अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा CBSE का नया नियम, थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर भारी विरोध
समझें क्या है पूरा मामला
- सीबीएसई की नई थ्री लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर बड़ा विवाद शुरू हो गया है।
- यह मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।
- वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत में जनहित याचिका दायर की है।
- याचिका में 9वीं के छात्रों पर अतिरिक्त भाषा का दबाव न बनाने की मांग है।
- सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले पर अगले हफ्ते सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है।
CBSE Three Language Policy: सीबीएसई बोर्ड से जुड़ा एक और नया विवाद अब सामने आ रहा है। ऑन स्क्रीन मार्किंग के बाद अब थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर सवाल उठ रहे हैं। यह गंभीर मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट पर है।
कुछ परेशान छात्रों और उनके माता-पिता ने मिलकर एक याचिका दायर की है। सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका लगाई है। उन्होंने कोर्ट में छात्रों की परेशानी को खुलकर सामने रखा है।
याचिका में कहा गया कि नौवीं के बच्चों पर अचानक दबाव डालना गलत है। उन पर नई भाषाएं सीखने का बोझ डालना किसी भी तरह ठीक नहीं है।
अचानक नई भाषा कैसे पढ़ सकते हैं छात्र?
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच के सामने यह मामला तुरंत उठाया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अगले हफ्ते सुनवाई करेगा।
मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा कि बोर्ड परीक्षा के करीब पहुंचे छात्रों पर यह नियम थोपना गलत है। नौवीं का छात्र अचानक दो नई भाषाएं भला कैसे पढ़ सकता है? इसके तुरंत बाद वह दसवीं की परीक्षा कैसे पास कर पाएगा?
उन्होंने इस नई नीति को पूरी तरह से भ्रम फैलाने वाला बताया है। इससे स्कूलों, बच्चों और अभिभावकों के बीच बहुत मानसिक तनाव पैदा हो रहा है। उन्होंने अदालत से इस विषय पर बहुत जल्द फैसला देने की मांग की। मुख्य न्यायाधीश ने भरोसा दिया कि इस पर अगले सप्ताह विचार होगा।
क्या है सीबीएसई की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी?
सीबीएसई ने नई शिक्षा नीति के तहत इस नियम को बनाया था। इसके अनुसार स्कूलों में अब तीन भाषाओं को पढ़ाना अनिवार्य किया गया। इसमें दो भारतीय भाषाओं को पढ़ना बच्चों के लिए बेहद जरूरी होगा। इसके अलावा तीसरी कोई अन्य भाषा हो सकती है, जो आमतौर पर अंग्रेजी होती है। यानी हिंदी और अंग्रेजी के साथ एक और भारतीय भाषा सीखनी होगी।
क्यों हो रहा है इस नई नीति पर विवाद?
पहले इस नियम को कक्षा छह से लागू करने की बात कही गई थी। लेकिन अब इसे अचानक नौवीं और दसवीं के लिए भी लागू कर दिया गया। यही बात बच्चों के माता-पिता को बिल्कुल पसंद नहीं आ रही है। अभिभावकों का कहना है कि उनके बच्चों ने पहले यह भाषा नहीं पढ़ी। अब अचानक बोर्ड परीक्षा के समय नया विषय पढ़ना बेहद मुश्किल काम है। इससे बच्चों के मन पर पढ़ाई का बहुत गलत असर पड़ रहा है।
अभिभावकों का तर्क है कि भाषा सीखने के लिए समय मिलना चाहिए। बिना किसी तैयारी के सीधे बड़ी कक्षाओं में इसे लागू करना गलत है। इससे बच्चों का रिजल्ट खराब होने का भी बहुत बड़ा डर है। अब सभी को सुप्रीम कोर्ट के आने वाले फैसले का बेसब्री से इंतज़ार है।
FAQ
- सीबीएसई की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी क्या है?
सीबीएसई की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी के तहत स्कूलों में छात्रों को तीन भाषाएं पढ़ाना अनिवार्य किया गया है। इस नई नीति के अनुसार, कोर्स में कम से कम दो भारतीय भाषाओं का होना जरूरी है। इसके अलावा तीसरी भाषा के रूप में छात्र किसी अन्य भाषा को चुन सकते हैं, जो आमतौर पर अंग्रेजी होती है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब छात्रों को हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक और क्षेत्रीय या भारतीय भाषा की पढ़ाई करनी होगी। - अभिभावक और छात्र इस नई भाषा नीति का विरोध क्यों कर रहे हैं?
इस नीति का विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि इसे अचानक कक्षा 9वीं और 10वीं के छात्रों के लिए भी लागू कर दिया गया है। अभिभावकों का कहना है कि उनके बच्चों ने कक्षा 6वीं से कोई तीसरी भारतीय भाषा नहीं पढ़ी है। अब जब वे बोर्ड परीक्षा के करीब हैं, तो अचानक एक नया विषय और नई भाषा सीखने का दबाव उन पर डाला जा रहा है, जिससे उनका मानसिक तनाव और बढ़ जाएगा।
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