हाईकोर्ट ने रोकी परीक्षा रद्द करने की कार्रवाई, सरकार के विरोध में बड़ा फैसला

Jitendra Shrivastava | Aug 20, 2026, 17:17 IST
Photograph: (THESOOTR)
RANCHI. हाईकोर्ट ने JPSC और JSSC की 22 परीक्षाएं रद्द करने के सरकारी आदेश पर रोक लगा दी है। इस फैसले के आते ही सचिवालय के बाहर छात्रों ने जश्न मनाया।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • हाईकोर्ट ने रोकी परीक्षा रद्द करने की कार्रवाई।
  • सचिवालय के बाहर छात्रों में खुशी की लहर दौड़ी।
  • सैकड़ों उम्मीदवारों की नौकरी पर मंडराया था खतरा।
  • 22 परीक्षाएं रद्द करने के आदेश पर बड़ी राहत।
  • झारखंड सरकार के फैसले को हाईकोर्ट में मिली चुनौती।

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के एक बड़े फैसले पर रोक लगा दी है। सरकार ने JPSC और JSSC CGL की 22 परीक्षाएं रद्द कर दी थीं। अनियमितताओं की शिकायतों के बाद यह फैसला लिया गया था। अब हाईकोर्ट ने इस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। इससे प्रभावित अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है।



झारखंड लोक सेवा आयोग और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की कई परीक्षाओं पर बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। छात्रों ने इन परीक्षाओं में गड़बड़ी का आरोप लगाकर उग्र प्रदर्शन किए थे। इसी दबाव में राज्य सरकार ने परीक्षाएं रद्द करने का फैसला ले लिया था। अब अदालत के आदेश के बाद यह मामला एक नए मोड़ पर पहुंच गया है।



हाईकोर्ट ने लगाई रोक

झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगाई। यह आदेश JPSC और JSSC की कई परीक्षाओं को रद्द करने से जुड़ा था।



छात्रों के उग्र प्रदर्शन और अनियमितता की शिकायतों के बाद सरकार ने यह फैसला लिया था। अभ्यर्थियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकारी आदेश को फिलहाल रोक दिया।



इस फैसले के बाद राज्य सरकार की प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं। भर्ती प्रक्रिया का भविष्य भी अब अनिश्चित बना हुआ है। अदालत के इस रुख को उम्मीदवारों के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है।



22 परीक्षाएं थीं रद्द

झारखंड सरकार ने कुल 22 भर्ती परीक्षाएं रद्द करने का फैसला लिया था। यह फैसला सीआईडी और एसआईटी की जांच रिपोर्ट के आधार पर लिया गया था। जांच में परीक्षाओं में अनियमितताओं के प्रमाण मिलने की बात कही गई थी।



रद्द की गई परीक्षाओं में जेपीएससी 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा शामिल थी। इसके अलावा जेएसएससी सीजीएल से जुड़ी भर्तियां भी इसमें आती हैं।



सिविल जज, डिप्टी कलेक्टर, खाद्य सुरक्षा अधिकारी और ड्रग इंस्पेक्टर जैसे पद भी इसमें शामिल थे। सहायक प्रोफेसर, लेक्चरर, सहायक इंजीनियर, वन रेंज अधिकारी और सहायक वन संरक्षक जैसे पदों की भर्ती भी प्रभावित हुई थी।



सैकड़ों नौकरियां खतरे में

इस फैसले से सैकड़ों उम्मीदवारों की नौकरी सीधे खतरे में पड़ गई थी। कई उम्मीदवार चयन के बाद पहले ही सरकारी सेवा में शामिल हो चुके थे। सरकार के आदेश से उनकी नौकरी पर सीधा असर पड़ने लगा था।



इसी वजह से चार अलग याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल की गईं। इन याचिकाओं में जेपीएससी संयुक्त सिविल सेवा और जेएसएससी सीजीएल के सफल उम्मीदवार शामिल थे।



खाद्य सुरक्षा अधिकारी परीक्षा के उम्मीदवारों ने भी याचिका दाखिल की। अवधेश कुमार, दीपमाला, सोनम कुमारी और सौरभ सिंह जैसे उम्मीदवार इन याचिकाओं में प्रमुख रूप से शामिल रहे।



उम्मीदवारों का पक्ष

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में एक बड़ा तर्क रखा। उनका कहना था कि सरकार ने उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका ही नहीं दिया। सरकार ने एकतरफा रूप से परीक्षाएं और नियुक्तियां रद्द कर दीं। उम्मीदवारों ने इसे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ बताया।



उम्मीदवारों का कहना था कि बिना सुनवाई के इतना बड़ा फैसला उचित नहीं है। अदालत ने इन दलीलों को गंभीरता से लिया और सरकारी आदेश पर रोक लगा दी।



रांची में जश्न का माहौल

हाईकोर्ट के फैसले के बाद रांची सचिवालय के बाहर जश्न का माहौल देखने को मिला। प्रभावित छात्र और अभ्यर्थी बड़ी संख्या में वहां जुट गए। इस फैसले को उन्होंने अपनी बड़ी जीत के रूप में देखा।



लंबे समय से चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बाद यह राहत उम्मीदवारों के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। हालांकि यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है। आगे की सुनवाई में इस पूरे मामले पर अंतिम फैसला आना बाकी है।



FAQ

  1. झारखंड हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया है?
    हाईकोर्ट ने JPSC और JSSC की 22 परीक्षाएं रद्द करने के सरकारी आदेश पर रोक लगा दी है। यह फैसला अभ्यर्थियों की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद आया है।
  2. सरकार ने परीक्षाएं क्यों रद्द की थीं?
    सीआईडी और एसआईटी की जांच में अनियमितताओं के आरोप मिले थे। इसी आधार पर सरकार ने 22 भर्ती परीक्षाएं रद्द करने का फैसला लिया था।
  3. याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क क्या था?
    उम्मीदवारों ने कहा कि सरकार ने उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया। उन्होंने इसे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ बताया।

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