधिकार नहीं, प्रदर्शन के आधार पर मिलने वाला अवसर होगी। उधर, अफसरशाही में चर्चा है कि अगले महीने होने वाली कलेक्टर-कमिश्नर कॉन्फ्रेंस के बाद बड़ा प्रशासनिक फेरबदल सामने आ सकता है। इसलिए इन दिनों कई जिलों में फाइलों की रफ्तार बढ़ गई है, समीक्षा बैठकों का दौर तेज हो गया है।



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