AAP में टूट का सिलसिला: पार्टी संस्थापकों से लेकर मंत्रियों तक के बिखराव की पूरी कहानी
News In Short
- योगेंद्र यादव को 2015 में PAC से हटाया गया।
- शाजिया इल्मी ने मई 2014 में इस्तीफा दिया।
- कपिल मिश्रा को पार्टी ने औपचारिक रूप से निकाला।
- कुमार विश्वास ने कभी इस्तीफा नहीं दिया, पर दूर रहे।
- अल्का लांबा 2019 में कांग्रेस में शामिल हुईं।
News In Detail
आम आदमी पार्टी (AAP) की स्थापना 2012 में अन्ना हजारे के आंदोलन की नींव पर हुई थी। पार्टी ने भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का वादा किया था। लेकिन 2012 से 2026 के बीच कई बड़े नेता संस्थापक, मंत्री और जनप्रिय चेहरे पार्टी से अलग होते चले गए। इस लेख में जानें किसने क्यों और कब AAP को अलविदा कहा।
AAP नेताओं का पार्टी छोड़ना: 2012–2026 की पूरी कहानी...
संस्थापकों का मोहभंग: योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण
आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) की नींव 2012 में रखी गई थी। यह नींव अन्ना हज़ारे के जन लोकपाल आंदोलन से उठी थी। इस आंदोलन ने देश में भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति को नई दिशा दी। योगेंद्र यादव (Yogendra Yadav) और वकील प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) इस पार्टी के प्रमुख संस्थापकों में थे। दोनों ने पार्टी की वैचारिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई।
योगेंद्र यादव देश के जाने-माने राजनीतिशास्त्री और चुनाव-विश्लेषक थे। उनका जमीनी राजनीति पर गहरा अध्ययन था। प्रशांत भूषण वरिष्ठ वकील थे जिन्होंने कई बड़े भ्रष्टाचार मामलों में लड़ाई लड़ी। दोनों ने आरंभ से ही पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र (Internal Democracy) की वकालत की।
2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP को ऐतिहासिक जीत मिली। 70 में से 67 सीटें जीतकर पार्टी ने दिल्ली की सत्ता पाई। लेकिन सत्ता के साथ आंतरिक विवाद भी बढ़ते गए। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने निर्णय-केंद्रीकरण (Centralization of Power) पर खुलकर आपत्ति जताई। उन्होंने नीतिगत पारदर्शिता की कमी को लेकर भी सवाल उठाए।
मार्च 2015 में दोनों को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटा दिया गया। साथ ही राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) से भी बाहर किया गया। अप्रैल 2015 में दोनों को "अनुशासनहीनता" के आरोप में पार्टी से निकाल दिया गया। यह AAP के इतिहास में पहला बड़ा विभाजन था। दोनों ने जाते-जाते कहा कि पार्टी अपने स्वराज (Swaraj) के मूल आदर्शों से भटक गई है।
आनंद कुमार और शाजिया इल्मी का सिद्धांतों से टकराव
आनंद कुमार (Anand Kumar) पार्टी के एक और संस्थापक-स्तर के नेता थे। वे एक अकादमिक शोधकर्ता थे जिनकी विशेषज्ञता ग्रामीण भारत और चुनाव-संरचना में थी। पार्टी के प्रारंभिक दौर में उन्होंने नीति-रूपरेखा (Policy Framework) तैयार करने में मदद की। लेकिन सत्ता मिलने के बाद उन्हें निर्णय प्रक्रिया में खामियाँ नज़र आने लगीं। जनता-आधारित नियंत्रण कमज़ोर होता देख वे धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से दूर होते गए।
शाजिया इल्मी (Shazia Ilmi) AAP की शुरुआती राष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में बेहद लोकप्रिय थीं। उनकी वाकपटुता और मीडिया उपस्थिति पार्टी की पहचान बन गई थी। मई 2014 में उन्होंने पार्टी से इस्तीफा देकर सबको चौंका दिया। उनका कहना था कि AAP अपने मूल आदर्शों से दूर हो गई। भीतर गुटबाज़ी और ऊपर से थोपे गए फैसलों से वे बेहद नाराज़ थीं।
शाजिया इल्मी के जाने के बाद उनके कई सहयोगी भी पार्टी छोड़ गए। इससे AAP की "सिद्धांत-आधारित नई राजनीति" (Principled Politics) की छवि को गहरा धक्का लगा। पार्टी के शुभचिंतकों ने सोचा था कि AAP पुरानी राजनीति से अलग होगी। लेकिन एक-एक कर सिद्धांतवादी नेताओं का जाना यह सवाल उठाने लगा।
आशुतोष, आशीष खेतान और कपिल मिश्रा का अलगाव
आशुतोष (Ashutosh) टेलीविजन पत्रकारिता से राजनीति में आए थे। वे AAP की जनरल सेक्रेटरी बने और पार्टी के मुख्य प्रवक्ता की भूमिका निभाई। मीडिया में उनकी मज़बूत पकड़ थी और वे पार्टी का चेहरा बन चुके थे। लेकिन समय के साथ पार्टी के नीतिगत झुकाव से उनका मोहभंग होने लगा। अंततः वे पार्टी से अलग हो गए।
आशीष खेतान (Ashish Khetan) एक उभरते कानून-विशेषज्ञ नेता के रूप में AAP में आए थे। उन्होंने 2018 में ई-मेल के ज़रिए इस्तीफा भेजा। उन्होंने "निजी कारणों" का हवाला दिया लेकिन रिपोर्टों में कहा गया कि लोकसभा चुनाव का टिकट न मिलना उनकी नाराज़गी की बड़ी वजह थी। नीतिगत सहमति की कमी ने भी उन्हें निराश किया।
