जीते जी इलाहाबाद: ममता कालिया की कलम से संगीत और शहर का अनूठा संगम
- किताब का नाम: जीते जी इलाहाबाद
- लेखक: ममता कालिया
- प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन
- भाषा: हिंदी
- पहचान: साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2025 से सम्मानित
कुछ किताबें सिर्फ पढ़ी जाती हैं। और कुछ किताबें अंदर तक उतर जाती हैं। ममता कालिया का उपन्यास 'जीते जी इलाहाबाद' उन्हीं किताबों में से एक है। यह उपन्यास आपको कोई कहानी नहीं सुनाता। यह आपको एक पूरे शहर में ले जाता है। उस इलाहाबाद में, जो कभी हिंदी साहित्य और शास्त्रीय संगीत की राजधानी हुआ करता था।जो खो गया, वो यहां अभी भी जिंदा है।
जीते जी इलाहाबाद की कहानी का सारांश
इस उपन्यास की जान ठुमरी में बसती है। एक ऐसी संगीत विदुषी की कहानी है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी सुरों को दे दी। कुछ माँगा नहीं, बस गाती रही। किताब आपको उन पुरानी महफिलों में ले जाती है। उन कोठों के गलियारों में, जहाँ कभी सुर गूँजते थे। लेकिन यह सिर्फ संगीत की यात्रा नहीं है।
यह एक औरत के आत्मसम्मान की लड़ाई है। यह एक शहर के धीरे-धीरे बिखरने का दर्द है। और यह उस 'गंगा-जमुनी तहजीब' की याद है, जिसे पढ़कर आंखें नम हो जाती हैं।
प्रतीकात्मक और मुख्य पात्र
- बब्बन बाई: यह उपन्यास की सबसे ताकतवर आवाज हैं। वे सिर्फ एक पात्र नहीं हैं। वे उस पूरे दौर की नुमाइंदगी करती हैं, जब कला ही इंसान का धर्म था। उनके गले में सरस्वती बसती थीं, लेकिन समाज की नज़रें हमेशा उन्हें संदेह से देखती रहीं।
- इलाहाबाद शहर: इस किताब में इलाहाबाद कोई पृष्ठभूमि नहीं है। यह खुद एक जीता-जागता किरदार है। निराला की गर्जना, पंत की कोमलता और महादेवी वर्मा की करुणा, ये सब इस कहानी को एक ऐतिहासिक सच्चाई देते हैं।
लेखक ममता कालिया कौन हैं?
ममता कालिया राजस्थान के जोधपुर में पैदा हुईं। उनकी लेखनी में एक खास किस्म का ठहराव है। वे जल्दी में नहीं लिखतीं। 'जीते जी इलाहाबाद' लिखने से पहले उन्होंने बरसों तक शास्त्रीय संगीत की बारीकियाँ समझीं, शोध किया।
उनके अन्य चर्चित कामों में 'शिगाफ' और कई कहानी संग्रह शामिल हैं। हिंदी साहित्य में उनकी जगह अलग और खास है।
किताब की पहचान और पुरस्कार
जीते जी इलाहाबाद को पहले केके बिड़ला फाउंडेशन का प्रतिष्ठित बिहारी पुरस्कार (2019) मिल चुका है। और अब साहित्य अकादेमी पुरस्कार 2025 ने इस किताब को एक और ऊँचाई दी है।
यह पुरस्कार सिर्फ एक किताब का सम्मान नहीं है। यह उस मेहनत का सम्मान है, जो एक लेखक बरसों की साधना में लगाता है।
किताब का मुख्य संदेश और अंश
किताब में एक जगह ममता कालिया लिखती हैं-
इलाहाबाद सिर्फ रहने की जगह नहीं है, यह जीने का अंदाज है। यहां की हवाओं में जब तक निराला की गर्जना और महादेवी की करुणा का संगम न मिले, तब तक शाम मुकम्मल नहीं होती। यह एक लाइन बता देती है कि लेखक ने इस शहर को कितनी गहराई से महसूस किया है।
किताब दो बातें बहुत साफ कहती है। पहली, कला का सम्मान किसी सामाजिक ठप्पे का मोहताज नहीं होता। दूसरी, अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूलना किसी भी समाज के लिए नुकसानदेह है।
क्यों पढ़ें जीते जी इलाहाबाद?
- शास्त्रीय संगीत और ठुमरी की दुनिया को करीब से समझने के लिए।
- इलाहाबाद के उस दौर को महसूस करने के लिए, जो अब सिर्फ यादों में है।
- एक महिला कलाकार के आत्मसम्मान की कहानी जानने के लिए।
- और बेहद सुंदर, शुद्ध हिंदी भाषा का आनंद लेने के लिए।
निष्कर्ष
जीते जी इलाहाबाद सिर्फ एक उपन्यास नहीं है। यह एक शहर की आत्मा है। यह कला, संघर्ष और बदलते समाज की एक जरूरी दास्तान है। राजकमल प्रकाशन से आई यह किताब हमारी सांस्कृतिक पहचान पर एक गहरी और जरूरी टिप्पणी है।
अगर आप एक ऐसी किताब चाहते हैं जो शहर, संगीत और जज्बात को एक साथ जीए तो यह किताब आपके संग्रह में जरूर होनी चाहिए।
और भी किताबों के बारे में जानें -
Sapiens : मानव इतिहास की गहरी समझ बनाती है यूवाल नोआ हरारी की विश्व प्रसिद्ध किताब
दोस्त बनाने की कला सिखाती है डेल कार्नेगी की किताब हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इन्फ्लूएंस पीपल
The 5 AM Club : रॉबिन शर्मा की किताब सिखाती है कि कैसे सुबह का पहला घंटा बदल सकता है आपका पूरा जीवन
गोदान : मुंशी प्रेमचंद का महान उपन्यास जो असली भारत का दस्तावेज बन गया