बोल हरि बोल: कलेक्टर बन गए तहसीलदार, 1200 करोड़ के टेंडर पर खींचतान और वो नाराज फूफा जी...!
BHOPAL. कुर्सियों के अपने किस्से होते हैं और मलाई की अपनी कहानी। उमस भरे इस मौसम में मध्य प्रदेश से भी ऐसी ही कहानियां सामने आई हैं। कहीं कलेक्टर साहब ने तहसील की कमान संभाल ली है। कहीं मास्टर प्लान ने माननीय को नाराज फूफा बना दिया है। उधर, 1200 करोड़ के टेंडर ने अध्यक्ष जी की नींद उड़ा रखी है।
देश-प्रदेश में खबरें तो बहुत हैं। पर आप तो सीधे नीचे उतर आइए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम Bol Hari Bol के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
कलेक्टर साहब की नई तहसीलदारी
कहते हैं कुर्सी का अपना ही नशा होता है। कुर्सी बड़ी हो तो कभी-कभी छोटी कुर्सियों पर भी नजर चली जाती है। इन दिनों कुछ बड़े जिलों में यही चर्चा है कि कलेक्टर साहब अब कलेक्टरी के साथ तहसीलदारी का भी आनंद लेने लगे हैं। मामला जमीनों के नामांतरण का है। नियम-कायदे कहते हैं कि नामांतरण का काम तहसीलदार साहब के जिम्मे है। लेकिन बड़े जमीन सौदों में अब ऐसा नहीं है। फाइलें तहसील से निकलकर सीधे कलेक्टर बंगले की ओर जाने लगी हैं।
कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि साहब की हरी झंडी के बिना बड़ी जमीनों की गाड़ी आगे नहीं बढ़ती। यानी तहसीलदार की कुर्सी खाली है, लेकिन उसकी चाबी कहीं और रखी है। माल-पानी के इस खेल में एक 100 एकड़ जमीन का किस्सा खूब चर्चा में है।
खबर है कि नामांतरण की हरी झंडी के लिए दो करोड़ की बारिश हो गई है। यदि इसका हिसाब लगाएं तो एक एकड़ पर दो लाख की बूंदाबांदी बैठती है। अब मजेदार मोड़ यह है कि तहसीलदारों की मलाई कम होने लगी तो उनकी जुबान भी खुलने लगी है। आखिर जब थाली छोटी हो जाए तो चम्मच आवाज करने लगती है। तहसीलदार खुद ही कलेक्टर साहब की पोल खोल रहे हैं। कलेक्टर साहब कौन हैं, यह आप स्वयं ही पता कर सकते हैं। बस फोन उठाइए और नंबर घुमाइए...।
मास्टर प्लान और नाराज फूफा जी
भोपाल का मास्टर प्लान 21 साल बाद आया है। लंबे इंतजार के बाद लगा था कि शहर में विकास की गंगा बहेगी। लेकिन कुछ लोगों के सपनों की नाव हिचकोले खाने लगी है। वह भी किनारे लगने से पहले ही। राजनीति में हर घर में एक नाराज फूफा जरूर होता है। इस बार मामला मास्टर प्लान का है।
यह भूमिका भोपाल के चर्चित विधायक जी निभाते नजर आ रहे हैं। चंदा मामा के नाम से मशहूर माननीय की नाराजगी भी कम दिलचस्प नहीं है। चर्चा है कि उन्हें उम्मीद थी, प्लान में कुछ जमीनों की किस्मत चमकेगी। कई लोगों के सितारे जमीन से आसमान तक पहुंच जाएंगे। लेकिन नक्शे ने उम्मीद के मुताबिक करवट नहीं ली। इसलिए चेहरे पर मुस्कान की जगह सवाल आ गए।
कहते हैं जमीन का खेल बड़ा निराला होता है। यहां नक्शे की एक लाइन बड़ा फर्क डालती है। किसी की जमीन साधारण से खास बन जाती है। किसी के सपने फाइल में बंद हो जाते हैं। अब सत्ताधारी दल के नेता ही कह रहे हैं कि विधायक जी नाराज फूफा हो गए हैं।
मास्टर प्लान से साहब भी मायूस
भोपाल मास्टर प्लान ने नेताओं के साथ अफसरों के कमरे का तापमान भी बढ़ा दिया है। विभाग के बड़े साहब भी इस मामले में कुछ खामोश-खामोश नजर आ रहे हैं। चर्चा है कि क्रेडाई वालों से संवाद का कार्यक्रम बनना था, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस की तैयारी थी। मंच सजने वाला था। माइक लगने वाले थे, लेकिन अचानक ऊपर से ऐसा ब्रेक लगा कि सारी तैयारी फाइलों में आराम फरमाने लगी। फिर मुख्यमंत्री जी का एक ट्वीट आया और ड्राफ्ट जनता के सामने आ गया। हाल यह रहा कि कुछ लोग कार्यक्रम की तैयारी में लगे रहे और खबर उन्हें ट्वीट से मिली। सही भी है साहब... सरकारी सिस्टम में कभी-कभी सूचना भी वीआईपी ट्रीटमेंट मांगती है।
प्रमोटी कलेक्टर और दिल्ली की नाराजगी
सत्ता और संगठन के बड़े कार्यक्रमों में व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि कोई उंगली न उठाए, लेकिन विंध्य के एक कलेक्टर की तैयारियों में कमी की चर्चा अब दिल्ली तक पहुंच गई है। सेवा संकल्प यात्रा का मामला था, लेकिन कलेक्टर साहब की लापरवाही ने यात्रा से पहले ही समीक्षा यात्रा शुरू करा दी। अब संगठन और सत्ता दोनों रूट वाले जिलों से पल-पल की रिपोर्ट ले रहे हैं। कहावत है कि बड़े आयोजन में मंच पर बैठे लोग कम और पीछे भागदौड़ करने वाले ज्यादा दिखाई देते हैं, लेकिन जब व्यवस्था में कमी दिख जाए तो सबसे पहले नजर उसी पर जाती है।
टेंडर की मलाई और अध्यक्ष जी की बेचैनी
मध्य प्रदेश के एक निगम में 1200 करोड़ का टेंडर इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। विभाग और निगम के बीच ऐसा मुकाबला चल रहा है कि देखने वालों को लग रहा है, जैसे टेंडर नहीं, रस्साकशी प्रतियोगिता हो रही हो। मामला कोर्ट तक पहुंच गया है। हालांकि ऐसे हालात देखकर एमडी साहब ने रास्ता निकाला है कि टेंडर निरस्त करो और नया रास्ता खोलो। इसके बाद पूरे बोर्ड से दस्तखत करवाकर फाइल अध्यक्ष जी की टेबल पर भेजी गई, लेकिन अध्यक्ष जी का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
उन्होंने कहा कि इतना बड़ा फैसला और हमें बताया तक नहीं? अब अध्यक्ष जी बोर्ड सदस्यों से पूछताछ के मूड में हैं कि आखिर इतनी जल्दी-जल्दी हस्ताक्षर कैसे हो गए। अंदरखाने की खबर यह भी है कि एमडी साहब ने समझाने की कोशिश की कि पुराना विवाद खत्म करो, नया टेंडर निकालो, लेकिन अध्यक्ष जी पुराने टेंडर की डोर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। कहते हैं उम्मीद की पतंग जब ज्यादा ऊंची उड़ जाए तो डोर टूटने का डर सताने लगता है। अब देखना यह है कि टेंडर बचता है या अध्यक्ष जी की उम्मीदें।
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