क्या होता है फिल्म सर्टिफिकेट, यहां जानें U, UA, A और S सर्टिफिकेट का मतलब
5 प्वाइंट में इसे समझें
- भारत में हर फिल्म को CBFC (Central Board of Film Certification) यानी सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन से सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है।
- U, UA, A और S चार तरह के सर्टिफिकेट होते हैं, जो यह तय करते हैं कि फिल्म कौन देख सकता है।
- भारत में हर साल करीब 15 सौ से दो हजार फिल्में रिलीज होती हैं और बॉलीवुड दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाता है।
- फिल्में टिकट के अलावा डिजिटल राइट्स, सैटेलाइट राइट्स, म्यूजिक राइट्स और ब्रैंड विज्ञापन से भी करोड़ों कमाती हैं।
- फिल्में आमतौर पर शुक्रवार को रिलीज होती हैं क्योंकि 15 दिसंबर 1939 को इसी दिन हॉलीवुड की "गॉन विद द विंड" रिलीज हुई और यह परंपरा बन गई।
फिल्म सर्टिफिकेट क्या होता है?
जब भी कोई फिल्म सिनेमाघर में लगती है तो शुरुआत में U, UA या A लिखा दिखता है। यह सर्टिफिकेट सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन देता है। इसे आम भाषा में सेंसर बोर्ड भी कहते हैं।
ये सर्टिफिकेट तय करता है कि फिल्म किस उम्र के लोग देख सकते हैं। हर कैटेगरी का अपना अलग मतलब होता है। बिना इस सर्टिफिकेट के कोई भी फिल्म भारत में सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाई जा सकती।
U, UA, A और S का मतलब क्या है?
- U यानी यूनिवर्सल (Universal)। इस सर्टिफिकेट वाली फिल्म हर उम्र का व्यक्ति देख सकता है। इसमें कोई आपत्तिजनक दृश्य नहीं होता।
- UA कैटेगरी की फिल्में भी सभी देख सकते हैं, लेकिन 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए माता-पिता की सलाह जरूरी मानी जाती है। इसमें कुछ ऐसे दृश्य हो सकते हैं जो छोटे बच्चों के लिए उचित न हों।
- A यानी एडल्ट (Adult)। इस सर्टिफिकेट की फिल्म केवल 18 साल या उससे ऊपर के लोग ही देख सकते हैं।
- S यानी स्पेशलाइज्ड (Specialized)। इस कैटेगरी की फिल्में किसी खास पेशे के लोगों के लिए बनती हैं, जैसे डॉक्टर, वैज्ञानिक या रिसर्चर।
फिल्म हिट कब मानी जाती है?
अब सवाल यह उठता है कि आखिर कोई फिल्म हिट कैसे मानी जाती है। एक फिल्म को बनाने में औसतन 50 करोड़ रुपए लगते हैं। अगर वो फिल्म बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाए तो उसे हिट माना जाता है।
आमतौर पर फिल्म की लागत का 120 प्रतिशत तक उसे फिल्म पर मुनाफे के रूप में माना जा सकता है। यानी लागत से दोगुनी से ज्यादा कमाई हो तो फिल्म सफल मानी जाती है।
टिकट से कितना पैसा मिलता है?
दर्शक जो टिकट खरीदते हैं उसकी पूरी कीमत सिर्फ फिल्म निर्माताओं के पास नहीं जाती। टिकट की कीमत से सिनेमाघर का हिस्सा, जीएसटी (GST – Goods and Services Tax) और अन्य शुल्क काटे जाते हैं। इसके बाद जो बचता है वह निर्माता तक पहुंचता है। इसीलिए फिल्म निर्माता केवल बॉक्स ऑफिस पर निर्भर नहीं रहते।
टिकट के अलावा और कहां से होती है कमाई?
फिल्मों की असली कमाई कई जगहों से आती है।
- पहला बड़ा जरिया है ओटीटी (OTT – Over The Top) यानी डिजिटल प्लेटफॉर्म। फिल्में थिएटर से उतरने के बाद वहां रिलीज होती हैं और उनके डिजिटल राइट्स करोड़ों में बिकते हैं।
- दूसरा जरिया है सैटेलाइट राइट्स। टेलीविजन चैनल फिल्म को अपने चैनल पर दिखाने के लिए बड़ी रकम देते हैं। तीसरा जरिया है म्यूजिक राइट्स। फिल्म के गाने बेचने से भी करोड़ों रुपए आते हैं।
- इसके अलावा कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग, कलाकारों की फीस, लोकेशन, वीएफएक्स (VFX – Visual Effects) और अन्य खर्चों की भरपाई के बाद मुनाफा निकाला जाता है।
शुक्रवार को ही क्यों रिलीज होती हैं फिल्में?