कपिल मिश्रा (Kapil Mishra) AAP के शुरुआती दौर के सबसे आक्रामक और ऊर्जावान नेताओं में गिने जाते थे। वे दिल्ली सरकार में मंत्री भी रहे। लेकिन उन्होंने नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए। आरोपों की जांच के बाद AAP ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उनका निष्कासन पार्टी के इतिहास में एक विवादास्पद अध्याय बन गया।
कुमार विश्वास और अल्का लांबा: दो कहानियां
कुमार विश्वास (Kumar Vishwas) आम आदमी पार्टी के सबसे जनप्रिय और अलग किस्म के नेता थे। वे हिंदी के प्रसिद्ध कवि हैं जिन्होंने अपनी कविताओं और रैलियों से लाखों लोगों को AAP से जोड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा। उनकी उपस्थिति पार्टी को एक सांस्कृतिक आयाम देती थी।
2018 से 2022 के बीच कुमार विश्वास पार्टी से धीरे-धीरे दूर होते गए। उन्होंने राज्यसभा और अन्य उम्मीदवारियों में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि फैसले व्यक्तिगत पसंद से होते हैं न कि योग्यता से। हालाँकि उन्होंने औपचारिक इस्तीफा कभी नहीं दिया। लेकिन उनकी रैलियाँ और जन-अभियान बंद हो जाना ही सब कुछ कह देता था।
अलका लांबा (Alka Lamba) दिल्ली की विधायक रहीं और पार्टी की महिला चेहरे के रूप में पहचानी जाती थीं। उन्होंने आंतरिक असहमति के बाद AAP से नाता तोड़ा। 2019 में वे कांग्रेस में शामिल हो गईं। उनका कहना था कि AAP में महिला नेत्रियों को उचित सम्मान और भूमिका नहीं मिलती। उनके जाने से पार्टी के भीतर महिला नेतृत्व (Women Leadership) की बहस फिर से उठी।
राघव चड्ढा का AAP से इस्तीफा
राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने 24 अप्रैल 2026 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें उन्होंने भारी मन से कहा कि आम आदमी पार्टी अपने बुनियादी मूल्यों से भटक गई है।
उन्होंने साफ कहा, "मैं आम आदमी पार्टी से दूर जा रहा हूं और जनता की ओर बढ़ रहा हूं।" चड्ढा ने यह भी बताया कि जिस पार्टी को उन्होंने अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह अब देश के हित में नहीं बल्कि निजी फायदे के लिए काम कर रही है।उनका कहना था, "पिछले कुछ सालों से मुझे महसूस हो रहा था कि मैं गलत पार्टी में सही आदमी हूं।" इसी सोच के साथ उन्होंने फैसला लिया कि वे संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए खुद को बीजेपी (भारतीय जनता पार्टी) में मिला लेंगे।
राघव चड्ढा के साथ इन 7 सांसदों ने छोड़ी AAP
स्वाति मालीवाल जनवरी 2024 में राज्यसभा सांसद बनी थीं। वह दिल्ली महिला आयोग (Delhi Commission for Women) की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। बीते साल AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल के साथ उनका बड़ा विवाद सामने आया था। तभी से वह पार्टी से नाराज चल रही थीं।
अशोक कुमार मित्तल लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं। उन्हें मार्च 2022 में AAP ने राज्यसभा भेजा था। शिक्षा के क्षेत्र में उनकी खास पहचान है। हाल ही में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर बनाया था, लेकिन अब वे भी बीजेपी के रास्ते पर हैं।
डॉ. संदीप पाठक अप्रैल 2022 से पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं। वह IIT (Indian Institute of Technology) दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर रहे हैं और उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की है। पंजाब में AAP की जीत में उनका बड़ा योगदान माना जाता है। हालांकि दिल्ली चुनाव में हार के बाद केजरीवाल ने उन्हें किनारे कर दिया था।
पूर्व भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह ने मार्च 2022 में AAP के साथ राजनीति में कदम रखा था। उन्होंने 18 जुलाई 2022 को राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल 2028 तक है। अब वे भी इस बड़े बदलाव का हिस्सा बन गए हैं।
बलबीर सिंह सीचेवाल को पंजाब में "इको बाबा" के नाम से जाना जाता है। उन्होंने नदियों में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए लंबे समय तक अभियान चलाया है। जालंधर के किसान परिवार में जन्मे सीचेवाल को 2017 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। 2022 में AAP ने उन्हें राज्यसभा भेजा था।
विक्रमजीत सिंह साहनी भी समाजसेवा और शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े हैं। उन्हें मॉरीशस के राष्ट्रपति द्वारा अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार मिल चुका है। उन्होंने विश्व पंजाबी संसदीय मंच की स्थापना भी की है।
संदीप पाठक को क्यों किया गया था साइडलाइन?
दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP की करारी हार के बाद अरविंद केजरीवाल ने संदीप पाठक को निर्णय प्रक्रिया से बाहर कर दिया था। चुनाव के आखिरी दौर में भी उन्हें दूर रखा गया। जबकि 2022 के पंजाब चुनाव से पहले और बाद में पार्टी की रणनीति बनाने में उनकी केंद्रीय भूमिका थी।
उन्हें छत्तीसगढ़ का प्रभारी बनाया गया था। वहीं मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन को पंजाब, आतिशी को गोवा तथा गोपाल राय और दुर्गेश पाठक को गुजरात की जिम्मेदारी दी गई थी। पाठक के लिए यह हाशिए पर जाना साफ तौर पर नाराजगी की वजह बना।
2022–2026: नए संकट, नई चुनौतियां
2022 के बाद AAP ने राष्ट्रीय विस्तार की ओर कदम बढ़ाया। पंजाब में सत्ता मिली और गुजरात व अन्य राज्यों में भी चुनाव लड़े गए। लेकिन इस दौर में भी पार्टी के भीतर खींचतान जारी रही। कई राज्य-स्तरीय नेताओं ने पार्टी छोड़ी। केंद्रीय नेतृत्व पर मनमानेपन के आरोप लगते रहे।
2023–2024 में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी ने पार्टी को नई चुनौती दी। इससे पार्टी के भीतर एकजुटता दिखी, लेकिन असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 2026 तक AAP एक ऐसी पार्टी बन चुकी थी जो जीतती भी है और टूटती भी है। बाहर जाने वाले हर नेता ने "सिद्धांत की बात" की। लेकिन यह भी सच है कि AAP का मूल वोट-बेस अब भी मज़बूत है।
AAP से अलग होने के मुख्य कारण
आम आदमी पार्टी (AAP) से नेताओं के अलग होने के कई साझा कारण दिखते हैं। पहला कारण है नेतृत्व का केंद्रीकरण (Centralization of Leadership) यानी सभी फैसले एक व्यक्ति या छोटे समूह तक सिमट जाना।
दूसरा कारण टिकट वितरण (Ticket Distribution) में पारदर्शिता की कमी है जिससे कई वफादार नेताओं को निराशा हुई। तीसरा कारण आंतरिक लोकतंत्र (Internal Democracy) का कमज़ोर होना रहा जिसे पार्टी ने अपने घोषणापत्र में प्रमुखता दी थी।
चौथा कारण यह है कि अनुभवी और स्वतंत्र सोच वाले नेताओं के लिए पार्टी में जगह सिकुड़ती गई। पांचवां और शायद सबसे महत्त्वपूर्ण कारण है "स्वराज बनाम सत्ता" (Swaraj vs Power) का द्वंद्व। जब एक पार्टी सत्ता में आती है तो उसके मूल आदर्शों और व्यावहारिक राजनीति के बीच टकराव होता है। AAP में यही टकराव बार-बार और बड़े पैमाने पर हुआ।
संकट के बावजूद राजनीतिक अस्तित्व का सफर
इन सब उठापटक के बावजूद AAP ने अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखा। दिल्ली में लगातार दो बार (2015 और 2020) भारी बहुमत से जीत हासिल की।
पंजाब में 2022 में सत्ता पाई और राष्ट्रीय राजनीति में एक विकल्प के रूप में उभरी। हालांकि, 2025 के दिल्ली चुनाव में AAP को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। यह हार पार्टी के लिए आत्ममंथन का अवसर बनी।
AAP से निकले नेताओं ने अलग-अलग रास्ते चुने। कुछ ने नई पार्टियाँ बनाईं, कुछ कांग्रेस या BJP में गए, कुछ अकादमिक या सामाजिक कार्यों में लौट गए।
सब नेताओं की कहानी यह बताती है कि राजनीतिक आदर्शवाद और संगठनात्मक वास्तविकता के बीच का फासला बहुत बड़ा होता है। AAP की यह यात्रा भारतीय राजनीति के लिए एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन बन गई है।
ये खबरें भी पढ़ें...
राघव चड्ढा को हटाकर जिस अशोक मित्तल को बनाया नए डिप्टी लीडर वो भी BJP के साथ
जानें कौन-कौन से सांसदों ने छोड़ी आप की राह, थामा BJP का दामन
सांसद तो सासंद, अब दिल्ली में आप के 16 MLA पर भी खतरा