15 डॉक्यूमेंट देने के बाद भी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सका दिहाड़ी मजदूर
समझें क्या है पूरा मामला...
- गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक मजदूर की नागरिकता याचिका खारिज कर दी है।
- मजदूर ने भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 15 दस्तावेज पेश किए थे।
- कोर्ट इन 15 दस्तावेजों से भी संतुष्ट नहीं हो सका।
- हाईकोर्ट ने विदेशी न्यायाधिकरण के फैसले को बरकरार रखा।
- कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ठोस और कानूनी रूप से मान्य सबूत पेश नहीं कर सका।
असम में नागरिकता का मुद्दा लंबे समय से सुर्खियों में रहा है। इसी कड़ी में गुवाहाटी हाईकोर्ट में एक नया मामला सामने आया है। एक दिहाड़ी मजदूर ने खुद को भारतीय नागरिक साबित करने की पूरी कोशिश की। लेकिन अदालत ने उसकी याचिका ठुकरा दी।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता की पहचान उजागर नहीं की। हालांकि उसके पास अभी भी कानूनी विकल्प मौजूद हैं।
गुवाहाटी हाईकोर्ट का आदेश
बता दें कि जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया है। इस मामले की सुनवाई 30 जून को हुई थी।
कोर्ट ने कहा कि विदेशी अधिनियम के तहत नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी याचिकाकर्ता की थी।
अदालत ने पाया कि विदेशी न्यायाधिकरण ने सभी सबूतों की सही तरीके से जांच की थी। न्यायाधिकरण के फैसले में कोई कानूनी या तथ्यात्मक गलती नहीं मिली।
कौन से दस्तावेज पेश हुए
याचिकाकर्ता ने कुल 15 दस्तावेज और मौखिक गवाही पेश की।
- 1951 की NRC (National Register of Citizens) में पिता और दादा-दादी के नाम
- 1966 से 2017 तक की वोटर लिस्ट
- 1973 की जमीन खरीद की रजिस्ट्री
- 2017 का स्कूल प्रमाणपत्र
- PAN कार्ड (Permanent Account Number)
- वोटर आईडी यानी EPIC (Elector's Photo Identity Card)
- पिता की मौखिक गवाही
याचिकाकर्ता का दावा था कि उसका जन्म 1988 में हुआ। वह गुवाहाटी के पास किराए के मकान में रहकर मजदूरी करता है। उसने यह भी बताया कि ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव के कारण परिवार को कई बार गांव बदलना पड़ा।
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दस्तावेज क्यों रद्द हुए
हाईकोर्ट ने 1951 NRC की प्रतियों को स्वीकार नहीं किया। वजह यह थी कि वे सिर्फ कंप्यूटर प्रिंटआउट थीं। इन्हें कानूनी रूप से प्रमाणित नहीं किया गया था। कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सबूत मानने के लिए जरूरी प्रमाणपत्र होना चाहिए।
स्कूल प्रमाणपत्र भी अमान्य माना गया। न तो प्रधानाध्यापक को गवाह बनाया गया, न ही स्कूल का मूल रजिस्टर पेश किया गया।
साथ ही 1973 की जमीन रजिस्ट्री पर कोर्ट ने कहा कि इससे परिवार के साथ लगातार संबंध साबित नहीं होता है। उत्तराधिकार और जमीन राजस्व के रिकॉर्ड भी पेश नहीं किए गए।
कोर्ट ने साफ किया कि PAN कार्ड और वोटर ID नागरिकता के सबूत नहीं हैं। ये केवल पहचान और कर से जुड़े दस्तावेज हैं।
वोटर लिस्ट में खामियां
मतदाता सूचियों की जांच में भी कई गड़बड़ियां मिलीं है।
- अलग-अलग सालों में उम्र का रिकॉर्ड मेल नहीं खाया।
- परिवार के सदस्य अलग-अलग गांवों में दर्ज मिले।
- पारिवारिक संबंधों का कोई मजबूत रिकॉर्ड नहीं था।
इन खामियों ने याचिकाकर्ता के दावे को और कमजोर कर दिया।
कोर्ट की आखिरी टिप्पणी
अदालत ने अंत में कहा कि सिर्फ मौखिक गवाही पर्याप्त नहीं होती है। दस्तावेजी प्रमाण का कानूनी रूप से सही होना जरूरी है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। विदेशी न्यायाधिकरण का पुराना फैसला बरकरार रखा गया।
तो नागरिकता साबित कौन करता है
दरअसल नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत जारी नागरिकता प्रमाण-पत्र ऐसा दस्तावेज है जो सीधे तौर पर नागरिकता को प्रमाणित करता है। हालांकि यह केवल उन लोगों को जारी किया जाता है जिन्होंने पंजीकरण या प्राकृतिककरण के माध्यम से भारतीय नागरिकता प्राप्त की हो। जन्म से भारतीय नागरिक बने अधिकांश लोगों को यह प्रमाण-पत्र नहीं मिलता।
फरवरी 2020 में गृह मंत्रालय (MHA - Ministry of Home Affairs) ने संसद में स्पष्ट किया था कि आधार कार्ड, पासपोर्ट, वोटर आईडी, पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र - इनमें से किसी भी दस्तावेज को अकेले नागरिकता का पक्का और अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।
जन्म तिथि के आधार पर अलग नियम
26 जनवरी 1950 से 01 जुलाई 1987 के बीच भारत में जन्म लेने वाले लोग जन्म से नागरिक माने जाते हैं। वहीं, 01 जुलाई 1987 से 3 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे व्यक्ति के लिए कम से कम एक माता या पिता का भारतीय नागरिक होना जरूरी है। वहीं 03 दिसंबर 2004 के बाद जन्मे लोगों के लिए दोनों माता-पिता का भारतीय नागरिक होना या एक माता-पिता का नागरिक होना और दूसरा अवैध प्रवासी न होना जरूरी है।
पासपोर्ट रद्द भी हो सकता है
यदि बाद में यह पता चलता है कि किसी व्यक्ति ने गलत जानकारी, झूठे दस्तावेज या फर्जी पहचान के आधार पर पासपोर्ट हासिल किया था, तो उसका पासपोर्ट रद्द या जब्त किया जा सकता है। इसलिए पासपोर्ट नागरिकता का मजबूत संकेत तो है, लेकिन अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं। यही वजह है कि सरकार इसे नागरिकता का निर्णायक दस्तावेज नहीं मानती।
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