भारत में यह परंपरा हॉलीवुड से आई। 15 दिसंबर 1939 को शुक्रवार के दिन हॉलीवुड की मशहूर फिल्म "गॉन विद द विंड" रिलीज हुई। उसे बहुत अच्छा मुनाफा मिला। इसी से शुक्रवार पर रिलीज की परंपरा शुरू हुई।
इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण भी है। शुक्रवार के बाद शनिवार और रविवार की छुट्टी होती है। इन दो दिनों में ज्यादा लोग फिल्म देखने जाते हैं। इससे कमाई की संभावना बढ़ जाती है।
भारत में कितनी भाषाओं में बनती हैं फिल्में?
भारत में हिंदी के अलावा कई भाषाओं में फिल्में बनती हैं। देश में 27 से 28 फिल्म इंडस्ट्री सक्रिय हैं। इनमें सैंडलवुड (कन्नड़), टॉलीवुड (तेलुगु), पॉलीवुड (पंजाबी), कॉलीवुड (तमिल), मॉलीवुड (मलयालम) और बॉलीवुड (हिंदी) प्रमुख हैं।
हर साल भारत में करीब 15 सौ से दो हजार फिल्में रिलीज होती हैं। दुनियाभर में करीब दो हजार करोड़ रुपए की कमाई भारतीय फिल्में करती हैं। बॉलीवुड की सबसे सफल फिल्म "धूम्रपान-पार्ट 1" को मानी जाती है जिसने करीब 900 करोड़ रुपए कमाए।
भारतीय सिनेमा की शुरुआत
1913 में राजा हरिश्चंद्र (Indian cinema) आई थी जिसे भारत की पहली साइलेंट (मूक) फिल्म माना जाता है। ये निर्देशक दादासाहेब फाल्के (Dadasaheb Phalke) की कृति थी। वहीं पहली बोलती भारतीय फिल्म आलमआरा थी जो 1931 में आई।
FAQ
- CBFC क्या है और यह फिल्मों को सर्टिफिकेट क्यों देता है?
CBFC यानी Central Board of Film Certification (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) एक सरकारी संस्था है जिसे आम बोलचाल में सेंसर बोर्ड कहते हैं। यह सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत काम करती है। इसका मुख्य काम यह तय करना है कि कोई फिल्म, डॉक्युमेंट्री या विज्ञापन जनता के लिए उचित है या नहीं। यह U, UA, A और S चार तरह के सर्टिफिकेट देता है। बिना इस सर्टिफिकेट के भारत में कोई भी फिल्म सार्वजनिक रूप से नहीं दिखाई जा सकती। - फिल्म की कमाई कहां-कहां से होती है?
फिल्म की कमाई कई स्रोतों से होती है। पहला और सबसे बड़ा स्रोत है बॉक्स ऑफिस यानी सिनेमाघर में टिकट बिक्री। हालाँकि इसमें से सिनेमाघर का हिस्सा और जीएसटी कटता है। दूसरा स्रोत है ओटीटी प्लेटफॉर्म के डिजिटल राइट्स। तीसरा स्रोत है सैटेलाइट राइट्स यानी टीवी चैनलों को फिल्म दिखाने का अधिकार बेचना। चौथा स्रोत म्यूजिक राइट्स है। इसके अलावा ब्रैंड विज्ञापन, स्पॉन्सरशिप और मर्चेंडाइजिंग से भी आय होती है। - फिल्म हिट होने के लिए कितनी कमाई जरूरी होती है?
यह फिल्म की लागत पर निर्भर करता है। आमतौर पर एक फिल्म को बनाने में औसतन 50 करोड़ रुपए लगते हैं। अगर फिल्म 100 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाए तो उसे हिट माना जाता है। एक सामान्य नियम यह है कि फिल्म की लागत का 120 प्रतिशत तक की कमाई को मुनाफे का संकेत माना जाता है। बड़े बजट की फिल्मों के लिए यह पैमाना बदल जाता है। दुनियाभर में भारतीय फिल्मों की कुल कमाई करीब 2,000 करोड़ रुपए सालाना है।
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